
मौजूदा शिक्षा प्रणाली रट्टू तोता बनाती है व्यक्तित्व नहीं

कारपोरेट
ट्रेनर और
शीर्ष
एचआर कंसल्टेंट
अजय अग्रवाल
से अनुज
अग्रवाल
की बातचीत
के अंश:
कोलकाता
में पैदा
हुए अजय
अग्रवाल
देश के
चंद सफल
कारपोरेट
ट्रेनर
और एचआर
कंसल्टेंट
के रूप
में जाने
जाते
हैं। देश
की दो
दर्जन
से ज्यादा
कंपनियां
उनकी
सेवाएं लेती
हैं।
इनमें आईटीसी,
एयरटेल,
जिंदल स्टील्स
और
स्टेट बैंक
जैसी
शीर्ष कंपनियां
शामिल
हैं। वह
कई
प्रसिद्ध संस्थाओं
के
सदस्य हैं
तो कई
मैनेजमेंट
इंस्टीट्यूट
के प्रोफेसर।
वह अपनी
एक कंपनी
रैपिड
लर्निंग सिस्टम
प्राइवेट
लिमिटेड
ह्यूमन रिसोर्स
कंसल्टेशन
के साथ
ट्रेनिंग
और
डेवलपमेंट प्रोग्राम संचालित
करते
रहते हैं।
उनकी
वर्कशाप को
अटैंड
करना एक
अलग ही
अनुभव
होता है।
उनकी
सेमिनार के
जरिए न
केवल
प्रोफेनल्स और अन्य
लोगों
को आत्मविश्वास
बढ़ाने में
मदद
मिलती
है बल्कि
कम्युनिकेशन
क्षमता
में सुधार
आता है।
उनका
मुख्य जोर
लोगों
के नजरिये
में
बदलाव के
साथ सोच
विचार
के स्तर
को भी
बेहतर
बनाना है। 11
सालों
से
सक्रिय अजय
अग्रवाल
के अब
तक 70
हजार से
ज्यादा
लोगों को
लाभान्वित
कर चुके
हैं।
आप लंबे
समय से
लोगों
की पर्सनालिटी
बेहतर बनाने
में जुटे
हैं।
क्या मैं
आपको
पर्सनालिटी गुरु के
रूप में
परिभाषित
कर सकता
हूं?
नहीं
मुझको पर्सनालिटी
गुरु के
रूप में
पेश करना
ठीक नहीं
है बल्कि
आप मुझको
मोटीवेटर
और
कारपोरेट कंसल्टेंट
कह सकते
हैं।
जिसका काम
है कि
किसी की
परफार्मेंस
को किस
तरह
इंप्रुव किया
जा सकता
है।
सिद्वांत तौर
पर आप
कहें
सकते हैं
कि मैं
लोगों
को बेहतर
दिशा की
ओर आगे
बढ़ाने
की कोशिश
करता
हूं। मेरे
प्रोग्राम
का एक
ही
कांसेप्ट है
हाउ टू
इंप्रुव
टू क्वालिटी
आफ लाइफ।
कुछ चीजें
बहुत
फंडामेंटल होती
हैं उसका
अनुभव
हम व्यक्तिगत
जीवन
में ही
कर सकते
हैं। जब
कोई
अच्छी किताबें
पढ़ते
हैं, तो
उसका
सार अपने
प्रिय
के जीवन
में
उतारकर उसकी
सार्थकता
देखते
हैं तो
लगता है
कि ये
सिद्धांत
सही
हैं। सबसे
बड़ी
बात ये
भी है
कि आपको
किस
स्टेज पर
सही
मार्गदशन मिला।
जब आप
40-45
वर्ष की
उम्र
में होते
हैं तब
समझ में
आता है
कि आधी
जिंदगी
तो यूं
ही गुजर
गई, तब
लगता है
कि कहां
फोकस
करना चाहिए
कहां नहीं।
यही
मार्गदर्शन अगर युवावस्था
या
किशोरवस्था में
ही मिल
जाता है
तो
जिंदगी ही
बदल जाती
है।
दिक्कत ये
है कि
ज्यादातर
लोगों
ने अपने
जीवन की
स्क्रिप्ट
खुद नहीं
लिखी
होती है,
फिर दुखी
होते
हैं, स्थितियों
को
गड़बड़ नहीं
ठहराना
चाहिए।
आजकल की युवा पीढ़ी के बारे में क्या कहेंगे, क्या वो सही दिशा में चल रहे हैं?
मौजूदा
युवा पीढ़ी
भी तमाम
सुविधाओं
के
बावजूद कंफ्यूज
हैं।
हालात उन्हें
धक्का
देते हैं
और वो
उसी
हिसाब से
आगे बढ़
जाते
हैं। हौंसला
रहा नहीं।
सफलता
चुकाने की
कीमत
देने को
कोई
तैयार नहीं।
सबको
शार्टकट चाहिए।
दसवीं
तक अंदाज
ही नहीं
होता कि
करना
क्या है।
बिना
सोचे वो
अपने
कैरियर के
बारे
में फैसला
लेते
हैं। उन्हें
ये जानना
चाहिए
कि उनकी
रुचि
क्या है,
किसमें
उनकी दिलचस्पी
है,
किसमें वो
बेहतर
कर सकते
हैं।
अपने एप्टीट्यूड
की वो
टेस्टिंग
नहीं
करते। मैं
देखता
हूं कि
एमबीए
करने वाला
शख्स
मार्केटिंग
की
बजाये
फाइनेंस में
भी काम
करने को
तैयार
रहता है,
अरे भई
अगर आपको
फाइनेंस
ही करना
था तो
एमबीए
में समय
क्यों
बर्बाद किया,
फाइनेंस
में ही
बेहतर
तरीके से
कोर्स
करना चाहिेए
था।
क्या
हमारी शिक्षा
प्रणाली
अधूरी है,
जो
व्यक्तित्व का
पूर्ण
विकास नहीं
कर पाती
है?
ये बात
सही है
कि हमारी
मौजूदा
शिक्षा प्रणाली
व्यक्तित्व
का
विकास नहीं
करती।
मौजूदा शिक्षा
प्रणाली
रट्टू तोता
बनाती
है व्यक्तित्व
नहीं
बनाती। हमारी
शिक्षा
प्रणाली के
एजेंडा
में ही
पर्सनालिटी
की ओर
जोर नहीं
है।
अचानक कोई
बदलता
भी नहीं।
शिक्षक
को कहां
समय है
कि वो
ऐसा कर
पाये। न
तो टीचरों
को
छात्रों के
व्यक्तित्व
के विकास
में रुचि
है और
न ही
समय।
इसके लिए
छात्रों
को खुद
ही
कोशिश करनी
होगी।
अन्यथा हमारा
मौजूदा
सिलेबस तो
ऐसा है
कि रट
के जाइये
और उगल
दीजिये।
क्या आप
वाकई
लोगों को
या उनके
व्यक्तित्व
को उनकी
सोच-विचार
को बदल
देते
हैं?
ये
डिपेंड करता
है कि
उसका
आयुवर्ग क्या
है। यंग
एज में
किसी को
बदलना
ज्यादा आसान
होता है
बजाए
इसके कि
जब आप
अनुभवी
हो गये
हों।
सिस्टम के
बाहर
जाकर सिस्टम
कैसे
बनाया जा
सकता
है। मैं
तो लोगों
से यही
कहता
हूं कि
इंजीनियर
बनना है
तो
बेस्ट इंजीनियर
बनो,
टॉपर बने,
सर्वश्रेष्ठ
बनो।
तीन तीन
डिग्रियां
लेते हो,
इंजीयिरिंग
भी करते
हो, फिर
एमबीए
करते हो
फिर कुछ
और कर
लेते हो,
इसका
क्या मतलब
है, तीन
डिग्रियां
लेते हो
लेकिन
एवरेज बन
जाते हो,
इसके
बजाए ज्यादा
बेहतर
हो कि
स्पेशलाइजेशन
करो और
एक ही
जगह करो।
दरअसल
कई डिग्रियां
लेकर आप
अपनी
एनर्जी वेस्ट
करते हो
और
जिंदगी भर
बेहतर
होने की
बजाये
मीडियोकर बने
रह जाते
हो।
आप तो बड़े बड़े कारपोरेट हाउसों में जाते हैं, प्रोफेशनल्स से मिलते है, आमतौर
पर वहां क्या कमियां दिखती हैं?
दिक्कत
ये है
कि समय
तो बदल
रहा है
लेकिन
लोगों के
काम के
तरीकों
में कोई
बदलाव
नहीं आ
रहा। हर
कोई
पुराने ढांचे
में ही
चलना
पसंद करता
है।
दुनिया बदल
रही है,
ऐसे में
बदलाव
के प्रति
तैयार
रहना चाहिए,
जो
आमतौर पर
कम दिखता
है।
मोटिवेशन नहीं।
लोगों
में डर
भी नहीं
है। कई
बार
फीयर के
चलते
सक्सेज का
मोटीवेशन
आता है।
दुनिया
किसी के
लिए नहीं
रुकती।
कुछ लोग
बदलना
ही नहीं
चाहते।
खुद में
अनुभव
नहीं करते।
आने वाला
समय और
मुश्किल
होता जायेगा।
बड़े-बड़े
कारपोरेट
हाउसेस
में भी
बेशक हर
तरह के
लोग होते
हैं,
लेकिन बेहतर
और कमतर
लोगों
में क्या
अनुपात
होता है?
कुछ सही
मायनों
में प्रोफेशनल्स
होते हैं
लेकिन
ज्यादातर नहीं। 80
और 20
का अनुपात
होता
है। लेकिन
जो लोग
आगे
बढ़ते हैं,
उनमें
कुछ खास
तो होता
ही है।
एडजस्ट
करने वाला
स्टैंड
उन्हें आगे
बढ़ाता
है। आगे
बढऩे
वाले ज्यादातर
लोग ऐसे
होते
हैं जिनमें
नेतृत्व
का अंश
होता है,
कुछ
भाग्यशाली होते हैं।
आगे बढऩे
वाले या
लीडर्स
वो लोग
होते
हैं, जिनमें
कांफिल्क्ट्स
ज्यादा नहीं
होते।
नेतृत्व को
कन्फ्यूज
नहीं
होना चाहिए।
क्या आप मैरिज काउंसलिंग भी करते हैं, ये क्यों जरूरी है?
मैरिज
काउंसलिंग भी
मौजूदा
दौर के
हिसाब
से बहुत
जरूरी
हो चला
है।
पुरुषवादी सोच
वहीं की
वहीं है,
जबकि
जमाना बदल
रहा है,
कैरियर
वूमन आ
गई हैं।
पुराने
परिवार रहे
नहीं।
अगर ज्यादा
कमाते
नहीं और
बीबी
आपसे ज्यादा
अर्जित
कर रही
है तो
सम्मान
खत्म होने
लगता
है। पुरुषों
की सोच
जाने
में अभी
कई साल
लगेंगे।
आपके
सामने जिस
तरह के
मामले
आते हैं
और आप
किस बात
पर जोर
देते
हैं?
इंस्टीट्यूशन
है मैरिज।
इसमें
आपसी स्पंदन
बना रहना
चाहिए।
लेकिन आजकल
वो कम
नजर आती
है। दोनों
को ही
एडजस्ट
करना पड़ता
है। पति
और पत्नी
के
रिश्तों में
जो सरलता
और सहजता
होनी
चाहिए, वो
खत्म
होती जा
रही है।
सरलता
की जगह
सतर्कता
ने ली
है। दोनों
एक दूसरे
से काफी
कुछ
छिपाने लगे
हैं।
सबकी जिंदगी
में ऐसा
कुछ है,
जो वो
आपस में
एक दूसरे
को बताना
नहीं
चाहते। नब्बे
फीसदी
मामलों में
पति
पत्नियों को
बराबर
के पार्टनर
के रूप
में
ट्रीट नहीं
करते।
दरअसल पुरुषों
की
ग्रुमिंग उनके
मौजूदा
विवाह पर
ज्यादा
असर डाल
रहे
हैं। समय
बीतने
के साथ
रिश्ते
मुर्झाने लगते
हैं।
फिर खत्म
होने
लगते हैं।
अपेक्षाएं
बहुत ज्यादा
हैं।
भावनात्मक रिजर्व
कम हो
जाता है
और
पर्सपेक्टिव गड़बड़ा जाता
है।
आखिरी
सवाल, नई
युवा
पीढ़ी तेजी
से बदलती
परिस्थितियों
के साथ
तारतम्य
नहीं बिठा
पाती और
आमतौर
पर कुंठा
और
हीनभावना का
शिकार
हो जाती
है?
बिल्कुल
ऐसा हो
रहा है।
दुविधा
वाली स्थितियां
हैं, उसे
अपने
लिए स्वाभाविक
जगह बनानी
होगी,
ताकि अपना
स्वाभाविक
जीवन
अपने हिसाब
से जी
सके। उसे
समझना
होगा कि
उसकी
मजबूती क्या
है और
कमजोरी
क्या है।
अगर
कमाई कम
है और
खर्च
ज्यादा तो
कमाई के
साधन
बढ़ाने होंगे।
दरअसल
व्यक्तित्व के आंतरिक
और
बाह्य दोनों
रूप होते
हैं और
वाह्य
रुप तो
बदलना
आसान होता
है
लेकिन सबसे
ज्यादा
जरूरी है
आतंरिक
रूप को
बदलना
कि आप
किस तरह
से सोचते
विचारते
हैं।
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