
कामनवेल्थ
गेम्स
में अब
तक 20
हजार करोड़
का
भ्रष्टाचार
विजय
गोयल से
बातचीत
आपने और
शिव
खेड़ा जी
ने
मिलकर कॉमनवेल्थ
गेम्स
की अनियमितताओं
के खिलाफ
एक मंच
बनाया
है। इस
मंच को
लोगों
का कितना
रिस्पांस
मिल रहा
है?
ये मंच
आम
आदमियों की
भावनाओं
को प्रगट
करता
है। जितनी
अनियमितताएं
और
भ्रष्टाचार कामनवेल्थ
खेलों को
लेकर
रोज उजागर
हो रहे
हैं,
उससे सरकार
की
प्रतिष्ठा गिरी
है। रोज
रोज नये
नये
मामले और
अनियमितताएं
कामनवेल्थ गेम्स
की
तैयारियों को
लेकर
आती हैं।
ये
आयोजन अब
आम जनता,
संस्थाओं
और
खिलाडिय़ों का
होने की
बजाये,
इवेंट बनकर
रह गया
है।
बेतहाशा पैसा
खर्च
किया जा
रहा है,
लेकिन
किसके लिए,
लग नहीं
रहा कि
खेलों
को महत्व
दिया जा
रहा है
बल्कि
खेलों के
नाम पर
तमाशा
हो रहा
है और
कुछ लोग
अपने
स्वार्थ सिद्ध
कर रहे
हैं। और
ये सब
हो रहा
है
खेलों को
प्रोमोट
करने के
नाम पर।
देश का
सम्मान
और गर्व
भी इससे
प्रभावित
हुआ है।
अब आप
कनाट
प्लेस को
ही देख
लीजिये,
यहां हजारों
कामर्शियल
बोर्ड
लगे हुए
हैं, और
इसके
सौदर्यीकरण पर अनाप-शनाप
पैसा
अनप्लान्ड ढंग से
बहाया
जा रहा
है
आपको
क्या लगता
है कि
ये
अनियमितताएं और भ्रष्टाचार
किस
स्तर पर
व्याप्त
है?
जो इन
खेलों
से जुडा़
है, हर
कोई
कमाई में
लगा है।
सबको
मालूम है
कि क्या
चल रहा
है। आप
खुद
देखिये दिल्ली
सरकार
चुपचाप बैठी
है,
किसी पर
कोई
कार्रवाई नहीं
की जा
रही है।
हमारा
मिशन बिल्कुल
स्पष्ट
है कि
हम इसके
खिलाफ
आवाज उठायेंगे,
इस पर
व्हाइट
पेपर की
मांग कर
रहे
हैं। किस
बात का
डर
किसको है,
अगर
सबकुछ सही
है तो
सारे
हिसाब-किताब
का खर्च
वेबसाइट
पर डालने
में
हर्ज ही
क्या
है। वैसे
हम बहुत
जल्दी
बहुत सारी
बातों
को लेकर
जनता के
बीच जा
रहे हैं
और
लोगों को
बताएंगे
कि कामनवेल्थ
गेम्स
के नाम
पर क्या
कुछ चल
रहा है।
आप
कॉमनवेल्थ गेम्स
को लेकर
जो कुछ
भी कह
रहे हैं,
क्या
आपको लगता
है कि
खेल
मंत्री और
प्रधानमंत्री
उस
ध्यान देंगे?
खेल
मंत्री से
हमारी
एक मुलाकात
हुई।
उन्होंने हमारी
बातें
ध्यान से
सुनीं।
हमने उनके
सामने
कॉमनवेल्थ गेम्स की
कमियां
उजागर कीं।
हम उनसे
फिर
मिलना चाहते
थे
लेकिन उन्हें
लगता है
कि हम
इसके
विरोध में
इसलिए
हैं क्योंकि
विपक्ष
में हैं,
लिहाजा
हमें उनके
बेहतर
रिस्पांस का
इतंजार
रहेगा। हां,
हम
प्रधानमंत्री से जरूर
मिलना
चाहते हैं
ताकि
उन्हें भी
बता
सकें कि
क्या
कुछ चल
रहा है
खेलों
के नाम
पर।
अरबों रुपये
फूंके
जा रहे
हैं,
जहां एक
रुपया
खर्च होना
चाहिए
वहां चार
रुपया
खर्च दिखाया
जा रहा
है।
लेकिन
व्हाइट पेपर
की
परंपरा तो
किसी
कामनवेल्थ गेम्स
में
नहीं रही
है?
नहीं
ऐसा
नहीं
है। दिल्ली
के बाद
अगले
कॉमनवेल्थ गेम्स ग्लासगो
में हो
रहे
हैं। उनकी
वेबसाइट
पर सबकुछ
है।
कहां कितना
पैसा
खर्च हो
रहा है,
कितने
प्रोजेक्ट किस
हाल में
हैं, और
कौन से
काम में
क्या
कसर है।
ये
सबकुछ उन्होंने
अपनी
वेबसाइट पर
डाल रखा
है। आप
जरा
उनकी साइट
खोलिए,
सब कुछ
पारदर्शी
तरीके
से दिया
हुआ है।
कहा
जाता है
कि
जितना पैसा
इसमें
लग गया,
उतना
सोचा भी
नहीं जा
सकता
था। जब
भारत को
इन
खेलों की
मेजबानी
मिली तब
आप
केंद्रीय खेल
राज्य
मंत्री थे,
क्या
आपने इसके
इस तरह
के
खर्चों के
बारे
में कभी
सोचा था?
नहीं
हमने कभी
नहीं
सोचा था.
जब ये
खेल
भारत को
मिले तब
एनडीए
की सरकार
केंद्र
में थी,
इसके
बाद सरकार
बदल गई
और हम
चार साल
तक सोते
रहे।
यूपीए की
सरकार
का कोई
ध्यान
इन खेलों
की ओर
नहीं
था। जब
चार साल
बाद काम
शुरू
किये गये
तब सारी
चीजों
के दाम
दस गुने
बढ़
चुके थे।
इसके
लिए यूपीए
सरकार
भी जिम्मेदारी
है, उसने
अपना
काम तरीके
से नहीं
किया।
आप तो
कॉमनवेल्थ
गेम्स की
आयोजन
कमेटी में
भी रहे
हैं, आप
क्यों
इससे अलग
हो गये?
देखिये
मैं खुद
तो अलग
हुआ
नहीं हूं,
अलग
किये जाने
की भी
चिट्ठी
मिली नहीं
है,
लेकिन व्यावहारिक
तौर पर
मैं
मीटिंग्स में
नहीं
जाता। बल्कि
यों भी
कह
लीजिये कि
आर्गनाइजिंग
कमेटी
को लोगों
की
जरूरत ही
कहां
है। कमेटी
और सब
कमेटियां
कागज पर
बना दी
गई हैं,
लेकिन
उनकी मीटिंग
होती
नहीं, कोई
इवेंट्स
इससे जुड़ा
हुआ
नहीं। हां
काम के
नाम पर
विदेशी
एक्सपट्र्स को
मोटे
पैसे में
बुलाकर
बिठाया हुआ
है। कुल
मिलाकर
आर्गनाइजिंग कमेटी ने 3३
विदेशी
विशेषज्ञ रखे
हैं,
लेकिन ये
कर क्या
रहे हैं,
ये किसी
को नहीं
मालूम।
कॉमनवेल्थ
गेम्स आर्गनाइजेशन
कमेटी
के चेयरमैन
सुरेश
कलमाड़ी लगातार
विवादों
में रहे
हैं,
उनके काम
करने के
अंदाज
के बारे
में
लोगों को
खासी
नाराजगी है?
कलमाड़ी
का काम
करने का
तरीका
तानाशाही से
भरा हुआ
है।
पूर्व खेल
मंत्री
सुखदेव ढींढसा
जी ने
तो उनके
काम
करने के
अंदाज
में कहा
भी है
और ये
एकदम
सही है।
कलमाड़ी
कॉमनवेल्थ खेलों में
तैयारी
के नाम
पर भाई-भतीजावाद
चला रहे
हैं,
उनका खेलों
से कोई
संबंध
नहीं है।
रही बात
कलमाड़ी
जी के
व्यवहार
की तो
आप खुद
देखिये
वो खेल
मंत्री
एम एस
गिल से
कैसे
पेश आते
हैं,
उनकी बात
मानते
नहीं। कामनवेल्थ
गेम्स फेडरेशन
के
प्रमुख फिनेल
से वो
भिड़
चुके हैं।
कामनवेल्थ
गेम्स फेडरेशन
के भारत
में दूत
कार्ल
हुपर से
वो भिड़
चुके
हैं। अब
आप खुद
समझ
जाइये कि
उनका
व्यवहार बाकि
लोगों
के साथ
कैसा
होता होगा।
क्या
आपको लगता
है कि
कलमाड़ी
ने जिस
जगह इन
खेलों
को लेकर
सरकार
को खड़ा
कर दिया
है,
वहां अब
सरकार
भी कुछ
नहीं कर
सकती?
देखिये
सरकार चाहे
तो बहुत
कुछ कर
सकती है,
लेकिन
उसे लगता
है कि
पहले
किसी तरह
खेल तो
हों फिर
तो जो
कुछ है,
वो
सबकुछ अपने
आप
सामने आयेगा
ही।
क्या
खेलों का
सारा
कामकाज समय
तक हो
पायेगा।
पहले ये
बोला जा
रहा था
मई जून
तक सारा
काम
खत्म हो
जायेगा,
क्या अब
ऐसा
लगता है?
कच्चे
पक्के तैयार
होंगे,
जो कुछ
नहीं हो
पायेगा,
उसे पर्दे
से
छिपाया जायेगा
कॉमनवेल्थ
गेम्स आर्गनाइजिंग
कमेटी
के जंतर-मंतर
स्थित
मुख्यालय में
अजीब
स्थिति है,
बड़े
पैमाने पर
एडवाइजर
से लेकर
अधिकारियों
की फौज
ऐसी है,
जो
कलमाड़ी के
चहेते
हैं, इसे
लेकर
काम करने
वालों
के बीच
खासा
असंतोष है?
सारे
नाते-रिश्तेदार
लोग भर
लिये
गये हैं।
उन्हें
खासा पैसा
मिल रहा
है और
मौज
करने की
पूरी
छूट है,
और
उम्मीद ही
क्या की
जा सकती
है।
एक ओर
तो
कामनवेल्थ गेम्स
की
तैयारियां अधर में
दिख रही
हैं और
तमाम
अनियमितताओं के
आरोप लग
रहे हैं,
वहीं
दूसरी ओर
खिलाडिय़ों
की बात
करें,
तो उनकी
तैयारियों
और
ट्रेनिंग की
ओर किसी
का
ध्यान नहीं ?
देखिये
कॉमनवेल्थ गेम्स
की
मेजबानी लेते
समय
हमने सोचा
था कि
इससे
देश में
गांव से
लेकर
शहरों तक
खेलों
को लेकर
एक अलग
भावना
पैदा होगा
लेकिन
अफसोस ऐसा
कुछ
होता दिख
नहीं
रहा। मेजबान
होने के
नाते
अगर हमारे
इंफ्रास्ट्रक्टर
अब तक
बन जाते,
तो
हमारे खिलाडिय़ों
को उसमें
प्रैक्टिस
करने का
मौका
मिलता और
वो खुद
को
ज्यादा बेहतर
तरीके
से तैयार
करते।
साथ ही
स्टेडियम
से भी
परिचित
हो जाते।
मुझ लग
रहा है
कि ये
खेल
बहुत ही
गैर
योजनाबद्ध तरीके
से कहीं
आयोजित
न हों
और देश
की
खिल्ली न
उड़े।
बड़े खिलाड़ी
आ नहीं
रहे हैं,
इसका
सबसे बड़ा
कारण
सुरक्षा है।
उधर
दिल्ली वालों
का अलग
बुरा
हाल है।
दिल्ली
वाले तो
अभी से
खेलों
के टैक्स
के बोझ
के तले
दब गये
हैं।
आने वाले
दिनो
उन्हें इन
खेलों
पर किये
जा रहे
अनाप-शनाप
खर्चों
की कीमत
चुकानी
तो नहीं
पड़ेगी?
टैक्स
से तो
दिल्ली
वालों को
लादा ही
जा चुका
है।
सारी चीजें
महंगी
हो चुकी
हैं।
दाम खासे
बढ़ाये
जा चुके
हैं।
टैक्स आने
वाले
दिनों में
और
बढ़ेंगे और
पानी-
बिजली और
महंगी
हो जायेगी
आखिरी
सवाल, आपको
क्या
लगता है
कि
कॉमनवेल्थ गेम्स
में
भ्रष्टाचार का मानक
क्या
होगा, यानि
करीब
कितना पैसा
भ्रष्टाचार
की बली
चढ़
चुका होगा?
करीब
करीब 20 हजार
करोड़
रुपये। हर
लेबल पर
भ्रष्टाचार
है, सारे
नियमों
को ताक
पर रखकर
काम
किया जा
रहा है।













