
धार्मिक आतंकवाद में धधकती मानवता
आतंकवाद में धधकती पूरी दुनिया इन दिनों र्धािमक आतंकवाद की मार झेल रही है। ये पूछा जाना चाहिए कि इस आतंकवाद का मकसद क्या है? भारत जैसा देश लंबे समय से मुस्लिम आतंकवाद को झेल रहा है, अब इससे मुकाबले के लिए कट्ट्टïर हिंदू भी खड़े हो रहे हैं। देश का मौजूदा हाल वाकई विचारपूर्ण है
- पूजा श्रीवास्तव
'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने
में।
बशीर बद्र का ये शेर उन दहशत गर्दों पर एकदम सटीक बैठता है जो धर्म, भगवान, अल्लाह का नाम लेकर इंसानियत का कत्ल करते घूमते हैं बच्चों को अनाथ बनाकर, औरतों को विधवा बनाकर और लोगों को बेघर करके ये किस ईश्वर को पूजते हैं, किस अल्लाह की इबादत करते हैं? सवाल कई हैं लेकिन जवाब कहीं नहीं। आज पूरा विश्व धार्मिक आतंक की मार झेल रहा है। जहां एक ओर तालिबान, अल-कायदा, जैश-ए- मोहम्मद जैसे दहशत गर्दों ने पूरे विश्व के साथ-साथ भारत में आतंक मचा रखा है वहीं अभिनव भारत जैसे कट्टर हिन्दू संगठन मुस्लिम समुदाय में भय उत्पन्न करने की कोशिश कर रहे हैं। कुल मिलाकर समाज में परस्पर तनाव, वैमनस्य व नफरत का स्तर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है।
हमारे देश में इतिहास का ताना बाना हिन्दू मुस्लिम समुदाय के बीच ही बुना हुआ है। इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि मध्य युग में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तत्कालीन भारत की संस्कृति और उसके मंदिरों को अपूर्णनीय क्षति पहुंचाई। हिन्दू और हिन्दुत्व को खत्म करने के लिए उन्होंने हिंसा का भी सहारा लिया। लेकिन आजादी के दौर तक आते-आते ये तथाकथित 'बाहरी मुस्लिमÓ हिन्दुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खड़े हो गये। इस आन्दोलन की धार तेज करने के लिए उन्होंने गीत लिखे, जेल गये और अवसर पडऩे पर सीने पर गोलियां भी खाई, लेकिन देश के बंटवारे के साथ ही हिन्दू मुस्लिम एकता की यह मजबूत इमारत भी धराशायी हो गई।
बंटवारे के चलते हुए साम्प्रदायिक दंगें में हुई लगभग ५००,००० मौतें इस ओर साफ संकेत करती हंै कि हिन्दू मुस्लिम के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई थी जिसे पाटने के लिए विशेष प्रयास की जरूरत थी लेकिन यह देश का दुर्भाग्य ही है कि उस खाई को पाटने की बजाए उसे और अधिक गहराने की कोशिशें समाज में लगातार चल रही थीं।
नब्बे का दशक आते-आते राम जन्म भूमि मुद्दे ने देश में एक नए तरह का विवाद पैदा कर
दिया था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सहारा लेकर भाजपा अपनी राजनीतिक रोटियां
सेंकने के फिराक में थी। सत्ता में आने के लिए एक ऐसे मुद्दे की जरूरत थी जो समाज
के एक बड़े वर्ग को उसके साथ खड़ा कर दे। राम जन्म भूमि मुद्दा इसके लिए उसे पूरी
तरह से उपयुक्त लगा। विश्व हिन्दू परिषद के सदस्यों, संघियों और भाजपाइयों ने
हिन्दूओं की धार्मिक भावना को भड़काने के लिए अपने भाषणों के जरिए आग उगलना शुरू कर
दिया। रथ यात्रा और कारसेवा के आहवान के जरिए हर हिन्दू को इस आंदोलन का हिस्सा
बनाने की कवायद तेज कर दी गई। और एक दिन ये भी आया कि जुनूनी कारसेवकों ने
साम्प्रदायिक संगठनों के इशारे पर अयोध्या में ढांचा ढहा ही दिया।
अयोध्या का ढांचा के ढहने के साथ मुस्लिमों का भारत की संवैधानिक रूप से घोषित
धर्मनिरपेक्षता में रहा सहा विश्वास भी ढह गया और प्रतिक्रिया स्वरूप पूरे देश में
दंगें शुरू हो गए। इन दंगों के चलते अकेले मुंबई में ही पांच सौ लोगों को अपनी जान
से हाथ धोना पड़ा। लोग अपना घर-बार व्यवसाय छोड़कर भागने लगे। बात इतने पर ही खत्म
नहीं हुई।
१२ मार्च १९९३ को मुंंबई शहर में लगातार १३ बम धमाके हुए। भारत के इतिहास में हुए अब तक के ये सबसे भयावह बम धमाके थे जिसमे एक ही दिन में २५० नागरिकों की जान ले ली और ७०० लोगों को बुरी तरह से घायल कर दिया। इन हादसों में डी कम्पनी चलाने वाले डॉन दाऊद इब्राहिम की संलिप्तता मानी गई। यानि अब देश में विदेशी आतंकी संगठनों का हस्तक्षेप भी बढऩे लगा था।
देश अभी इन दंगों और धमाकों से उबरने की कोशिशों में लगा ही था कि गोधरा कांड ने उसे फिर साम्प्रदायिकता की आग में धकेल दिया। २७ फरवरी २००२ को साबरमती एक्सप्रेस के कोच नं. रु एस ६ को मुस्लिम समुदाय के एक गुट ने आग के हवाले कर दिया। इसमें बैठे कारसेवकों में २३ पुरूष १५ महिलाएं और बीस बच्चे कोच में लगी आग से जिन्दा जल कर मर गए। इस आग ने धीरे-धीरे पूरे गुजरात को अपनी चपेट में ले लिया। हादसे की प्रतिक्रिया स्वरूप गुजरात में चुन-चुनकर मुस्लिम समुदाय के लोग मारे जाने लगे। ११ मई २००५ को संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट के अनुसार इन दंगों में ७९० मुस्लिम और २५४ हिन्दू मारे गए वहीं २५४८ लोग घायल हुए। इस दंगें के चलते ९१९ महिलाएं विधवा हो गई और ६०६ बच्चे अनाथ हो गए। इस दंगें में तत्कालीन सरकार की भूमिका भी संदिग्ध मानी गई और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी तक को कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा।
धार्मिक आतंकवाद की घटनाएं देश के लिए नई नहीं हैं। कश्मीर तो सालों तक धार्मिक विद्धेष की आग में सुलगता रहा है। एक समय वह था जब कश्मीर में कश्मीरी पंडित बड़ी तादाद में थे। लेकिन सितम्बर १९८९ से लेकर १९९० के बीच अलग-अलग घटनाओं में लगभग ३०० कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई। वर्ष १९९० के शुरूआती दिनों में स्थानीय उर्दू अखबारो नें वहां के कश्मीरियों से भारत के खिलाफ जेहाद छेडऩे की अपील की। ये वो समय था जब कश्मीर की गलियों में उन हिन्दुओं का कत्ल आम हो गया था जो कश्मीर छोड़कर नहीं जा रहे थे। यहां तक कि हिन्दुओं के घर के बाहर इस बात की नोटिस लगा दी जाती थी कि वो २४ घंटे के भीतर कश्मीर छोड़ दें या मरने के लिए तैयार रहें। मार्च १९९० तक आते-आते लगभग २५ से ३००,००० कश्मीरी पंडितों को मुस्लिम कट्टरवादिता के चलते कश्मीर छोडऩा पड़ा।
आधुनिक भारत में भी हिन्दू मंदिरों पर मुस्लिम आतंकियों की ओर से अक्सर हमले होते
रहे हैं। इनमें से १९९८ में हुए चम्बा नरसंहार, २००२ में रघुनाथ मंदिर पर हुए
फिदायीन हमले और २००२ में ही अक्षरधाम मंदिर पर हुए हमलों का खास तौर पर जिक्र किया
जा सकता है। इन हमलों में आतंकी गुट लश्कर-ए-तोयबा का हाथ होने की बात कही जाती रही
है। इसी तरह वर्ष २००६ बनारस मेंं हुए बम विस्फोट में कई जानें गई और कई लोग घायल
हुए। बमबाजी का ये सिलसिला आज तक चला आ रहा है।
देश का शायद ही कोई क्षेत्र, कोई प्रदेश इस तरह के हादसों से सुरक्षित बचा हो।
मुस्लिम आतंकवाद की तरह ही भगवा आतंक ने भी हिंसा का सहारा लेने से गुरेज नहीं किया।
बाबरी मस्जिद विध्वंस और गोधरा दंगों के बाद भगवा आतंक की बानगी वर्ष २००६ में
मुम्बई के मुस्लिम बहुल इलाके माले गांव में हुई बम विस्फोट की घटना में दिखी। इसके
अलावा मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ दरगाह में हुए बम विस्फोट का नाम भी इसमें शामिल
किया जा सकता है। इन विस्फोटों में ले. कर्नल श्रीकांत पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा
सिंह ठाकुर की संलिप्तता पाई गई।
प्रश्न यहां यही है कि आखिर धर्म के नाम पर आतंकवाद इतनी तेजी से क्यों बढ़ता जा रहा है? बीते कुछ दिनों से कश्मीर में जो उग्र प्रदर्थन चल रहे हैं, वो किसकी देन हैं? आखिर क्या वजह है कि धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर की सड़कों पर आज बच्चे, औरतें घरों से निकल कर पत्थर बाजी कर रहे हंै? क्या उनका उस सरकारी मशीनरी से विश्वास उठ गया है जिसे खुद उन्होंने गद्दीनशीन किया था? या फिर ये उनकी सियासी चालें हैं जो अफरा-तफरी फैलाकर सत्ता हथियाना चाहते हैं? या हमेशा की तरह यह मान लिया जाए की इसमें भी पाकिस्तान का ही हाथ है जो किसी भी तरह कश्मीर को हथियाने के मंसूबे बांधता रहा है।
गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने भगवा आतंकवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज सेे अहम खतरों में गिनाया है। राज्यों के पुलिस प्रमुखों के साथ बैैठक में उन्होंने कहा कि हाल में भगवा आतंकवाद का खतरा काफी बढ़ा है। दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने गृहमंत्री की ओर से भगवा आतंकवाद के इस्तेमाल पर कड़ा ऐतराज जताया है। इसके साथ ही चिदंबरम ने जम्मू कश्मीर में जारी हिंसा का दुभाग्यपूर्ण बताते हुए घाटी ्रमें शांति वार्ता की नई शुरुआत के संकेत दिए।
अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो पाकिस्तान और अमेरिका बार-बार आतकंवाद को खत्म करने की बात करते रहे हैं। लेकिन भारत के संदर्भ में उनकी कोशिशें कभी भी पूरी तरह से ईमानदार नहीं रही हैं। विकिलीक्स पर हुए खुलासे ने ये बात साफ कर दी है कि किस तरह से अमेरिकी धन का उपयोग आतंक को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में भारत की भूमिका और भी जिम्मेदारी भरी और अधिक चुनौती पूर्ण हो जाती है। इस विषय में वरिष्ठ चिंतक आर.विक्रम सिंह का कहना है कि ''हिन्दू सांप्रदायिकता अपनी अतिवादिता में क्या सोचती है? हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना?
क्या इस हिन्दू बहुल राष्ट्र ने हिन्दू समाज की अंदरूनी सामाजिक, आर्थिक समस्याओं
का समाधान कर दिया है? क्या हिन्दू राष्ट्र के परिकल्पनाकार दलित और पिछड़े हिन्दू
समाज को उस स्तर तक ला पाए कि वे अपने को हिन्दू कहने में गर्व कर सकें? हिन्दू
राष्ट्रवाद तो कोई आंदोलन भी नहीं बना। अब सवाल है कि हिन्दू राष्ट्र वाद जो न तो
अपनी कोई सोच विकसित कर सका, न ही अपने पैरों पर खड़ा हो सका वह दूसरे मजहबों,
संप्रदायों के लिए खतरा कैसे बन सकता है? दूसरी ओर वह बिरादरी जिसने पाकिस्तान के
विचार की ठोकर मार कर भारत के साथ अपना मुकद्दर बांध दिया उस पर साप्रदयिकता का
इल्जाम कैसे लगाया जा सकता है? लेकिन राजनीतिक संकीर्णताओं ने उन्हें महान भारतीय
स्वप्न का हिस्सा नहीं
बनने दिया।
जाहिर सी बात है कि राजनीतिक दुरभिसंधियों ने देश के धार्मिक और साम्प्रदायिक सौहार्द को हमेशा चोट पहुंचाई है। भविष्य में हम देश के साथ पूरी मानवता को इसी तरह से धार्मिक आतंकवाद में धधकते हुए देखना चाहते हैं या एक सुन्दर भविष्य की कल्पना करते हैं? राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर के नीति नियन्ताओं के साथ-साथ इस देश की जनता, धर्म के ध्वजाधारियों और मजहबी आकाओं के लिए ये एक बड़ा सवाल है विशेषकर इस देश की आजादी के ६३ साल बाद।
सरकार के पास स्पष्ट और दृढ़ नीति का अभाव
भारत में मुस्लिम आतकंवाद की शुरूआत तो आजादी के बाद कश्मीर मुद्दे के साथ ही शुरू
हो गई थी। हिन्दू आतंकवाद ने भी आजादी के बाद से धीरे-धीरे सर उठाना शुरू किया था,
लेकिन तब यह इतनी मुखर नहीं था। वर्ष १९९२ के आस-पास कुछ असहिष्णु और कट्टरवादी
हिन्दुओं को यह लगने लगा कि क्योंकि हम बहुसंख्यक हैं इस लिए हमें अपने अधिकार जताने
चाहिए चाहे इसके लिए हमें हिंसा का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। बाबरी मस्जिद
विंध्वंस के साथ ही हिन्दू आतंकवाद का विस्फोट हुआ। आने वाले समय में इसके थमने या
नियन्त्रित होने की कोई संभावना नहीं दिखाई देती क्योंकि सरकार के पास देश की अन्य
समस्याओं की भांति ही इस पर भी लगाम लगाने की कोई स्पष्ट व दृढ़ नीति नहीं है।
शैलेन्द्र सागर, सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक, साहित्यिक पत्रिका 'कथाक्रमÓ के
सम्पादक व लेखक
धार्मिक आतंकवाद का हल भारतीय संस्कृति में ही निकलेगा
मनुष्य का जन्म संसार में कहीं भी हुआ हो लेकिन मानवता का जन्म हिन्दुस्तान में हुआ।
इससे पहले विश्व में कहीं भी सभ्यता के चिह्नï नहीं दिखाई देते। इस देश में न जाने
कितनी बाहरी प्रजातियां आई और यहाँ की गंगा धारा में समाहित हो गई। चाहे वह आर्य
हों, द्रविड़ हों, शक हों या मंगोल। लेकिन जब कभी दो बिल्कुल विरोधी संस्कृतियां
आपस में टकराती हैं तो स्थिति बहुत विषम हो जाती है। इससे एक तरह का धार्मिक
प्रतिरोध उत्पन्न होता है।
भारतीय संस्कृति जैसी उदारता किसी और संस्कृति में नहीं रही है। इसी संस्कृति में महावीर, महात्मा बुद्ध , भगवान श्रीराम, कबीर, तुलसी जैसी विभूतियों ने सामाजिक समरसता का संदेश दिया। भारतीय संस्कृति ने कभी भी किसी का अहित नहीं किया। वर्तमान में बढ़ रहे धार्मिक आतंकवाद का हल भी इसी संस्कृति में निकलेगा। अगर हम अपने प्राणों के समान, दूसरे के प्राणों को भी अमूल्य समझने लगें, अपनी विचारधारा की तरह दूसरे की विचारधारा को भी सम्मान देने लगें तो कोई संंघर्ष नहीं होगा। जहां तक हिन्दू आतंकवाद की बात है तो यह केवल अपने अस्तित्व, अपनी अस्मिता को बचाने की एक कोथिथ भर है और कुछ नहीं। इसे आप क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में देख सकते हैं।
डा० योगेश प्रवीन, वरिष्ठ चितंक व इतिहासविद्










