
35साल बाद आया इंग्लैंड का समय
इंग्लैंड टीम जीती, क्योंकि ज्यादा डिजर्व करती थी। सही बात ये भी है कि ये एक ऐसी टीम थी, जो बगैर तुक्के या किस्मत के जीती

केवल ग्यारह महीने पहले जब 2009 के वर्ल्ड टी-20में हालैंड के हाथों इंग्लैंड को शिकस्त का सामना करना पड़ा था, तो लोग उनके ऊपर हंसते थे। क्रिकेट में उनके दिन पिछले कुछ वर्षों से खराब ही चल रहे थे। दूसरी टीमें उनसे बहुत आगे निकल चुकी थीं। कभी क्रिकेट की बात उनसे शुरू होती थी लेकिन समय उनके लिए इतना बदल चुका था कि हर कोई मान बैठा था कि इंग्लैंड क्रिकेट का सुधरना मुश्किल है। लेकिन समय सबके लिए भी बदलता है, उनके लिए भी बदला या यों कहें कि वो टीम के ऊपर में यकायक इतने बदल गये कि लोगों को ताज्जुब होने लगा। और अब उन्होंने वो कर डाला है जो पिछले 35सालों में नहीं कर पाये थे। 18ग्लोबल क्रिकेट प्रतियोगिताओं से वो खाली हाथ लौटे थे, जिसमें चार बार वो फाइनल तक भी पहुंचे। लेकिन अब उस क्रिकेट के उस फारमेट के सरताज हैं, जो 2003 में उन्हीं के देश में खोजा गया था। कैरिबियन धरती पर 2010 का वर्ल्ड टी-20इंग्लैंड के चैंपियन बनने के नाम रहा। ये कोई तुक्का नहीं था। वो जीते और हर मैच के साथ खुद को बेहतर साबित करते हुए जीते। विश्वास नहीं होता न। आखिर पिछले दो वर्ल्ड टी२० में वो सुपर एट तक भी नहीं पहुंच पाये थे। पिछले साल खेले आठ में पांच टी-20मैचों में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। लोगों ने कसीदा कढना शुरू कर दिया कि ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट खेलना इंग्लिश क्रिकेटरों के बस की बात नही, वो तो टेस्ट मैच ही खेलते रहें, यही बड़ी बात है। सवाल ये है कि ये चमत्कार हुआ कैसे- सही समय पर सही टीम चुनने और पुरानी गलतियों को नहीं दोहराने के चलते।
पहला क्रेडिट सेलेक्टर्स को कि उन्होंने बढिय़ा टीम चुनी। थकेहारे दिग्गज और पुराने क्रिकेटरों के बदले नये खून को तरजीह दी। वो खिलाड़ी टीम में लिये गये, जिनमें आक्रमकता थी, कुछ कर गुजरने का जज्बा था और दमखम था। इसलिए टीम में माइकल लुंब, क्रेग कीसविटर, माइकल यार्डी जैसे युवाओं को मौका मिला। जेम्स एंडरसन को टीम से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। गेंदबाज के तौर पर टिम ब्रेसनन को लाया गया। देखिये ये पक्का है कि अगर आप अच्छी और तरोताजगी से भरपूर टीम चुनते हैं तो आधी बाजी तो वहीं मार लेते हैं। अब दूसरी वजह। टीम में छह जबरदस्त हिटर्स रखे गये। जो ट्वेंटी ट्वेटी के लिए एकदम परफेक्ट रहा। सलामी जोड़ी के रूप में माइकल लुंब और कीसविटर पारी को धुंआधार शुरुआत करते थे। पहले छह ओवरों के पावरप्ले में उनके धमाकेदार बैटिंग तस्वीर बदल डालती थी। इसके बाद नंबर तीन पर आते थे केविन पीटरसन, जिनकी छवि गजब के विस्फोटक बल्लेबाज की है, यानि गेंदबाजों को कोई गनीमत नहीं। पीटरसन असल मायने में अपनी टीम के लिए जीत का पैटन टैंक बने। छह मैचों में 62 की औसत से रन जुटाये और स्ट्राइक रेट था 137.67का। किसी भी टीम के गेंदबाजों की रुह उनके बल्ले से कांपने लगी थी। बात यहीं नहीं रुकती है। आगे का काम करने के लिए आयवन मोर्गन, लुइक राइट जैसे धमाके मौजूद थे। बेशक कप्तान पाल कोलिंगवुड बहुत बेहतर फार्म में नहीं थे, लेकिन इनके बाद उनका भी नंबर आता था। अगर कप्तान कोलिंगवुड ने टूर्नामेंट के बाद ये फरमाया कि ये उनके समय की सबसे ताकतवर इंग्लैंड टीम थी तो शायद वो गलत नहीं हैं। इंग्लैंड ने पूरे वर्ल्ड कप में कुल मिलाकर 108.2ओवर गेंदबाजी की। इसमें से 106.2ओवर उनके तय पांच गेदबाजों ने डाले। गेंदबाजी की शुरुआत ब्रेसनन और साइडबाटम की जोड़ी करती थी। सधी हुई गेंदबाजी। जिनके खिलाफ बल्लेबाजों के लिए राहत महसूस करने का कोई मौका ही नहीं।
पहले चेंज के बतौर इंट्री लेते थे स्टुअर्ट ब्राड। ब्राड जैसे चतुर और खतरनाक मौजूदा क्रिकेटजगत में इक्का- दुक्का ही हैं। सबकुछ तो है उनकी इंफेंट्री में। बाउंस, यार्कर, धीमी गेंद, लेग कटर, आफ कटर और सधी हुई दिशा-लंबाई। साथ-साथ स्पिनर्स ग्रीम स्वान और माइकल यार्डी का इस्तेमाल। यानि विरोधी टीम को न तो ओपनिंग में चैन और न ही मिडिल आर्डर के दौरान। और इसके तुरंत बाद फिर से साइडबाटम, ब्राड और ब्रेसनन की उल्टी गिनती शुरू। स्वान और साइडबाटम ने दस-दस विकेट निकाले तो ब्राड ने आठ शिकार किये। जीत की चौथी वजह रही किले सरीखी जबरदस्त फील्डिंग। इंग्लैंड की फील्डिंग का लोहा सबने माना। कुल मिलाकर ये एक ऐसी टीम सबके सामने थी, जो बिल्कुल बदली हुई थी। 2008 में जब कोलिंगवुड को इंग्लैंड की कप्तानी से हटाया गया था तब वो निस्तेज लीडर ठप्पा लेकर हाशिये पर सरके थे। तब वो ऐसे कप्तान थे जो हर मोर्चे पर नाकाम मान लिये गये थे, न प्रेरणादायी छाप और कप्तानी के चतुर दांव पेच। लेकिन इस बार वो वाकई बदले हुए थे। उन्होंने टीम को हमेशा स्वस्थ माहौल दिया। टीम दोस्ताना थी, मैदान पर हर मौका भुनाने के लिए खुद को झोंक देने वाले टीम। फाइनल इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के बीच था। लंबे समय बाद ये दोनों टीमें फाइनल में टकराई थीं। और फाइनल मैच सचमुच यादगार मैच था। दोनों टीमों में किसी ने भी एक भी खराब ओवर नहीं फेंका। इंग्लैंड टीम जीती, क्योंकि ज्यादा डिजर्व करती थी। सही बात ये भी है कि ये एक ऐसी टीम थी, जो बगैर तुक्के या किस्मत के जीती।












