अधूरी तैयारी लूट जारी

भ्रष्टïचार एवं लूट खसोट के बीचकॉमनवेल्थ गेम्स बिलकुल उसी तरह सामने खडे हैं, जिस तरह बारात दरवाजे पर आकर खड़ी होती है। अपने कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों को देखें तो अभी भी बेशुमार कमियों का अंबार पहाड़ की तरह खडा है। न स्टेडियम पूर हो पाए हैं, न गंदगी साफ हो पाई हैं। साफ-सफाई पर सवाल खड़े किए जा चुके हैं। सुरक्षा को लेकर कोई रिहर्सल हुआ नहीं। दिल्ली की सड़कों पर ट्र्रेफिक की बदइंतजामी से कैसे निपटा जाएगा। संचार प्रणाली के साथ सारे इंतजाम को भी आजमाया जाना बाकी है। महज एक महीने का समय और अधूरे काम को पूरा करने की सैकड़ों चुनौतियां। कॉमनवेल्थ गेम्स के खोखले दावों पर रत्ना श्रीवास्तव की रिपोर्ट

  • सोचिये, कहां हम ये मानकर चल रहे थे कि इन खेलों से एक ताकतवर देश की इमेज पूरी दुनिया में पेश करेंगे, कहां अब पसीने इस बात को लेकर छूट रहे हैं कि कहीं ये खेल हमारी छीछालेदर न करा दें

रुआत दो शहरों की कहानी से करता हूं। एक चीन का गुआनझाउ और दूसरा शहर है दिल्ली। दोनों में एक समानता है। दोनों को करीब सात साल पहले दो बड़े खेल आयोजनों की जिम्मेदारी मिली। दिल्ली को मिली कामनवेल्थ गेम्स की और गुआनझाऊ को एशियाई खेलों की। कामनवेल्थ गेम्स तीन अक्तूबर से 13 अक्तूबर तक होने हैं तो एशियाई खेल 12 नवंबर से। लेकिन दोनों में एक असमानता भी है, जहां चीन के इस शहर में सारे काम समय से सौ दिन पहले ही पूरे हो चुके हैं वहां दिल्ली अभी भी खेलों से चंद दिनों दूर तमाम समस्याओं से जूझ रहा है-काम पूरे नहीं हुए हैं, तमाम साइट्स पर समय पर काम पूरा होने की कोई गारंटी भी नहीं है, गंदगी का आलम है, भ्रष्टाचार के ढेरों आरोप हैं और दुनियाभर के मीडिया में हमारी बदनामियों के किस्से उछल रहे हैं तो गुआनझाऊ सौ दिन पहले अपने खेलों से पहले का उत्सवधर्मिता से जुड़ा कांटडाउन शुरू कर चुका है। उनका टीवी अब रोज ये दिखा रहा है उनके किस स्टेडियम की खासियतें क्या हैं, चीन के सबसे बड़े औद्योगिक शहर कहे जाने वाले गुआनझाऊ के क्या ठाठ हैं, शहर किस तरह से दुनियाभर को शोकेज होने के लिए सज चुका है, इस शहर में आजकल रोज खेलों से जुड़े रिहर्सलों और उत्सवों की बहार है। मतलब आप समझ चुके होंगे।

चीन दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है जबकि हम दुनिया की आर्थिक ताकतों में ग्याहरवें नंबर पर हैं। दुनियाभर में होने वाले बड़े खेल आयोजन अब खेलों से कहीं ज्यादा देशों की गर्वनेंस, ताकत, संपन्नता और रूतबे का प्रतीक बनकर उभरे हैं। एक सफल आयोजन का मतलब ये भी होता है कि नई अर्थव्यवस्था और बदलती हुई दुनिया में आप अपनी हैसियत का बखूबी मुजाहिरा करते हैं। दो साल पहले चीन ने बीजिंग ओलंपिक के लिए जब अपने देश के दरवाजे खोले तो चमचमाते बीजिंग के वैभव और सुनियोजित विकास को देखकर पूरी दुनिया चकित रह गई। बेशक चीन ने पूरी दुनिया को उतना ही दिखाया, जितना वो दिखाना चाहता था, वहां प्रेस पर कड़ा प्रहरा है और ये पाबंदी दुनियाभर से आये मीडिया पर भी लागू रहीं, यानि चीन दुनियाभर के मीडिया को एक सीमित दायरे से बाहर आने जाने की इजाजत नहीं दी थी।

सड़कों का अलग बुरा हाल है। जहां कहीं फ्लाईओवर बनने थे, वहां भी काम अभी चल रहा है। ट्रैफिक पर काबू कैसे पाया जायेगा, ये अभी दिल्ली सरकार और पुलिस की समझ में नहीं आ रहा है


भारत में ऐसा नहीं है, यहां प्रेस को पूरी आजादी है, इसलिए यहां की हर कमी से सहजता से मीडिया में उछल भी जाती है, लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि हम कामनवेल्थ गेम्स के नाम पर हुई अनियमितताओं, लापरवाहियों और अदूरदर्शिता पर आंखें मूंद सकते हैं। कहां भारत ने कामनवेल्थ गेम्स कराने से पहले ये सोचा था कि जब 2010 में करीब सत्तर देश के एथलीट और विदेशी मेहमान दिल्ली में कदम रखेंगे तो उन्हें इस बदले हुए देश की संपन्नता और तेजी से हो रहे विकास के भरपूर दर्शन होंगे, दिल्ली शहर लाखों की संख्या में भारत आने वाले मेहमानों का मन मोह रहा होगा, लोग यहां की आलीशान लाइफ स्टाइल और शहर के ठाटबाट देखकर चकित हो रहे होंगे और तब उनके दिमाग में एक अलग भारत की छवि बनेगी। साथ ही साथ हमारे विशालकाय स्टेडियमों और जोरदार आयोजन से दुनिया में हमारी जो धाक जमेगी सो अलग। लेकिन अभी तो तस्वीर कुछ और ही उभर रही है। खेलों की तैयारी आधी अधूरी है, कहीं कहीं ये आलम है कि जगहंसाई की नौबत आ सकती है। खेलों पर अस्सी हजार करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद अब तक देश की राजधानी हर ओर से खुदी पड़ी है, जबरदस्त बरसात ने गेम्स से ऐन पहले तैयारियों को सही समय पर पूरा होने की उम्मीदों पर और भी पानी फेर दिया है। लेकिन इसका दोष हमें बरसात को नहीं बल्कि अपने खराब प्रशासन और ऊंचे स्तर पर व्याप्त लापरवाही और अदूरदर्शी तौरतरीकों को देना चाहिए। अन्यथा क्या कारण है, जो सारी तैयारियां मार्च 2010 तक खत्म हो जानी चाहिए थीं, वो अब तक जारी हैं, और कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां अब किसी को भी कुछ समझ मंें नहीं आ रहा है, सबके हाथ -पांव फूल रहे हैं। खेलगांव बन चुका है, लेकिन उनकी फिनिशिंग पर सवाल खड़े हो चुके हैं, उसकी फर्नीशिंग पर खुद फिनेल असंतुष्ट नजर आये।
हैरत की बात ये है कि कामनवेल्थ गेम्स की लागत को 18 गुना से कहीं ज्यादा बढ़ा लेने के बाद हम आज खड़े कहां हैं। जहां खड़े हैं, वहां हमें केवल इतना लग रहा है कि हे भगवान बस किसी तरह इन खेलों में सफल तरीके निपटा दे, कोई गड़बड़ नहीं हो, कोई आलोचना न हो, कोई हादसे नहीं हों-हकीकत ये है कि खेलों से चंद दिनों पहले तक सुरक्षा, संवाद, आयोजन और सरकारी मशीनरी को लेकर कोई तालमेल नहीं है, कोई फुल रिहर्सल नहीं हो पाई है- हो पाने का समय भी नहीं बचा है। सोचिये, कहां हम ये मानकर चल रहे थे कि इन खेलों से एक ताकतवर देश की इमेज पूरी दुनिया में पेश करेंगे, कहां अब पसीने इस बात को लेकर छूट रहे हैं कि कहीं ये खेल हमारी छीछालेदर न करा दें, हमारे लिए शर्मिंदगी का कारण नहीं बन जाएं।

क्या हैं इन देशों की सोच

स्कॉटलैंड
स्काटलैंड की सबसे बड़ी चितां ये है कि वहां 2014 में ग्लासगो में कॉमनवेल्थ गेम्स होने है। ऐसे में दिल्ली में खेल अगर सही तरीके से संपन्न नहीं होते तो इसकी ब्रांडिंग करना और इससे हुए नुकसान की भरपाई करना खासा मश्किल काम होगा। ग्लासगा में होने वाले कॉमनवेल्थ खेल के सीईओ जॉन स्टॉक का कहना है कि लगातार सुनने में आ रहा है कि दिल्ली में खेलों की तैयारी नियंत्रण में नहीं है पर हमें पूरी उम्मीद है कि सब कुछ ठीक हो जाएगा।

इग्लैंड
भारत दौरे पर आए लॉर्ड सेबेस्टियन कोए ने खेल के ऑर्गेनाइजर को क्लीनचिट प्रदान की है। जो यह जताता है कि ब्रिटिशर्स अपने पड़ोसियों स्कॉटलैंड की तरह इसे लेकर उतने बैचेन नहीं है। पर इतना जरूर है कि वह गेम्स की सफलता को संदेह की नजर से देख रहे हैं। बीबीसी द्वारा दिखाई गई कुछ डाक्यमेंट्री और रिपोर्ट में बार-बार एक सवाल उठाया जा रहा है कि क्या भारत तेजी से उभरती महाशक्ति के खिताब को साबित कर पाएगा।

कनाडा
कनाडा के ब्राडकॉस्टरों ने गेम्स के टेलीकास्ट राइट खरीदे है। कनाडा ब्राडकॉस्टिंग कार्पोरेशन सितंबर के अंत तक दिल्ली पहुंच जाएंगे। वहां के मशहूर पत्रकार स्कॉट रसेल खेलों के कवरेज का नेतृत्व करेंगे। कनाडा के एथलीट क्रिस्पियन ड्यूनेस का कहना है कि भारत में गेम्स में भाग लेना वाकई एक आनंददायक अनुभव है लेकिन अधूरी तैयारी की आ रही रिपोर्ट चिंतित कर रही है लेकिन हम पूरे जोश के साथ ट्रेनिंग की तैयारियों में लगे हुए है।

आस्ट्रेलिया
शुरुआत से आस्ट्रेलिया, दिल्ली में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स का आलोचक रहा है। हाल ही में आस्ट्रेलियन कॉमनवेल्थ फेडरेशन के मुखिया पेरी क्रासव्हाइट ने सुझाव दिया था कि खेलों को मेलबर्न शिफ्ट कराया जाए क्योंकि दिल्ली में खेलों की तैयारियों पूरी नहीं है।

मलेशिया
कुआलालांपुर में 1998 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद भारत दूसरा एशियाई मुल्क है जो कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन कर रहा है। मलेशिया के युवा एवं खेल मामलों के मंत्री जब भारत दौरे पर आए तो उन्होंने कहा कि भारत ने मलेशिया की उम्मीदवारी का समर्थन किया था। हम भी भारत के साथ है।

न्यूजीलैंड
तीन बार कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन कर चुके न्यूजीलैंड दल के एक प्रमुख सदस्य का कहना है कि हम राजनीतिक कारणों से भारत जा रहे हैं क्योंकि अगर हम भारत नहीं जाते तो इसका मतलब नकारात्मक जाता। पर हर तरफ से आ रही भ्रष्टïाचार की खबरें और खेलों में हो रही देरी चिंता की बात है। सिक्योरिटी एक बड़ी चिंता है जब तक हम इसके प्रति पूरी तरह आश्वस्त नहीं होंगे हम अपना अंतिम फैसला नहीं लेंगे।

जमैका
जमैका ने 1966 में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन किया था। जमैका के प्रमुख खेल प्रशासक का कहना है कि विकसित देशों के साथ ऐसी समस्याएं तो होती है लेकिन पश्चिमी मुल्क इसे नहीं समझते। उन्होंने कहा कि अक्तूबर में होने वाली बैठक में हम भारत के साथ मजबूती से खड़े होंगे। हम भारत की खेल से जुड़ी महात्वाकांक्षा को समझते हैं और हमारा पूरा समर्थन भारत को है।

दक्षिण अफ्रीका
फीफा विश्व कप का आयोजन करने वाले दक्षिण अफ्रीका का कहना है कि अगर हम सफल आयोजन कर सकते हैं तो भारत क्यों नहीं। हमें पूरी उम्मीद है कि भारत उम्मीदों पर खरा उतरेगा। वल्र्ड स्विमिंग फेडरेशन के उपाध्यक्ष और आईओसी के सदस्य सेम रामस्वामी का कहना है कि हम लगातार आयोजनकर्ताओं को बता रहे हैं कि क्या किया जाना है। हालांकि काम उतनी रफ्तार और बेहतरी से नहीं हो रहा।


डेढ़ साल पहले से खतरे की घंटियां बजनी शुरू हो गई थीं। तब पहली बार फिनेल ने कामनवेल्थ गेम्स के आयोजकों को सूई चुभोकर जताया कि तैयारियां सही तरीके से नहीं चल रही हैं, तब इसके जरिए फिनेल के भी अपने निहितार्थ थे, वो दबाव के जरिए अपने कई लोगों को कंसलटेंट के तौर पर आर्गनाइजिंग कमेटी से जोड़कर खुद भी मलाई खाना चाहते थे। कई विदेशी फर्मों को दिये गये ठेके इस ओर संकेत भी करते हैं। लेकिन जब उन्होंने तब खतरे की घंटी बजाई थी और इसके बाद खेल मंत्रालय और दिल्ली सरकार ने कामनवेल्थ गेम्स आर्गनाइङ्क्षजग कमेटी की चूड़ी कसनी शुरू की, सही मायनों में हमारी कामनवेल्थ गेम्स की तैयारियां भी तभी से ही शुरू हुईं। लेकिन इसके बाद तैयारियों को वो गति कभी नहीं मिल पाई, जो होनी चाहिए थी। दिल्ली के इंफ्रास्ट्रक्टचर और सौंदर्यीकरण पर काम भी तभी शुरू हुआ। अचानक पूरी की पूरी दिल्ली देखते ही देखते खोद दी गई। दिल्ली का काम चूंकि तीन एजेंसियों एमसीडी, एनडीएमसी और डीडीए के भरोसे था और तीनों में ही तालमेल नहीं है, इसलिए तीनों ने काम करने की बजाये लालफीताशाही और बाधाएं खड़े करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। नतीजा ये कि न तो कनाट प्लेस तैयार हो पाया न इसके आसपास का एरिया, अंडर पास भी अधूरे पड़े हैं। सड़कों का अलग बुरा हाल है। जहां कहीं फ्लाईओवर बनने थे, वहां भी काम अभी चल रहा है। ट्रैफिक पर काबू कैसे पाया जायेगा, ये अभी दिल्ली सरकार और पुलिस की समझ मं नहीं आ रहा है। कामनवेल्थ गेम्स के दिनों के लिए एक अलग मौजूदा सड़कों के बीच में बनाई गई है, जो शायद पीक आवर्स में हमारे ट्रैफिक की अव्यवस्था और मारामारी को बढायेगी ही। अब तक ये तस्वीर साफ हो जानी चाहिए थी कि किस तरह आफिसों का समय बदलेगा। कौन से बाजार कितने बजे खुल सकेंगे और लोगों को कैसे आना जाना चाहिए। ये तय मानिये कि गेम्स के दिनों में एक फरमान जारी होगा, आम लोगों का आना जाना रोक दिया जायेगा, यानि इन खेलों से आम आदमी के तमाम कामकाज ही प्रभावित होंगे और उनकी कमर टूटेगी।

भले ही कलमाडी ये दावा करते रहे हों कि दिल्ली का खेलगांव बीजिंग ओलंपिक के खेल गांव से बेहतर है, लेकिन असलियत ये भी है कि फेनेल यहां बनी कछ इमारतों से भी संतुष्ट नहीं थे

स्टेडियमों और खेल गांव का हाल

स्टेडियमों में अभी भी फिनिशिंग और साफ सफाई का काम चल रहा है। गंदगी और मलबों के ढेर पड़े हैं। सैकड़ों करोड़ के रेनोवेशन के बाद भी स्टेडियम में गंदगी और अव्यवस्थाओं का आलम चकित करने वाला है। एक अगस्त से स्टेडियम को साफ सफाई करने वाली एजेंसियों को सुपुर्द किया जाना था, लेकिन वैसा कैसे होगा अगर स्टेडियम का काम ही खत्म नहीं हुआ।
बरसात के चलते कामकाज पर और भी असर पड़ा है। आमतौर पर भारत में बारिश का मौसम सितंबर के आखिर तक चलता है, लिहाजा आयोजन की तारीखे तय करते समय इसका ख्याल रखा जाना चाहिए। गेम्स की तिथियां अगर दिसंबर में तय होतीं तो ये भारत के लिहाज से सबसे आदर्श महिना था। आमतौर पर पूरी दुनिया में बड़े खेल आयोजनों के दौरान मौसम का बहुत ख्याल रखा जाता है। ये भी आयोजकों की गफलत और थिंकटैक की नाकामी कही जायेगी कि उन्होंने आयोजन की तिथियों को बरसात के मौसम से इतना सटा कर रखा। खेल गांव को बनाने में बड़ा घोटाला तो हुआ ही। इसे बनाने वाली कंपनी एमजीएफ पर भी तमाम तरह की गड़बडिय़ों के आरोप हैं। बताया जा रहा है कि इसके कुछ फ्लैट्स की फिनिशिंग मानकों के अनुरूप नहीं है। खुद आयोजन समिति के वाइस चेयरमैन रणधीर सिंह ने माना है कि अगर रात-दिन काम नहीं हुआ तो मुश्किल हो जायेगी। खेल गांव को 16 सितंबर को खुलना है लेकिन मौजूदा हाल ये है कि चारों तरफ यहां कीचड़ और पानी है। 16 सिंतबर को अगर ये खुलेगा तो भी इसके हाल में कोई खास बदलाव हो, क्योंकि दिल्ली में तब तक बरसात जारी ही रहेगी। भले ही कलमाडी ये दावा करते रहे हों कि दिल्ली का खेलगांव बीजिंग ओलंपिक के खेल गांव से बेहतर है, लेकिन असलियत ये भी है कि फेनेल यहां बनी कछ इमारतों से भी संतुष्ट नहीं थे। खुद रणधीर सिंह जब 18 अगस्त को फिनेल के साथ खेलगांव गये तो वहां की स्थिति से संतुष्ट नहीं दिखे। कामनवेल्थ फेडेरेशन के अध्यक्ष ने इस पर भी ऊंगली उठाई है।

कई स्टेडियम ऐसे हैं, जहां कामनवेल्थ गेम्स तक काम पूरा होने की कोई गुंजाइश दिखती ही नहीं। यमुना स्पोट्र्स कांप्लैक्स का ड्रेनेज सिस्टम खराब है, बरसात के कारण यहां का मैदान और व्यवस्थाएं प्रभावित हुई हैं। ज्यादा बारिश से ही जब यहां पानी भर गया तो पता चला कि ड्रेनेज सिस्टम तो काम ही नहीं कर रहा। पहले यहां तीरंदाजी की मुख्य प्रतियोगिताएं कराने की बात कही गई थी लेकिन अब शायद वहां प्रारंभिक प्रतियोगिताएं ही कराई जाएंगी। एक महिने पहले तक आलम ये है यहां टाइल्स, पाइप्स, ईंटे बिखरे पड़े हैं, मलबा और गंदगी इकट्ठा है।
शिवाजी स्टेडियम का तैयार होना तो एकदम ही मुश्किल लग रहा है। स्टेडियम के निर्माण में एक महिने पहले तक गति नहीं आई थी। स्टेडियम में पानी इकट्ठा है। एनडीएमसी द्वारा बनाये जा रहे इस स्टेडियम को लेकर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं। ये भी सवाल है कि स्टेडियम के पुराने ढांचे को क्यों पूरी तरह तोड़ दिया गया। तालकटोरा स्टेडियम बेशक बनकर तैयार है लेकिन इसके बाहरी दोनों तरफ कीचड़ और मलबे का ढेर पड़ा है। सौंदर्यीकरण का काम चल रहा है। ये काम शायद बरसात के बाद ही पूरा हो पाये, लेकिन बरसात के मौसम के बाद समय ही कहां बचेगा।

स्कोरबोर्ड और स्कोर रिजल्ट सिस्टम अब तक सही जगह नहीं है, अगर ये काम नहीं कर पाता या इसमें गड़बड़ी होती है तो काफी जगहंसाई हो सकती है। ट्रांसपोर्ट सिस्टम में सुरक्षा को लेकर भी चिंता जाहिर की जा चुकी है। सुरक्षा को लेकर बेशक केंद्र और दिल्ली सरकार ने आश्वस्त किया हो लेकिन इसका फुल रिहर्सल खेलों के पहले कई बार हो जाना चाहिए, जो अभी तक नहीं हो पाया है। खासकर तब जबकि कई देशों ने हमारी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाये हैं। माना जा रहा है कि भारतीय सेना को सुरक्षा के काम पर लगाया जायेगा, लेकिन उस पर भी अभी तक फाइनल मुहर नहीं लगी है, इसे भी अंतिम रूप दे देना चाहिए था, ताकि सेना सुरक्षा को लेकर अपनी प्लानिंग बना सके, क्योंकि ये काम छोटा मोटा नहीं है। दिल्ली में फैले हुए ग्यारह स्टेडियम, खेल गांव और परिवहन से जुड़े पहलूओं को देखना कतई आसान नहीं होगा। और इसमें भी स्टेडियमों की बाह्य सुरक्षा से लेकर आंतरिक सुरक्षा तक पर खासी नजर रखनी होगी।
आखिरी बात है खेलों में भ्रष्टाचार के , जिसकी ख्याति मीडिया के जरिए सारी दुनिया में फैल चुकी है। सचमुच जिस तरह कलमाडी एंड कंपनी के भ्रष्टाचार के किस्से आ रहे हैं, उससे यही लगता है कि इन लोगों का ध्यान खेलों पर कम और अपना घर भरने में ज्यादा रहा। शायद इस भ्रष्टाचार के चलते ही खेलों की तैयारी से ज्यादा ध्यान इस बात पर था कि कहां कैसे गड़बड़ की जा सकती है। जिस तरह से स्टेडियमों के रेनोवेशन पर पैसे बहाये गये, ठेके देने में नियमों की धगिायां उड़ाई गईं, उससे यही लगता है। जिस आस्ट्रेलियाई फर्म को स्पांसर्स ढूंढने का काम दिया गया था, उसने कोई काम नहीं किया, बल्कि हुआ ये कि स्वैच्छा से स्पांसरशिप के लिए आगे आने वाली भारतीय कंपनियों, सार्वजनिक उपक्रमों के स्पांसरशिप रकम में से भी जब वो कमीशन की हकदार बनने लगी तो पता लगा कि इसके पीछे तो बड़ा खेल है, जिसमें फिनेल, आर्गनाइजिंग कमेटी के सीईओ हूपर सभी के हाथ काले हैं।

आयोजन कमेटी ने किस तरह की अनियमिताएं कीं, इसकी रिपोर्ट केंद्रीय सर्तकता आयोग ने विस्तार से दी हैं। विदेश के एक अखबार ने छापा कि भारत कम से कम भ्रष्टाचार के खेल में तो गोल्ड जीत ही सकता है।

लेकिन बार बार डेडलाइन निकलने और तैयारी में असाधारण देरी के चलते कम से कम हमारे खिलाड़ी मेजबान देश का एडवांटेज लेने में पीछे रह गये। अगर स्टेडियम तीन महीने पहले भी बन गये होते तो इन पर खिलाडिय़ों को भरपूर अभ्यास करके खुद को स्टेडियम के माहौल अनुकूल ढाल लेने का मौका तो मिल ही जाता। ये खेल बेशक खिलाडिय़ों के लिए हो रहे हैं, लेकिन दुखद बात यही है कि अब तक खिलाड़ी सीन से गायब हैं और खेल को लेकर जो एक भावना देशभर में जगनी चाहिए थी, वो गायब है और उसकी जगह भ्रष्टाचार, अनियमितता, देरी जैसे कसैले पहलूओं ने ले ली है।

यहां ये भी सवाल उठता है कि खेलों से करीब डेढ़ महिने पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जो कदम कड़े उठाते हुए आर्गनाइजिंग कमेटी के चेयरमैन सुरेश कलमाड़ी के पर कतरे, वो काम तीन महिने या छह महिने पहले भी हो सकता था, क्योंकि ये बात छह महिने पहले भी किसी से छिपी नहीं थी कि आर्गनाइजिंग कमेटी किसी भी कसौटी पर खरी नहीं उतर रही है।
कलमाड़ी ने खेलों के नाम पर अपने साथ सलाहकारों की ऐसी टीम तैयार की, जो दिन रात यही सोचती थी कि किस तरह जनता की गाढ़ी कमाई को हजम किया जाये। नियुक्तियों से लेकर सामान खरीदने तक में रेकार्ड अनियमितताएं हुईं, इसे रेकार्ड इसलिए कहना सही है, क्योंकि इसने भ्रष्टाचार के तमाम पैमानों को पीछे छोड़ दिया। आर्गनाइजिंग कमेटी के मुख्यालय में जरूरत से ज्यादा स्टाफ भरा गया। इन लोगों ने भरपूर विदेश यात्राएं कीं। जमकर फोन किये। कारों और सुविधाओं का दुरुपयोग किया। खाने पीने का बेहिसाब बिल भी बताता है कि इसके नाम भी कितनी गड़बड़ी हुई।

गडबडिय़ों का पूरा हिसाब करीब सात सौ करोड़ से नौ सौ करोड़ आंका गया है, लेकिन शायद ये उससे अधिक भी हो सकता है। खेलों के मुख्यालय के लिए ज्यादातर सामान किराये पर लिये गये, उनका किराये की दर उनकी बाजार कीमत से ज्यादा लगाई गई। एक ऐसे टैंट हाउस को 230 करोड़ रुपये का ठेका दिया गया, जिसे खुद पहले इसी संस्था ने ब्लैक लिस्ट कर दिया था। उसी तरह खेल गांव में कैटरिंग का एक ऐसी आस्ट्रेलियाई फर्म को दिया गया, जिसके दावे को पहले खारिज कर दिया गया था। खेलों के ओपनिंग और क्लोजिंग समारोह पर 400 करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं।

एक ऐसा बैलून लगाया जा रहा है, जो जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में आसमान से लाइट, स्पेशल इफेक्ट्स और मैदान पर ग्राफिक्स इमेज बनायेगा, इस बैलून में भी कमीशन को लेकर विवाद है, इसकी कीमत सौ करोड़ है और गौरतलब बात ये है कि इसका इस्तेमाल मुख्यतौर पर ओपनिंग और क्लोजिंग समारोह में ही होना है, क्या इन खर्चों को भारत जैसे देश के लिए उचित कहा जा सकता है? इस बैलून की कीमत भी बताना जरूरी है, ये सौ करोड़ रुपये का होगा, लेकिन ताजा खबर ये है कि इसकी एसेम्बलिंग और इसके भारत लाने पर खतरे के बादल
मंडरा रहे हैं।

खेलों के नाम पर आर्गनाइजिंग कमेटी के आलाकमानों ने जो बेहिसाब विदेश यात्राएं कीं, उस पर भी बेहिसाब पैसे बहाये गये, जो वास्तव में पिकनिक टूर से ज्यादा नहीं हुआ करती थीं।
कहा जाता है कि असली भारत अब भी गांवों में बसता है, असली भारत में अब भी गरीबी और गुरबत है, खिलाड़ी भी तभी कामयाबी की मंजिल चढ़ते हैं जब देश स्वस्थ और समृद्ध हो, क्या इन पैमानों पर कामनवेल्थ गेम्स और इन पर बहाये गये अस्सी हजार करोड़ से ज्यादा रुपयों का औचित्य लगता है। लेह की त्रासदी के लिए 125 करोड़ रुपये दिये जाते हैं और 3000 की दर्शक क्षमता वाले स्टेडियम के पुनर्निमाण पर 300 करोड़ रुपये खर्च कर दिये जाते हैं। आखिर में यही कहा जा सकता है कि 1१ दिनों के खेल मेले के लिए घरफूंक तमाशा और हासिल क्या हुआ.

कौन हैं ये सुरेश कलमाडी। क्या है इनका परिचय। कैसे शुरू हुआ इनका सफर। कैसे पहुंच गये ये यहां तक। कितने पैसे वाले हैं। क्या है इनकी हनक कैसी है इनकी पकड़ और कैसे की इन्होंने यहां तक यात्रा। ये कई सवाल हैं, जो 66 वर्षीय सुरेश कलमाड़ी को लेकर इन दिनों सभी के जेहन में होंगे। हमने कोशिश की है हम ऐसे ही सवालों के जवाब से आपको रू-ब-रू करायें।

छह फीट लंबे सुरेश कलमाडी ने जब अस्सी के दशक में अपना सफर शुरू किया तो उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति के मजबूत स्तंभ शरद पवार का आदमी माना जाता था। तब उनके शरद पवार से रिश्ते इतने प्रगाढ़ थे कि लोग उन्हें उनका दत्तक पुत्र भी कहे जाते थे। ये सही है कि सुरेश कलमाडी ने शुरू से ही खेल के जरिेए राजनीति और राजनीति के जरिेए खेल को साधा और आज यहां उनका सफर उन्हें यहां तक ले आया है। बाद में वो राजीव गांधी और अर्जुन सिंह के करीबी भी बने। लेकिन कामनवेल्थ गेम्स आयोजन के चलते उनपर जितने संगीन आरोप लग रहे हैं, उससे उनका उबरना तो संभव नहीं दिखता, हालांकि कलमाड़ी को उम्मीद है कि खेलों के सफल आयोजन एक बार फिर उन्हें हीरो बना देंगे, लेकिन ये भी तय है कि खेलों के बाद जब इसके भ्रष्टाचार की फाइलें तरीके से खुलेंगी तो वाकई कलमाडी के लिए जवाब देना मुश्किल हो जायेगा। इसलिए ज्यादातर लोगों को लगता है कि अब कलमाड़ी का करियर नीचे की ओर ही गोता लगाने वाला है। क्योंकि आने वाले समय में उन्हें बचाने की आवाज कहीं से भी नहीं आने वाली। कलमाडी की छवि कामनवेल्थ गेम्स के आयोजन के दौरान अक्खड़ और एरोगैंट प्रशासक के रूप में सामने आई और ऐसे शख्स के रूप में भी, जिसने बिना सोचे समझे जनता की गाढ़ी कमाई आर्गनाइजिंग कमेटी के अपने चहेते अधिकारियों पर बहाई। खुद भी इन खेलों के बहाने इस तरह लोगों को ठेके बांटे कि भाई भतीजावाद करने वाले शरमा जाएं। हो सकता है कलमाड़ी की खेलों के नाम की गई सारी कारस्तानी उन्हें इस देश में भ्रष्टाचार के नये प्रतीक के रूप में ही स्थापित कर दे।

कलमाडी का गृहनगर पुणे है, जहां से चुनकर वो लगातार संसद में आते रहे हैं। यहां के मशहूर फर्गुुसन कॉलेज के ग्र्रेजुएट होने के बाद वो खड़कवासला की नेशनल डिफेंस एकेडमी चले गये। वहां वह एयरफोर्स पायलट के रूप में ट्रेंड होकर भारतीय वायुसेना में शामिल हुए। कलमाडी ने 196५ और 19६1 में पाकिस्तान के खिलाफ हुए युद्ध में फाइटर पायलट के तौर पर हिस्सा भी लिया। इसके बाद उन्होंने फौज छोड़कर 19६7 में राजनीति में हाथ पैर मारने शुरू किये। वो जोशीले थे, उत्साही थे, कांग्रेस में उनके पुराने मित्र थे, देखते ही देखते वो युवा कांग्र्रेस की पहली पंक्ति में पहुंच गये, ये वो दौर था जब शरद पवार उन्हें बढ़ा रहे थे। वहीं इसी दौरान उन्होंने महाराष्ट्र कुश्ती संघ में पदाधिकारी के रूप में अपनी जगह पक्की कर खेल के ट्रैक पर भी आगे का रास्ता बनाना शुरू किया। पहली बार वह शरद पवार की कृपा से ही राज्यसभा के लिए चुने गये। इसके बाद पिछले तीन कार्यकाल से वह पुणे से ही लोकसभा के लिए चुने जाते रहे हैं।

  • पुणे में उनकी जबरदस्त पकड़ है, इसकी वजह है पुणे के लिए उनका लगातार काम करना। यहां उन्होंने हर साल दो बड़े इवेंट कराने शुरू किये -पुणे उत्सव और पुणे मैराथन ...अब ये आयोजन बड़े आयोजन के रूप में शुमार हो चुके हैं।
  • कलमाडी के पास देश की सबसे बड़ी मारूति कारों की डीलरशिप है, जो साई मोटर्स की चैन के नाम से विख्यात है। साथ ही वह बजाज के दो पहिया वाहनों के शो-रूम और पुणे शहर में फैले हुए तमाम पेट्रोल पंपों के भी मालिक हैं। वह पुणे के सबसे महंगे शिव कामर्शियल काम्पलैक्स के स्वामी हैं। शहर के डा. केटकर रोड पर उनका किलेनुमा लंबी चौड़ी हवेली है, जबकि बानेर हिल्स पर भाई के नाम से एक और मकान है।
  • उनकी पत्नी मीरा दिल्ली में बीना रमानी के साथ दिल्ली के हौजखास विलेज में बिस्ट्रो रेस्तरां चलाती हैं। उन्हें फैशन जगत के लोगों को पार्टियां देने का शौक है। इतनी प्रापर्टी होने के बावजूद कलमाडी ने 2009 में जब लोकसभा का चुनाव लड़ा तो कागजों पर अपनी संपत्ति महज 10 करोड़ रुपये घोषित की। वह पिछले 16 सालों से भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष है, जहां उनकी मर्जी के बगैर पत्ता भी खड़क नहीं सकता। लेकिन अब सरकार की टेढी नजरें उन पर और भारतीय ओलंपिक संघ पर हैं, उसने खुलेआम कलमाडी से कहा है, इतने सालों बाद अब उन्हें ये गद्दी खाली कर देनी चाहिए।