
अहम् - आध्यात्मिक जीवन का मूल है

अहम्
अर्थात 'मैं’
और 'मेरा’
होने
का
बोध मानव
अस्तित्व
का
आधार है,
जिसके
बिना
चिन्तनमय,
कर्मशील
जीवन
की
कल्पना कठिन
है।
क्षीण अहम्
मानसिक
रोगों
का
कारण होता
है।
नाम-रूप
के
माध्यम से
अहम्
मानव
के
व्यक्तित्व, चरित्र और
विवेक
के
निर्माण में
सहायक
होता
है।
अहम् बिना
मानव
पशु
से भी
निम्न
है
और उसका
स्पष्ट
कारण
है।
पशु के
पास
अहम् बोध
नहीं
होता
है
और उसको
इसकी
आवश्यकता
भी
नहीं होती
है,
क्योंकि जन्म
से
लेकर मृत्यु
तक
प्रकृति पशु
जीवन
को
नियंत्रित करती है,
दिशा
देती
है।
किन्तु मानव
केवल
प्रकृति
पर
ही नहीं
बल्कि
परिवार
और
संस्कृति पर
भी
निर्भर है
और
परिवार एवं
संस्कृति
से
तारतम्य बैठाने
के
लिए, अपने
स्वतंत्र
व्यक्तित्व
विकास
के
लिए अहम्
बोध
नितान्त आवश्यक
है।
अहम् व्यक्ति
और
संस्कृति के
बीच
सेतु है।
अगर
यह सेतु
टूटेगा
तो
व्यक्ति खो
जायेगा,
भ्रमित
हो
जायेगा।
अहम् विहीन मानव शिशु-सा असहाय होता है और अपने जीवन के लिए परिवार और समाज पर पूर्णत: आश्रित हो जाता है। वृद्धा अवस्था में मस्तिष्क से जर्जर होने पर जब 'मैं’ का बोध क्षीण होता है तो व्यक्ति की स्थिति असहाय शिशु की होती है। अमरीका के दिवंगत राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और इंग्लैंड की भूतपूर्व प्रधानमंत्री मार्ग रेट थैचर इसके उदाहरण हैं। संसार के इतने शक्तिशाली व्यक्ति होने के बावजूद जब इन दोनों के पास अहम् नहीं रहा तो वे नि:सहाय बालक बन कर रह गए। इनमें अपने दैनिक कार्यों को पूरा करने का समझ भी समाप्त हो गयी।
स्वस्थ
अहम्
के
चार लक्षण
होते
हैं -
1-
प्रथम :
व्यक्ति
में
स्वयं की
देखभाल
और
निर्णय की
क्षमता।
2-
द्वितीय :
स्वजनों,
परिजनों
की
सेवा और
सुरक्षा
के
दायित्व का
निर्वाह।
3-
तृतीय :
आत्मसम्मान
और
आत्मविश्वास।
4-
चतुर्थ :
नैतिक
सीमाओं
और
मूल्यों की
चेतना।
अहम् केवल व्यक्ति की ही नहीं बल्कि देश की भी आवश्यकता है। अहम् देश को विशेष पहचान, सृजन क्षमता, चरित्र और सुरक्षा की शक्ति देता है। अहम् विहीन देश कमजोर होकर अन्य संस्कृतियों और देशों का दास बनकर रह जाता है।
मानव अहम् का निर्माण दो से तीन वर्ष की आयु से आरम्भ होता है। इस दौरान बालक में चेतन स्मृतियों और मृत्यु बोध का उदय होता है। पच्चीस वर्ष की आयु तक स्पष्ट अहम् की स्थापना हो जाती है और भारतीय दर्शन के अनुसार यह ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति है। अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम अहम् निर्माण का समय है। ग्रहस्थ आश्रम के अगले पच्चीस वर्षों में अहम् का विलयन शुरू हो जाता है जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं का त्याग परिवार के हित में कर देता है। वानप्रस्थ आश्रम में अहम् का विलयन और भी तीव्र हो जाता है और व्यक्ति परिवार के स्वार्थों के परे जाकर समाज और देश सेवा का उत्तरदायित्व ग्रहण कर लेता है। संन्यास आश्रम में अहम् पूर्णत: दिव्यता के सागर में विलीन हो जाता है जो मोक्ष और परमता की अवस्था है। अहम् के विलीन होने का यह अर्थ नहीं कि व्यक्ति अहम् हीन हो गया। इस अवस्था में अहम् होता है किन्तु मात्र एक दास की तरह, स्वामी की तरह नहीं और दास का उपयोग किसी भी स्थिति में किया जा सकता है।
राम,
बुद्ध,
कृष्ण
ऐसे
ही व्यक्तित्व
थे
जिनमें अहम्
मात्र
एक
दास शक्ति
थी
और वे
इस
शक्ति के
पूर्ण
स्वामी
थे
जिसका उपयोग
उन्होंने
युग-प्रवर्तन
के
लिए किया।
किन्तु
इससे
पहले
अहम्
विलीन
हो
उसकी पूर्ण
प्राप्ति
आवश्यक
है।
अहम् विहीन व्यक्ति भ्रमित व्यक्तित्व है जिसमें विवेकमय निर्णय और जीवन लक्ष्य चुनने की क्षमता का अभाव होता है। ऐसे व्यक्ति ही अंधविश्वासी और भ्रष्ट गुरुओं का शिकार होते हैं और हो भी क्यों ना। अपनी विचार शक्ति के अभाव में वे दूसरे के विचारों के गुलाम बनेंगे ही।
सारांश
में
सत्य पथ
की
यात्रा अहम्
बिना
असमभव
है।
स्वस्थ अहम्
आध्यात्मिक
तरु का
मूल
है जिस
पर
दिव्यता की
सुगन्ध
और
आत्मा के
सुमन
खिलते
हैं।
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