
लोकपाल भ्रष्टाचार के खिलाफ कारगर होगा
देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई में एक भरोसेमंद चेहरे के रूप में उभरे हैं ४३
वर्षीय अरविंद केजरीवाल। हिसार में पैदा हुए। फिर
आईआईटी खडगपुर से मैकेनिकल
इंजीनियरिंग की। इसके बादचयन इंडियन सिविल सर्विसेज में राजस्व आधिकारी के रूप में
हुआ। राजस्व हेडक्वार्टर पर भ्रष्टाचार को फलते फूलते देखा, तो इसे अपने तरह से साफ
करने में लग गये। कई ऐसे काम किये, जिससे काम में पारदर्शिता बढे। आरटीआई के
क्षेत्र में काफी काम किया। लेकिन जल्दी ही समझ में आ गया कि सिस्टम में रहते हुए
भ्रष्टाचार से लड़ाई मुश्किल है। इसी दौरान उन्हें मैगसायसाय अवार्ड मिला। केजरीवाल
ने नई राह चुनी। परिवर्तन नाम की संस्था बनाकर आरटीआई के जरिए संघर्ष शुरू किया। अब
वो इससे आगे की लड़ाई लडऩा चाहते हैं, वो चाहते हैं देश में लोकपाल जैसी
स्वायत्तशासी संस्था बने, जो न केवल अधिकार संपन्न हो बल्कि असरदार तरीके से काम कर
सके। फिलहाल भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में वो तमाम जाने-माने लोगों को एक मंच पर ला
रहे हैं, जिसमें बाबा रामदेव, किरण बेदी जैसे लोग शामिल हैं। उनसे बात करने पर उनकी
दृढइच्छाशक्ति, साफगोई साफ नजर आती है, वो विनम्र हैं, लेकिन अप्रिय बातों पर तेजी
से विचलित भी हो जाते हैं। पेश है डायलाग इंडिया के संपादक अनुज अग्रवाल की उनसे
हुई बेबाक बातचीत
आपके अनुसार देश के सामने बड़ी समस्याएं क्या हैं?
समस्याएं तो बहुत सी हैं, लेकिन मैं भ्रष्टाचार को सबसे बडी समस्या मानता हूं और इसी पर बात करना चाहूंगा। भ्रष्टाचार के सिंपटम बढ़ते जा रहे हैं। कारण बहुत हैं और समाधान भी उतने ही व्यापक। इससे निपटने का एक तरीका आरटीआई है, कम से कम ये एक ऐसा हथियार तो है, जो जनता के पास आया। लेकिन साफ है कि जो लड़ाई लड़ी जा रही है, उससे भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। इतने भ्रष्टाचार के बावजूद कोई जेल नहीं जाता, कोई कार्रवाई नहीं होती। भ्रष्टाचारी तंत्र फलता-फूलता जा रहा है। ऐसे में क्या होगा। कैसे ये कम होगा। अगर कुछ लोग जेल चले जाएं तो बेशक भ्रष्टाचार करने वालों पर असर तो पड़ेगा, कुछ तो उनकी आत्मा हिलेगी।
क्या आपको लगता नहीं कि आरटीआई अधूरा कानून है, इसमें सूचना तो मिलती है, लेकिन किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती?
हां, मैं इस बात से सहमत हूं। बेशक ये अधूरा है लेकिन सूचना भी कम जरूरी नहीं। इससे जागरूकता तो बढ़ी है। कुछ हद तक इसका असर भी पड़ा है। शिकायत का हमारे यहां अभी भी वैसा तंत्र है नहीं, जैसा होना चाहिए।












