बहती रहेगी निर्मल गंगा

  • डा. सारिका अग्रवाल

गंगा पुत्र कहे जाने वाले प्रोफेसर जी डी अग्रवाल का आमरण अनशन आखिरकार रंग लाया और सरकार को झुकना ही पड़ा। उत्तराखंड में गंगा पर बनाई जा रही लोहारी नागपाला पन बिजली परियोजना पर केंद्र सरकार ने रोक लगा ही दी। ये बात अलग थी कि केंद्र सरकार शायद ही ऐसा करना चाहती थी, अगर वो चाहती तो इस परियोजना पर काम क्यों जारी रखती और 600 करोड़ रुपये अभी तक क्यों लगा देती।

केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री लंबे समय से यहां के लोगों को आश्वासन दे रहे थे कि इस परियोजना पर काम रोक दिया जायेगा, गंगा नदी के साथ उनकी भी संवेदनाएं जुड़ी हैं, ये नदी उनके लिए भी आस्था का प्रतीक है। लेकिन प्रधानमंत्री के बार बार आश्वासन के बाद भी हकीकत ये ही थी कि इस परियोजना पर काम लगातार जारी था। ये भी तय था कि अगर ये परियोजना जारी रहती तो गंगा नदी के अस्तित्व पर ही एक बड़ा संकट खड़ा हो जाता। लिहाजा आईआईटी कानपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष, बर्कले यूनिवर्सिटी से स्नातक और गंगा मुक्ति आंदोलनों के प्रेरणास्रोत वयोवृद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल को आमरण अनशन करना पड़ा।

अग्रवाल पहले भी गंगा के समर्थन में और गंगा नदी पर उत्तराखंड पर बनने वाली परियोजनाओं के विरोध में पहले भी आमरण अनशन पर बैठ चुके हैं, लेकिन उनका मौजूदा अनशन का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि इस पर अब तक केवल सियासी रोटियां ही सेंकी जा रही थीं। परियोजना रोके जाने के बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने दावा किया कि प्रधानमंत्री, हम और केंद्र सरकार गंगा भक्त हैं, लिहाजा जबरदस्त दवाबों के बावजूद उन्होंने लोहारी नागपाल समेत भैरव घाटी और मनेरी जल विद्युत परियोजनाओं को बंद कर दिया। बेशक राज्य सरकार ये दावा कर सकती है कि केंद्र के फैसले में उसकी भी अहम भूमिका रही है, लेकिन सही बात ये ही कि अब तक किसी ने इन परियोजनाओं को रोकने के लिए वो दृढइच्छाशक्ति नहीं दिखाई थी, जो प्रो. अग्रवाल ने अकेले बल पर दिखाई।

अब इससे तय हो गया है कि राज्य में गंगा का प्रवाह अविरल और निर्मल रहेगा। साथ ही साथ गोमुख से उत्तरकाशी तक 135 किलोमीटर के क्षेत्र को ईको संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जायेगा। पर्यावरण को इससे बेशक फायदा मिलेगा। साथ ही राज्य में बांधों को लेकर नये सिरे से चर्चा और राय-मश्विरा भी बनाया जा सकेगा। यूं भी नदियों पर बड़े बांध बनाने को लेकर न केवल लगातार सवालिया निशान लगे हैं बल्कि पर्यावरणविदों ने इनका विरोध भी किया है।

इस पूरे मामले में एक अच्छी बात ये भी देखने को मिली कि प्रो अग्रवाल के समर्थन में शंकराचार्य, संत समाज, अखाड़ा परिषद, जूना अखाड़ा, गंगा महासभा, गुरु रामदेव के साथ साथ देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों का भी काफी बड़ा तबका था। ये कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार ने भी परियोजना को हरी झंडी नहीं देने का फैसला भी आगामी चुनाव में वोट हासिल करने के मकसद से ही दिया।

दरअसल केंद्र सरकार के हाथ पांव कैग रिपोर्ट को देखने के बाद ज्यादा फूले कि अगर उत्तराखंड में गंगा नदी पर पावर प्लांटों को प्रश्रय दिया गया तो इस पुण्य सलिला नदी का जल ही नहीं बचेगा। रिपोर्ट के अनुसार श्रीनगर के पास गंगा की जलधारा सूख गई है और वहां से जो जल प्रवाहित हो रहा है वह प्लांट की टरबाइन से निकला जल है। अगर इन पावर प्लांटों का काम बदस्तूर जारी रहा तो गंगा बेसिन की जैवविविधता और जलचरों का जीवन पूरी तरह नष्ट हो जायेगा। नतीजतन राज्य से बड़े पैमाने पर पलायन तो होगा ही, सांस्कृतिक झटका अलग लगेगा। इस रिपोर्ट ने राज्य की पॉवर पालिसी पर भी सवाल खड़े किये, जो निजी निवेशकों को तो 90 फीसदी नदी के जल उपयोग की छूट देती है और महज दस फीसदी जल ही आगे प्रवाह के लिए छोड़ती है। ये रिपोर्ट एक तरह से केंद्र और राज्य सरकार को गंगा पर बनाई जा रही परियोजनाओं को रोकने की चेतावनी सरीखी ही थी।

इस रिपोर्ट के बाद भी शायद इन परियोजनाओं पर काम जारी भी रह सकता था लेकिन इसी बीच जिस तरह से प्रो. अग्रवाल और संत समाज ने आंदोलन शुरू किया, उसने जरूर सरकार को हिला कर रख दिया। जिस तरह प्रोफेसर अग्रवाल अपना अनशन जारी रखे हुए थे, उससे उनके प्राण भी जा सकते थे, इससे सरकार और भी विचलित हुई। अब इतना तो तय है कि गंगा की धारा अब गंगोत्री से उत्तराखंड में नीचे तक न केवल अविरल बहेगी बल्कि ये पहले से कहीं ज्यादा निर्मल भी हो सकेगी।