क्यों दबाया जा रहा है एम्मार-एमजीएफ मामला?

केवल पांच साल पहले बनी नई कंपनी एम्मार - एमजीएफ को कामनवेल्थ गेम्स के खेलगांव को तैयार करने का काम दिया गया, तो बहुत सारे लोगों को हैरत हुई। पिछले साल एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट ने इस कंपनी के कई ठिकानों पर छापा मारकर कई गंभीर अनियमितताएं पकड़ीं। अब लगता है कि जानबूझकर कंपनी के खिलाफ मामलों को दबाने की कोशिश की जा रही है

कॉमनवेल्थ गेम्स में खेल गांव बनाने वाली एम्मार एमजीएफ कंपनी इन दिनों फिर से चर्चा में है। दिसंबर 2009 में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा से संपर्कों के चलते इस कंपनी के दिल्ली और एनसीआर के ठिकानों पर एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट के अधिकारियों ने छापा मारा। कुल मिलाकर एम्मार एमजीएफ के दिल्ली और एनसीआर स्थित दस आफिसों में छापे मारे गये। जिसमें बहुत सी अनियमितताएं पाई गईं। इसमें विदेशी मुद्रा विनिमय प्रबंधन एक्ट को तोडऩे का मामला यानीफेमा वायलेशन का मामला भी सामने आया था। तब डायरेक्टरेट के सूत्रों ने बताया था कि छापे के दौरान बहुत से दस्तावेज मिले, जिससे पता चला कि कंपनी ने एफडीआई के जरिए आये धन का निवेश एग्रीकल्चर लैंड को खरीदने में किया। साथ ही साथ कंपनी पर विदेशी मुद्रा को बाहर तमाम जगह भेजकर दूसरे रूट्स से उन्हें दूसरे नामों से मंगाने का मामला भी दर्ज किया गया।

दरअसल ये कंपनी दुबई की रियल एस्टेट कंपनी एम्मार और भारत के एमजीएफ ग्रुप का ज्वाइंट वेंचर है। कंपनी वर्ष 2005 में भारत में अस्तित्व में आई।
छापे के बाद तो पहले काफी होहल्ला मचा लेकिन बाद में एम्मार एमजीएफ के आला अधिकारी लीपापोती में लग गये। कंपनी के अधिकारियों ने बताया कि कंपनी पर छापा दरअसल सरकार की एजेंसियों द्वारा रुटीन जांच थी, जिसमें कुछ नहीं मिला। एम्मार एमजीएफ ने कोड़ा से किसी तरह के लिंक से भी इनकार किया लेकिन कंपनी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि मधु कोड़ा के दायें हाथ विनोद सिन्हा ने आखिर क्यों कंपनी में धन लगाया था। दरअसल विनोद सिन्हा से पूछताछ के आधार पर ही एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट ने कंपनी पर छापे मारे थे। अगर तब अखबार में छपी रिपोर्ट्सपर गौर करें तो पायेंगे कि प्रवर्तन निदेशालय को एफडीआई उल्लंघन के पुख्ता सबूत छापे के दौरान मिले थे।

कंपनी ने बाहर से पैसा लाकर एफडीआई के धन के जरिए हरियाणा और यूपी में बेहद सस्ते में एग्रीकल्चरल लैंड खरीदा था। बताया जाता है कि एम्मार एमजीएफ के पास 68 फीसदी लैंड बैंक एग्रीकल्चरल है, जिसे एफडीआई के पैसे से ही खरीदा गया। जबकि हमारे देश में कानून है कि एफडीआई के पैसे से जमीन नहीं खरीदी जा सकती।

सूत्रों का ये भी कहना है कि कई बार एम्मार एमजीएफ के डायरेक्टर्स को सम्मन दिया जा  चुका है।
इस ग्रुप के खिलाफ 350 से ज्यादा कंपनियां फ्लोट करने, बड़े पैमाने पर देश के पैसे को बाहर भेजने और फिर दूसरे रुटों के जरिए इन्हें वापस भारत भेजने के आरोप हैं। कंपनी ने कर्र्ई अपनी कंपनियां साइप्रस, साइमन द्वीप, मारीशस और सिंगापुर में बनाई हुई थीं। इस ग्रुप का दावा है कि वो 16 देशों में अपना कामकाज चलाता है।
हैरत की बात ये है कि दिसंबर में प्रवर्तन निदेशालय के छापे के बाद सरकार ने भी इस पूरे मामले पर गजब की चुप्पी साध ली। मामले को न केवल रफा-दफा करने की कोशिश की गई बल्कि कंपनी को आईपीओ लाने की मंजूरी भी मिल गई।

जब इस मामले के खिलाफ लखनऊ के दो आरटीआई एक्टिविस्ट डा. संतोष कुमार सिंह और तान्या ठाकुर ने पीएमओ में आरटीआई दाखिल करके सवालों के जवाब मांगे तो उन्हें भी गोलमोल कर दिया गया।  

कहा जाता है कि कामनवेल्थ खेलों में खेलगांव बनाने के लिए डीडीए ने न केवल इस कंपनी को मोटा लोन दिलाया था, बल्कि उसे दिल्ली सरकार की ओर से 700 करोड़ रुपये का बेलआउट पैकेज भी मिला था। हालांकि डीडीए अब इससे इनकार करता है, लेकिन हकीकत ये है कि छापे के चलते कामनवेल्थ गेम्स के खेल गांव की तैयारियों पर भी असर पड़ा।
डा. संतोष सिंह द्वारा पीएमओ आफिस को भेजी गई आरटीआई में जो सवाल पूछे गये, उनमें से कुछ को हम य
हां दे रहे हैं। उनकी आरटीआई एक मंत्रालय से लेकर दूसरे मंत्रालय और एक विभाग से लेकर दूसरे विभाग के बीच किस तरह घूमती रही, इसके दस्तावेज भी हम दे रहे हैं लेकिन अफसोस कि आरटीआई पर जवाब के नाम पर अब तक कुछ हासिल नहीं हुआ। हर विभाग इस पर हाथ खड़ा कर चुका है। हैरत तो यही है कि ऐसा क्यों हो रहा है, आखिर किसे बचाया जा रहा है, क्या पीएमओ भी खुद को इसमें लाचार पा रहा है।
अब आइये तान्या ठाकुर द्वारा इसी मामले में पीएमओ आफिस को भेजी गई आरटीआई पर नजर दौड़ाते हैं। जिन्होंने तमाम अखबारों में छपी रिपोट्र्स का हवाला देते हुए पीएमओ के पब्लिक इनफार्मेशन आफिसर के नाम 27 सवाल पूछे थे। उस दस्तावेज को भी हम प्रकाशित कर रहे है।

तान्या द्वारा पूछे गये सवाल तो और भी गंभीर हैं। लेकिन उन्हें भी अब तक कोई जवाब नहीं मिला एक्टिविस्ट तान्या ठाकुर ने तो पूरे मामले को सीबीआई के पास भी भेजा है। जिस पर गजब की चुप्पी साध ली गई है।

डायलाग इंडिया और इसके पाठक भी जानना चाहते हैं कि आखिर किस आधार पर एम्मार एमजीएफ जैसी नई कंपनी को खेल गांव जैसा बड़ा प्रोजेक्ट बनाने का जिम्मा सौंपा गया।
इन सब सवालों और केंद्रकी रहस्यमय चुप्पी के बीच ये तो तय है कि कुछ ऐसा जरूर है, जिसे न तो सरकार सामने लाने देना चाहती है और न ही उसके सरकारी हुक्मरान, शायद उन्हें इस मामले को दबाने के संकेत पहले ही दे दिये गये हैं।

डा. संतोष कुमार सिंह द्वारा आरटीआई में पूछे गये सवाल

  • क्या एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट ने कंपनी को क्लीन चिट दे दी है?
  • एम्मार एमजीएफ पर एफडीआई के पैसे से एग्रीकल्चरल लैंड खरीदने के मामले में क्या कार्रवाई हुई? कंपनी के पास से पांच लाख रुपये की विदेशी मुद्रा जब्त की गई थी, इस मामले में किस तरह की एफआईआर या मामला कंपनी के खिलाफ दर्ज किया गया ..
  • छापे के दौरान कंपनी के पास नौ करोड़ का कैश जब्त किया गया था, इस पर किस तरह की एफआईआर या मामला दर्ज किया गया? कंपनी के खिलाफ दर्ज फेमा मामले की वर्तमान स्थिति क्या है?
  • क्या आपके आफिस ने ये पुष्टि करने की कोशिश की है कि एम्मार \एमजीएफ का आतंकवादी दाउद इब्राहिम से कोई लिंक तो नहीं है?
  • इतने आपराधिक मामलों के बाद क्या सेबी कंपनी के आईपीओ को खारिज करने की दिशा में कुछ कर रही है।
  • कृपया एम्मार एमजीएफ की 350 से ज्यादा कंपनियों का विवरण उपलब्ध कराया जाये।
  • इसके अलावा भी संतोष सिंह ने कई सवाल पूछे थे। लेकिन अब तक उन्हें किसी का संतोषजनक जवाब नहीं मिला है।