अमेरिका का जेल उद्योग

प्राइवेट प्रिजन जैसा शब्द भारत में विचित्र लग सकता है लेकिन अमेरिका में ये एक उद्योग की तरह है। प्राइवेट जेलें वहां खासे लाभप्रद उद्योग के रूप में उभरी हैं, इनमें लाखों कैदी रहते हैं। ये न केवल लाभ देने वाला उद्योग बन चुका है बल्कि इससे अमेरिका की सात बड़ी कंपनियां भी जुड़ी हुई है। आइये जानते हैं इन प्राइवेट जेलों के बारे में...

  • सुरेश चन्द्र

भारत में प्राइवेट शब्द अर्थात् निजी कारागार कुछ विचित्र सा लगता है। यहाँ केवल सरकार ही न्यायालय के आदेशानुसार किसी को जेल में रख सकती है। यदि कोई व्यक्ति किसी को कुछ देर के लिए भी बंदी या बन्धक बना लेता है तो उसे स्वयं भी जेल की हवा खानी पड़ सकती है। जेल में रखने का प्रावधान तो अमेरिका में भी कानून के अनुसार न्यायालय द्वारा ही रखा गया है किन्तु वहाँ सैकड़ों जेलें प्राइवेट हैं जिनमें लाखों की संख्या में कैदी रहते हैं।

केवल यही नहीं प्राइवेट जेलें वहाँ एवं अत्यंन्त लाभप्रद उद्योग के रूप में उभरी हंै। अस्त्र शस्त्रों का उत्पादन, तेल एवं कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी जैसे कुछ अन्य उद्योग हैं जो अमेरिका में अत्यन्त लाभ देने वाले उद्योग माना जाता है किन्तु प्राइवेट जेल उद्योग इनसे भी ऊपर है। इस उद्योग में अमेरिका की सात बड़ी कम्पनियाँ लगी हुई हैं। इनमें से सबसे बड़ी करेक्शन्स कॉरपोरेशन ऑफ अमेरिका है जिसने अमेरिका के उन्नीस राज्यों में अपने पैर जमा रखे हैं एवं इस उद्योग के पचास प्रतिशत पर कब्ाा कर रखा है। इसके द्वारा बनाई गई जेलों की संख्या ६५ हैं एवं इनमें ९०००० कैदी रखे जा सकते हैं। इस व्यवसाय से होने वाली इसकी आय लगभग एक अरब साठ करोड़ डालर है। एक और दूसरी बड़ी कम्पनी जी. ई.ओ. ग्रुप है जिसने ६१ जेलें बना रखी हैं एवं इनमें ४९००० कैदी रह सकते हैं। कौरनैल कम्पनी ने ७९ जेलें बनाई हैं।

वैसे अमेरिका में प्राइवेट जेलों का इतिहास पुराना है। राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के कार्यकाल में उत्तर तथा दक्षिणी अमेरिका के मध्य गृह युद्घ लड़ा गया जिसमें उत्तर की जीत हुई। फलस्वरूप अफ्रीका से बन्दी बनाकर लाये गये समस्त नीग्रो लोगों को जो गोरों के फार्मों में दास के रूप में काम करते थे आााद कर दिया गया। इससे वहाँ श्रमिकों की अत्यन्त कमी हो गई। अत: १८६८ से बड़े किसानों तथा उद्योगपतियों को कैदियों को किराये पर देने की प्रथा प्रारंभ हुई। किराये पर लिए गये इन कैदियों से गुलामों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था। उन्हें अंधेरी कोठरियों में रखा जाता था, भर पेट भोजन नहीं मिल पाता एवं काम में जरा भी ढिलाई होने पर बुरी तरह पीटा जाता था। २०वीं शताब्दी के प्रथम अर्धशतक तक यह प्रथा चलती रही। किन्तु इन अत्याचारों का बहुत विरोध होने के कारण इसे रोक दिया गया एवं इसका स्थान प्राइवेट प्रिजन्स ने ले लिया।

उपभोक्ता सामान बनाने वाली कम्पनियों में जेलें बनाने की होड़ लगी हुई है। कारण है कि यहाँ जो श्रमिकों की फौज उपलब्ध है वह न तो कोई यूनियन बना सकती है एवं न ही कभी हड़ताल करती है

प्रथम प्राइवेट जेल का निर्माण अमेरिका में वर्ष १९८४ में हुआ एवं टैनीसी राज्य की हैमिल्टन काउन्टी में करैक्शन कॉरपोरेशन ऑफ अमेरिका ने पहली ऐसी जेल का निर्माण किया। यह कार्य राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में सम्पन्न हुआ। उस समय अमेरिका में नशीली दवाईयों के व्यापार के विरूद्घ अभियान चलाया जा रहा था एवं कैदियों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी। सरकारी जेलें भर चुकी थी एवं सरकार पर कैदियों के ररखाव का बोझ असहनीय हो गया था। अमेरिकी लोगों की व्यापार बुद्घि अत्यन्त तीव्र है। वे सुख दुख, मृत्यु, योग, ईश्वर सबमें व्यापार एवं मुनाफे का अवसर ढ़ूंढ निकालते हैं। वहाँ योग का व्यापार भी अरबों डालर का है जिसका आरम्भ अब भारत में भी स्वामी राम देव के सौजन्य से हो चुका है। अमेरिका में कफन का कारोबार तो बहुत बड़ा बन चुका है एवं ताबूत, कफन, दफन का प्रबन्ध करने वाली अनेक प्रा. लि. एवं लिमिटेड कम्पनियाँ खुल गई हैं।

ये प्राइवेट जेलें किस प्रकार मुनाफा कमाने वाली फैक्टरियों में बदल चुकी हैं इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इनमें सेना के काम में आने वाले १००हेल्मेट, ऐम्युनिशन बैल्ट, बुलेट प्रूफ जैकेट, पैन्ट, शर्ट, टैन्ट इत्यादि का उत्पादन होता है। इसके अतिरिक्त बााार में बिकने वाले पेन्ट, पेन्ट ब्रुश, स्टोव, फर्नीचर, हवाई जहाजों के पार्ट, मेडिकल इक्विपमेंट इत्यादि भी बड़ी तादाद में इन जेलनुमा फैक्टरियों में बनते हैं। वास्तव में अनेक प्रकार की उपभोक्ता सामान बनाने वाली कम्पनियों में ऐसी जेलें बनाने की होड़ लगी हुई है। इसका कारण है कि यहाँ जो श्रमिकों की फौज उन्हें उपलब्ध है वह न तो कोई यूनियन बना सकती है एवं न ही कभी हड़ताल या काम रोको आन्दोलन करती है। आम तौर पर अमेरिका में श्रमिकों का पारिश्रमिक बहुत अधिक है किन्तु इन जेलों में अत्यन्त सस्ती एवं कभी देर से न आने वाली या छुट्टी लेने वाली श्रम शक्ति सदैव उपलब्ध रहती है।

प्राइवेट जेलें बनाने एवं उनमें कैदियों का कुशल श्रम शक्ति के रूप में इस्तेमाल करने तक तो बात ठीक थी किन्तु जब कानून एवं न्याय व्यवस्था व्यापार में तबदील हो जाती है तो इसके दूरगामी दुष्परिणाम होते हैंं। अमेरिका की कुल जनसंख्या ३० करोड़, भारत की ११० करोड़ तथा चीन की १२५ करोड के लगभग है। किन्तु आश्चर्य की बात है कि अमेरिका में कैदियों की संख्या २० लाख, भारत में ५ लाख एवं चीन में १० लाख है। जब राष्ट्रपति रीगन ने अपना कार्यकाल आरम्भ किया तो अमेरिका में बन्दियों की कुल संख्या ४ लाख थी किन्तु प्राइवेट जेलों का चलन प्रारम्भ होते ही इनकी संख्या में तेजी से वृद्घि होने लगी। विशेष बात यह है कि अपराध तथा जन संख्या की वृद्घि उतनी नहीं थी जितनी कि कैदियों की संख्या बढ़ी।

निजी उद्योगों की दृष्टि सदैव अपने मुनाफे पर रहती है, इसके लिए उन्हें चाहे कुछ भी करना पड़े। अमेरिका की प्राइवेट जेलें चलाने वाली कम्पनियाँ तेजी से जेलों का निर्माण करती जाती हैं एवं फिर उनमें कच्चे माल की सप्लाई अर्थात कैदियों की उपलब्धता के लिए निम्न उपाय किये जाते हैं :-

१- ऐसे कानून बनवाये जाते हैंं जिसमें छोटे-छोटे अपराधें के लिए भी लम्बी सजाओं का प्रावधान हो।
२- कानून में ही ऐसी व्यवस्था की जाती है कि कम से कम सजा भी काफी लम्बी हो।
३- न्यायाध्ीशों को इस प्रकार प्रभावित किया जाये ताकि वे मामूली अपराधों के लिए भी लम्बी सजाएं दें।

ये कम्पनियाँ राजनीतिज्ञों एवं कानून बनाने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को इस प्रकार प्रभावित करती हैं कि वे हर अपराध के लिए सख्त से सख्त कानून बनाने के पक्ष में वोट देते हैं। ये कम्पनियाँ राजनीतिज्ञों की हर प्रकार से सहायता करती हैं इनकी लाबी बहुत शक्तिशाली है एवं कानूनों को सख्त बनवाने एवं लम्बी सजाओं का प्रावधान कराने के लिए वे एड़ी चोटी का जोर लगा देती हैं। ये कम्पनियाँ टेलीविान तथा अन्य माध्यमों से मामूली अपराधें के विरूद्घ भी ऐसा वातावरण बना देती हैं कि जनमत इन अपराधों के लिए लम्बी सजाओं के पक्ष में हो जाता है। वास्तव में अपराध जितने गम्भीर होते हैं उनके प्रति सामान्य नागरिक का दृष्टिकोण कभी-कभी उससे भी अधिक गंभीर हो जाता है। दुष्प्रचार के कारण मामूली अपराधों के लिए कठोर एवं लम्बी सजाओं का प्रावधान कर दिया जाता है। ये कम्पनियाँ जनसाधारण के इसी मनोविज्ञान का लाभ उठाती है।

रिश्वत लेकर अपराधियों को बरी कर देने या उन्हें कम साा देने के लिए भारत सहित अनेक देशों की न्यायपालिकाएँ बदनाम हैं। किन्तु अमेरिका एक ऐसा देश है जहाँ रिश्वत लेकर लम्बी सजाएं दी जाती हैं। सन् २००९ में अमेरिका के समाचार पत्रों में एक रिपोर्ट छपी थी जिसके अनुसार पेन्सिलवेनिया के दो न्यायधीशों ने २६ लाख डालर रिश्वत लेकर हाारों बाल अपराधियों को कुछ मिनट की सुनवाई के पश्चात वर्षों के लिए जेल भेज दिया। उन्हें अपनी सफाई देने या वकील करने का मौका नहीं दिया गया। इन बच्चों के अपराध किसी कार से कुछ पैसा चुराने, उस पर कुछ मजाकिया बात लिख देना इत्यादि मामूली अपराध थे। कुछ अपराधियों को एक से अधिक अपराध करने के एवज में एक के बाद एक चलने वाली सजाएँ दी गईं। एक व्यक्ति को दो साइकिलें एवं एक कार चुराने के अपराध में २५ साल की सजा सुनाई गई।

अमेरिकी जेल
द्यअमेरिका की कुल जनसंख्या ३० करोड़, भारत की ११० करोड़ तथा चीन की १२५ करोड के लगभग है। किन्तु आश्चर्य की बात है कि अमेरिका में कैदियों की संख्या २० लाख, भारत में ५ लाख एवं चीन में १० लाख है। जब राष्ट्रपति रीगन ने अपना कार्यकाल आरम्भ किया तो अमेरिका में बन्दियों की कुल संख्या ४ लाख थी किन्तु प्राइवेट जेलों का चलन प्रारम्भ होते ही इनकी संख्या में तेजी से वृद्घि होने लगी।

  • प्रथम प्राइवेट जेल का निर्माण अमेरिका में वर्ष १९८४ में हुआ एवं टैनीसी राज्य की हैमिल्टन काउन्टी में करैक्शन कॉरपोरेशन ऑफ अमेरिका ने पहली ऐसी जेल का निर्माण किया। यह कार्य राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में सम्पन्न हुआ। उस समय अमेरिका में नशीली दवाईयों के व्यापार के विरूद्घ अभियान चलाया जा रहा था एवं कैदियों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी। सरकारी जेलें भर चुकी थी एवं सरकार पर कैदियों के रखरखाव का बोझ असहनीय हो गया था।
     
  • अमेरिका एक ऐसा देश है जहाँ रिश्वत लेकर लम्बी सजाएं दी जाती हैं। सन् २००९ में अमेरिका के समाचार पत्रों में एक रिपोर्ट छपी थी जिसके अनुसार पेन्सिलवेनिया के दो न्यायधीशों ने २६ लाख डालर रिश्वत लेकर हाजारों बाल अपराधियों को कुछ मिनट की सुनवाई के पश्चात वर्षों के लिए जेल भेज दिया।

इजराइल में भी ऐसी जेलें बनाने का प्रयत्न किया गया था किन्तु वहाँ की सुप्रीम कोर्ट की ९ न्यायधीशों की एक बैंच ने इसे यह कहते हुए गैर कानूनी करार दे दिया था कि किसी व्यक्ति को अपराध करने की एवज में जेल में डाल देना किसी देश की सरकार का सबसे शक्तिशाली एवं मौलिक अधिकार है। इस अधिकार को किसी निजी कारपोरेशन को धन कमाने के उद्देश्य से हस्तांरित करके इस व्यक्ति की आबादी का अपहरण कर देना नितांत अनुचित एवं गैर कानूनी है। अपराध शास्त्र के अनुसार अपराधी को दण्ड देने का उद्देश्य अपराध के प्रति उसके मन में डर पैदा करना, उसका पुनस्र्थापन करना एवं भयानक अपराधियों से समाज की रक्षा करना है। कठोर दण्ड एवं लम्बे कारावास से अपराधों में कमी आनी चाहिए एवं परिणाम स्वरूप कैदियों की संख्या कम हो जानी चाहिए। किन्तु प्राइवेट जेल व्यवस्था अपने में विरोधभासी है। अपराधियों को लम्बी सजाएं दी जाती हैं किन्तु प्रयत्न यही रहता है कि कैदियों की संख्या बढ़ती रहे।

इन प्राइवेट जेलों की एक विशेषता यह भी है कि इन में बंद रखे जाने वाले तीन चौथाई कैदी या तो काले नीग्रो या फिर हिस्पैनिक होते हैं। रूसी लेक अलैक्जेंडर सोलिसनित्सीन ने एक उपन्यास लिखा था जिसमें रूस के साम्यवादी तानाशाहों द्वारा वहाँ के राजनैतिक कैदियों के कन्सन्ट्रेशन कैम्पों में कैद करने एवं उन पर अमानवीय अत्याचार करने का लोमहर्षक वर्णन है। इस उपन्यास को साहित्य का नोबल पुरस्कार भी मिला था। कुछ अमेरिकी विद्वानों ने आशंका प्रकट की है कि कहीं ऐसी ही गुलाम व्यवस्था पूँजीवादी अमेरिका में भी तो बनने नहीं जा रही है। अठारहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी में गोरे लोगों ने अफ्रीकी एवं एशियाइयों का शोषण किया या अब वे मुनाफे के लालच में अपनों का ही शोषण कर रहे हैं।