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Posted Wed, 02/01/2012 - 22:09 by admin

उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशती रालोद और कांग्रेस ने विधान सभा चुनाव में गठबंधन कर प्रदेश की राजनीति में नए संभावनाओं और परिवेश को उत्पन्न किया है। विधान सभा चुनाव मेेंं रालोद की रणनीति की जानकारी हासिल करने के लिए हमारे संवाददाता अभिषेक गुप्ता ने केन्द्रीय विमानन मंत्री व रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह से विस्तृत बातचीत की

उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस- रालोद गठबंधन को क्या उम्मीद है?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल और कांग्रेस गठबंधन निश्चित रूप से अच्छा प्रदर्शन करेगा। मायावती के शासन में पार्कों और मूर्तियों पर सार्वजनिक धन की जो बर्बादी की गई है तथा मनरेगा जैसी योजनाओं में सरकारी कोष की जो लुटाई हुई है, वह सब जनता के सामने आ चुका है। जनता निश्चित रूप से बसपा प्रत्याशियों को इस चुनाव में सबक सिखाने जा रही है। समाजवादी पार्टी की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। इस हालात को देखते हुए जनता के सामने राष्ट्रीय लोकदल-कांग्रेस गठबंधन एक सशक्त विकल्प है। इन पार्टियों से पैदा हुए स्पेस को यह गठबंधन ही भरेगा और प्रदेश में एक मजबूत विकल्प देगा।
उत्तर प्रदेश के नतीजे २०१४ के लोकसभा चुनाव के पहले देश की राजनीति पर क्या असर डालेंगे?
देखिए, यह इस पर निर्भर करेगा कि चुनाव के बाद जो सरकारें सत्ता में आती हैं, वे जनता के सामने कैसा प्रदर्शन करती है। हमें जनता पर भरोसा करना चाहिए कि वह विधानसभा चुनाव में अच्छे और सच्चे प्रतिनिधियों को चुनेगी। देश में मजबूत लोकतंत्र का पथ प्रशस्त करेगी।
आप अपनी भूमिका इस चुनाव में कहां पाते हैं?
इस चुनाव में मेरी भूमिका प्रभावशाली सक्रियता के साथ होगी। अपने प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार के दौरान हम आम जनता को पार्टी की नीतियों तथा हमारा गठबंधन किस तरह अन्य दलों से बेहतर है, चुनाव सभाओं के माध्यम से लोगों तक पहुंचाएंगे। कांग्रेस रालोद गठबंधन उत्तर प्रदेश में सक्रिय भूमिका निभाएगा और कांग्रेस रालोद प्रदेश की राजनीति में नए संभावनाओं को जन्म देगा।
लोकपाल पर आपने अन्ना का समर्थन किया। कांग्रेस ने वैसा लोकपाल नहीं दिया। क्या इससे चुनाव में कोई असर नहीं पड़ेगा?
मैं समझता हूं कि लोकतंत्र में सबकी राय अलग-अलग हो सकती है। यह जो बिल संसद में रखा गया है इसके स्वरूप को लेकर कुछ लोगों के मन में इस बात को लेकर शंका हो सकती है कि क्या यह एक असरदार संस्था खड़ी कर पायेगा? संसद भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई पहला कानून नहीं बना रही हैं। कानून कई हो सकते हैं। प्रश्न कानून के क्रियान्वयन का होता है। सिर्फ घूस लेना ही भ्रष्टाचार नहीं है। यदि हम देश के आम नागरिक को उसके अधिकारों से वंचित करते हैं, दलितों और महिलाओं को उत्पीड़ित करते हैं। किसान को उसके उत्पादन का सही मूल्य नहीं देते हैं, उसकी जमीन को जबरन अधिग्रहित करते हैं, यह सब भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही आता है।
भूतपूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह कहा करते थे कि भ्रष्टाचार का रिसाव ऊपर से नीचे की ओर होता है। सार्वजनिक जीवन और उच्चतम पदों पर ईमानदार लोग आते हैं तो उसका प्रभाव निचले स्तर तक पहुंचता है। इसलिए बुनियादी जरूरत है कि शीर्ष पदों पर बैठे लोग ईमानदारी का आचरण करें तथा समाज को इस दिशा में जागरूक बनाया जाए। मौजूदा लोकपाल बिल की खामियों को संसद में दूर किया जा सकता है, किंतु बुनियादी जरूरत सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता तथा एक सतत जागरुक समाज की है। उत्तर प्रदेश में चुनावी मुद्दा मायावती और उनकी बसपा का भ्रष्टाचार होगा। हम प्रदेश में एक सशक्त लोकायुक्त के पक्ष में है और अपनी प्रतिबद्धता के प्रति दृढ़ संकल्प है।
जाट आरक्षण पर आपकी रणनीति क्या है तथा आप इसे चुनाव से जोड़कर किस तरह देखते हैं?
जहां तक जाट आरक्षण का सवाल है, यह मांग लंबे समय से चली आ रही है। इस विषय में मैं बताना चाहूंगा कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश, और महाराष्ट्र की राज्य सूची में जाटों को पिछड़े वर्ग के रूप में देखा गया है। कांग्रेस पार्टी ने जाटों को केंद्रीय पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल करने की मांग का समर्थन किया है। जाट आरक्षण की मांग को चुनाव से जोड़कर देखना संकीर्ण राजनीति है। यह एक न्यायोचित और पुरानी मांग है।
आज आप किसान की किन समस्याओं को सबसे चुनौतीपूर्ण मानते हैं? आप अपने पिता चौधरी चरण सिंह जी की नीतियों को इस संदर्भ में कितना प्रासंगिक मानते हैं?
किसान की जो सनातन समस्याएं है वह आज भी बरकरार हैं। फसल तैयार करने में प्रयोग होने वाली खाद उसे महंगी मिलती है। कालाबाजारी में खरीदनी पड़ती है और कभी-कभी समय पर मिलती ही नहीं, अच्छे बीज भी उसे उपलब्ध नहीं हो पाते, सिंचाई के लिए डीजल महंगा मिलता है, पर्याप्त मात्रा में बिजली नहीं मिलती। इन स्थितियों के चलते एक ओर तो उसकी उपज की लागत बढ़ जाती है, दूसरी ओर सरकार से और बाजार से उसके उत्पाद की मिलने वाली कीमत लागत मूल्य से भी कम होती है। इस देश का बिचौलिया वर्ग किसान और उपभोक्ता, दोनों की खुली लुट करता है।
किसान एक जमाने में फसल की लूट और प्राकृतिक प्रकोप से तो जूझता ही रहा है, किंतु बसपा सरकार ने इधर किसान की जमीन की भी लूट शुरू कर दी। मोटा कमीशन लेकर किसानों की उपजाऊ कृषि भूमि कौड़ियों के मोल जबरन अधिग्रहित कर बिल्डरों के हाथ बेच रही है। बिल्डर उस जमीन पर मल्टीप्लैक्स और बहुमंजिली आवासीय बिल्डिंग्स बनाकर और नई-नई शहरी परियोजनाओं के नाम पर मोटा मुनाफा काट रहे हैं। एक अप्रासंगिक बन चुके भूमि अधिग्रहण कानून के जरिए किसान से उसकी जीविका ही नहीं, उसका आत्म सम्मान भी छीना जा रहा है। जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी किसान की इज्जत से जुड़ा होता है। यही वजह है कि किसान भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर इतना उद्वेलित है।

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