
Posted Wed, 02/01/2012 - 23:36 by admin
अमिताभ ठाकुर
क्या यही सच है? क्या वास्तव में यह सच है? क्या ऐसा होता है? क्या ऐसा भी होता है?
ये तमाम ऐसे प्रश्न हैं जो अकसर लोग आपस में पूछ रहे हैं जब भी वे महाराष्ट्र कैडर
के पूर्व आईपीएस अधिकारी वाई पी सिंह की पुलिस पर आधारित "क्या यही सच है" फिल्म
देख रहे हैं। वाई पी सिंह आज देश के आईपीएस अफसरों में एक बहुत ही चर्चित नाम हैं।
उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले योगेश प्रताप सिंह वर्ष 1985 में भारतीय पुलिस
सेवा में आये थे और उन्हें महाराष्ट्र कैडर मिला था। वे अन्य तमाम आईपीएस अधिकारियों
से सर्वथा अलग थे और उनके लिए अपने व्यक्तिगत हितसिद्धि से कहीं बहुत आगे बढ़ कर उनका
कर्तव्य था। वे मानते थे कि एक आईपीएस अधिकारी के रूप में उनका उद्देश्य केवल गाड़ी,
बंगला, नौकर-चाकर और बड़े-बड़े ओहदे नहीं हैं बल्कि जनता की सच्चे हृदय से सेवा करना
है। जिसमें सौभाग्य से उनकी पत्नी आभा सिंह की भी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही।
लखनऊ की ही रहने वाली आभा स्वयं भारतीय पोस्टल सर्विस की अधिकारी हैं।
योगेश और आभा की जोड़ी ने शुरू से ही आईपीएस की नौकरी अपने बल पर, अपने ऊँचे आदर्शों
के तहत करने का दृढ निश्चय किया और योगेश ने अंत तक अपनी इस प्रतिज्ञा को कायम रखा।
लेकिन कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। जिस प्रकार से व्यवस्था में गड़बड़ियां
आती जा रही हैं उसके कारण उन्हें अपनी नौकरी में लगातार दिक्कतें आती रहीं। जब उन्हें
यह महसूस होने लगा कि वे इस सेवा में प्रतिष्ठा से नौकरी नहीं कर पायेंगे तो
उन्होंने अपने आप को किसी अन्य क्षेत्र में शिफ्ट कर लेने का निश्चय कर लिया।
नतीजतन उन्होंने महाराष्ट्र विश्वविद्यालय में एलएलबी में दाखिला लिया और वहाँ से
एलएलबी में सबसे अधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए। बीस साल की नौकरी पूरी होते ही
उन्होंने आईपीएस की सेवा से वोलंटरी रिटायरमेंट ले लिया और अब वे मुंबई के जाने-माने
सोशल एक्टिविस्ट और अधिवक्ता हैं।
सेवा में रहते हुए ही वाई पी सिंह ने लगभग अपने जीवन को आधार बना कर एक पुस्तक लिखी
थी- "कारनेज ऑफ एंजेल्स"। वैसे तो यह नाम के लिए उपन्यास है लेकिन कुल मिला कर यह
उनके स्वयं के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती हुई कहानी थी जिसमें एक बहुत ही ईमानदार और
कर्तव्यनिष्ठ युवा आईपीएस अफसर के जीवन और उसकी नौकरी में आने वाली कठिनाईयों को
बहुत गहराई के साथ दर्शाया गया था। अब वाई पी सिंह और उनकी पत्नी आभा ने मिल कर इसी
उपन्यास को आधारित करते हुए यह हिंदी फिल्म भी बनाई है, नाम दिया है- "क्या यही सच
है"।
मैंने जब इस फिल्म के रिव्यू पढ़े थे तो ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने यही कहा था कि
फिल्म की कहानी तो बहुत अच्छी है लेकिन फिल्म तकनीकी दृष्टि से बहुत सामान्य है। यह
बात भी आई थी कि इस फिल्म के ज्यादातर पात्रों का अभिनय बहुत ही निम्नस्तरीय है।
कैमरा वर्क, एडिटिंग आदि की भी निंदा ही की गयी थी। इन सबों के बाद भी सभी फिल्म
समीक्षकों ने यह माना था कि इस फिल्म की कहानी में बहुत दम है। यह कहानी इसलिए भी
अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह फिल्म किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं बनाई है
बल्कि उस व्यक्ति द्वारा बनाई गयी है जो स्वयं ही इस व्यवस्था का हिस्सा रहा है, जो
स्वयं एक आईपीएस अफसर रहा है, जिसने स्वयं अपनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के कारण
भारी मुसीबतें झेली हैं।
वैसे तो वाई पी सिंह मुझसे सेवा में कुछ साल सीनियर हैं लेकिन मिजाज और हावभाव में
साम्य होने के नाते कहीं ना कहीं एक दोस्ती और गहरे अपनेपन का भाव हमेशा से रहा है।
लिहाजा मैंने यह फिल्म ना सिर्फ स्वयं देखी बल्कि पूरे परिवार को दिखाई। फिल्म में
एक्टिंग कैसी है, कैमरा वर्क कैसा है, एडिटिंग कैसी है यह सब अपनी जगह महत्वपूर्ण
प्रश्न होते हैं लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद मैंने यह महसूस किया कि कई बार ऐसा
होता है कि फिल्म की कहानी इतनी सशक्त और ईमानदार हो जाती है जिसके कारण शेष सभी
बातें बिलकुल ही गौण हो जाती हैं।
इस कहानी का हीरो (या मुख्य पात्र) रघु कुमार एक युवा आईपीएस अफसर है। वह बहुत से
आदर्श, बहुत से सपने ले कर पुलिस की सर्वोच्च सेवा का अंग बनता है, लेकिन यहाँ आ कर
वह क्या देखता है? वह देखता है कि आईपीएस अफसरों की बीवियां थानों के दरोगाओं से
जबरदस्ती धन-उगाही कर रही हैं, मौज मस्ती कर रही हैं और थानों के इंचार्ज अपनी
कुर्सी बचाने के लिए मरे हुए लोगों के गहने नोच के इन मेमसाहबों को भेंट दे रहे
हैं। मैं जब यह सीन देख रहा था तो मुझे याद आया मेरा स्वयं गोरखपुर में एएसपी के
रूप में वह समय जब वहाँ के एक एसएसपी के कार्यकाल को पेटीकोट गवर्नमेंट कहते थे
क्योंकि पूरे जिले की पुलिस में यह चर्चा थी कि पैसों की वसूली मेमसाहब के हाथों
होती है। इसी तरह से जब मैं देखता हूँ कि डीआईजी त्रिपाठी रघु कुमार से तो मिलने पर
बहुत ही बदतमीजी से पेश आता है पर जमाने भर की सारी बदनाम औरतों और दलालों के साथ
घंटों बड़ा भला बन कर समय बिताता है तो मुझे अपने ट्रेनिंग के वे दिन याद आते हैं जब
मैं एक डीआईजी के पास मिलने गया था और उस डीआईजी ने मुझे कई घंटों अकारण बाहर बैठाए
रखा था। मिलने पर भी उस डीआईजी का व्यवहार ऐसा था कि चाह कर भी मुझे दुबारा उससे
मिलने की इच्छा नहीं हुई। जब मैं देखता हूँ कि रघु कुमार बेचारा एक फर्जी जांच में
बुरी तरह फंसा दिया जाता है तो मुझे स्वयं का पुलिस अधीक्षक गोंडा का कार्यकाल याद
आ जाता है जब मैं फर्जी ढंग से अपराधियों को आर्म्स लाइसेंस देने वाले गिरोह का
लगभग सदस्य बना ही दिया गया था और यदि मेरी किस्मत खराब रहती तो शायद मैं भी रघु
कुमार की तरह अपनी नौकरी के बाहर कहीं और अपना समय गुजार रहा होता।
कुल मिला कर मतलब यह कि भले ही कुछ बाहरी लोगों को ऐसा महसूस हो कि "क्या यही सच
है" की कहानी में बहुत अतिरेक है और यह सत्यता से परे है पर लगभग बीस साल इस नौकरी
में गुजार लेने के बाद जहाँ तक मैं देख पाता हूँ मुझे इसमें कुछ भी ज्यादा नहीं
दिखता। मैं स्वयं इनमें से कई स्थितियों का भुक्तभोगी रहा हूँ जब मैं चालाक और लालची
लोगों के षडयंत्र का शिकार हुआ हूँ। यह बात भी मैं जानता हूँ कि मैं ऐसा अकेला
व्यक्ति नहीं हूँ। व्यवस्था के कथित डर के शिकार कई लोग अपना मुंह नहीं खोलते और
चुपचाप यह सब सहन करते रहते हैं।
यह चुप्पी ही इस इस व्यवस्था को और अधिक नुक्सान पहुंचा रही है। "क्या यही सच है"
को सामने ला कर वाई पी सिंह ने इस व्यवस्था पर चोट पहुंचाने का एक बेहतर और हिम्मती
प्रयास किया है। हममें से हर उस व्यक्ति को, जो एक बेहतर पुलिसिंग और एक बेहतर
व्यवस्था का पक्षधर है, वाई पी सिंह की फिल्म में प्रस्तुत सन्देश को समझते हुए उसे
आगे बढ़ाने की पूरी ईमानदार कोशिश करनी चाहिए।
लेखक उ.प्र. में आईपीएस अधिकारी तथा नेशनल आरटीआई फोरम के अध्यक्ष हैं।
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