हक की लड़ाई लड़ते किसान

उत्तर प्रदेश का किसान गुस्से में है। कारण है एक्सप्रेस-वे के लिए जबरदस्ती अधिग्रहित की जा रही जमीन। अलीगढ़ में जब किसानों का गुस्सा भड़का तो सरकार भी घबरा गई। आधे-पौने दामों पर किसानों की जमीन लेकर उन्हें ठगा ही जाता है।

  • सुरेंद्र अग्निहोत्री की रिपोर्ट

हार कर
मर कर और
पीढिय़ां खपाकर भी
लडऩा-
और केवल लड़ते रहना
होगा/तभी
बसन्त को लौटाया जा सकता है
हरियाली,
ताजगी और
बौरों की महक को
जिया जा सकता है !!

कवि निर्मल वर्मा की इस कविता के अर्थों से प्रेरणा लेकर किसान संघर्ष की राहों पर है। समय का चक्र्र एक फिर अपने पुराने रास्ते पर लौट रहा है इस बार इस चक्र से बसपा को सामना करना पड़ रहा है। किसानों को उनके अधिकारों से वंचित करने तथा उनकी कीमती जमीनों पर निगाहें गड़ाए धन पशुओं ने एक बार फिर प्रदेश को हिंसक घटनाओं के दलदल में फसा दिया है। दादरी से शुरू हुआ किसानों का आन्दोलन मुलायम सिंह को सत्ता से बाहर करने का कारण बना था।

आज इतिहास फिर दुहराने को तैयार दिख रहा है। अलीगढ़ में जेपी समूह के लिये प्रशासन ने डंडे के जोर पर किसानों की कीमती जमीन हथियाने की जो साजिश रची थी उस साजिश के खिलाफ किसानों के सड़कों पर उतर आने से हालात भयाभय हो गये है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की शक्ति के आगे सरकार घुटने टेकने को मजबूर हो गयी है लेकिन किसान किसी भी कीमत पर पीछे हटने के लिये तैयार नही है। ग्रेटर नोएडा से कम मुआवजा उन्हें स्वीकार नही है जिसके कारण कल तक किसानों की अगुवायी करने वाले नेता रामबाबू अब हाशिए पर चले गये है। उनकी भाषा किसानों को सरकार की भाषा लग रही है। इसीएि किसानों ने अपने संघर्ष के लिये एक नई ६१ सदस्यीय संघर्ष समिति का ऐलान कर दिया है। इस समिति के हाथों में आन्दोलन की बागडोर आ जाने के बाद संघर्ष और तेज होने की सम्भावना बढ़ गयी है। किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत भी संघर्ष में शामिल हो रहे है।

नई कमान के तहत मनवीर सिंह तेवतिया के नेतृत्व में आर पार की लड़ाई ने रालोद के अजीत सिंह, कांग्रेस के राहुल गॉधी व दिग्विजय सिंह, सपा मुखिया मुलायम सिंह के साथ पूर्व भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के समर्थन के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे प्रदेश में जहां-जहां बांधों के नाम पर आवासीय कालोनी के नाम पर या सड़कों के नाम पर भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही हो रही है वहां वहां चिंगारी सुलगने लगी है। गौरतलब है कि अलीगढ़ मथुरा से प्रदेश सरकार ने तीन-तीन कबीना मंत्री होने के बाद किसी ने भी खून के आंसू पी रहे किसानों की सुध लेने की तक नही सोची। संवेदनहीनता का यह आलम सिर्फ अलीगढ़ या मथुरा तक ही नही बल्कि पूरे प्रदेश में है। बसपाई सत्ता स्वाद चखने में लगे है सरकारी लाठी खाल खींच रही है। अपनी करूण गाथा कहे तो किससे कहे? मुख्यमंत्री ने जनता दरबार बन्द कर दिया।

यह सरकार जितने एक्सप्रेस-वे बना रही है। उनमें एक मात्र जेपी समूह की भागीदारी कई सवाल खड़े करती है। सरकार इस समूह को रातोरात अंबानी और टाटा के मुकाबले के लिये किसी भी हदतक जाने को तैयार है।

प्रतिपक्ष के विधायकों की कोई सुनता नहीं है। अखबारों में लिखा सच नही माना जाता है। तब इस सरकार को सच से सबक कौन पढ़ाएगा। कांग्रेस के प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव कहते है अभी तो आगाज भर हुआ है। यह सरकार जितने एक्सप्रेस-वे बना रही है। उनमें एक मात्र जेपी समूह की भागीदारी कई सवाल खड़े करती है। सरकार इस समूह को रातोरात अंबानी और टाटा के मुकाबले के लिये किसी भी हदतक जाने को तैयार है। चाहे अन्नदाता पर लाठी चलाना पढ़े या गोली, सरकार उद्योगपतियों की बोलेगी बोली। प्रदेश के २३५११ गॉवों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। गंगा और यमुना का सबसे अधिक अन्न उपजाने वाला क्षेत्र के साथ इतनी निष्ठुरता के लिये समय कभी माफ नहीं करेगा। वहीं दूसरी ओर बसपा मुखिया मायावती हर हाल में किसानों के उग्र होते आन्दोलन पर विराम लगाने के लिये रोज नये-नये प्रस्तावों को ला रही है। सरकार दोनीतियों पर चल रही है। एक प्रशासनिक दबाव और दूसरी ओर सुविधाओं की बौछार के बल पर आन्दोलित किसानों के लिये एक विशेष पैकेज की घोषणा की है।

इसके अनुसार उन किसानों को एकमुश्त वित्तीय सहायता दी जाएगी जिनकी भूमि यमुना एक्सप्रेस वे या इसी प्रकार की अन्य परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत की गयी है या की जाएगी। इस आशय की राजाज्ञा प्रमुख सचिव राजस्व के.के. सिन्हा की ओर से जारी की गयी है। अधिग्रहण से सम्बन्धित समस्याओं के निस्तारण को सरकार ने १७ अगस्त को ही मंडल व मुख्यालय स्तर पर समितियां गठित कर दी थीं। जिलों की समस्या मंडल स्तर पर निस्तारित की जाएगी। जो समस्याएं वहां नहीं सुलझेंगी उन्हें राज्य कमेटी के पास भेजा जायेगा।

पैकेज की खास बातें
जिन किसानों की शत प्रतिशत भूमि ली जाएगी या ली गयी होगी, उन परिवारों को आजीविका चलाने के लिए पांच साल की न्यूनतम कृषि मजदूरी के बराबर एकमुश्त वित्तीय सहायता दी जाएगी। यह सहायता जमीन के मुआवजे के अतिरिक्त होगी। वर्तमान में न्यूनतम कृषि मजदूरी एक सौ रुपया प्रतिदिन है।


ऐसे किसान परिवारों को जिनकी पूरी भूमि अर्जित नहीं की गयी है किन्तु भूमि अर्जन के बाद वे सीमान्त किसान बन गये हैं उन्हें ५०० दिनों की न्यूनतम कृषि मजदूरी के बराबर एकमुश्त सहायता दी जाएगी। 

भूमि अर्जन के बाद जो भूस्वामी छोटे किसान बन गये हैं उन्हें ३७५ दिनों की न्यूनतम कृषि मजदूरी के बराबर वित्तीय सहायता मिलेगी।
कृषि श्रमिकों या गैर कृषि श्रमिकों की श्रेणी से सम्बन्धित प्रत्येक प्रभावित परिवार को ६२५ दिनों की न्यूनतम कृषि मजदूरी के बराबर एक बार में वित्तीय सहायता देने का प्रावधान किया गया है।

उत्तर प्रदेश का किसान गुस्से में है। किसानों के लिये देरसबेर राहत की घोषणा करने वाली उत्तर प्रदेश सरकार यदि समय रहते जाग जाती तो किसान आन्दोलन इतना उग्ररूप धारण नहीं करता।

आपातकालीन स्थिति में किए जाने वाले भूमि अर्जन के मामले में प्रत्येक प्रभावित परिवार को पुनस्र्थापन तथा पुनर्वास योजना को अन्तिम रूप दिये जाने तक की अवधि के लिए आवास उपलब्ध कराया जाएगा। ऐसे परिवारों को उपरोक्त उल्लखित नीति के तहत पुनस्र्थापन तथा पुनर्वास के लाभ दिए जाएंगे।

रेलवे लाइनों, राजमार्गो, ट्रांसमिशन लाइनों, पाइप लाइनों को बिछाने के लिए जहां चौड़ाई में कम और लम्बाई में अधिक भूमि अर्जन की आवश्यकता होती है वहां पर प्रभावित प्रत्येक परिवार को दस हजार रुपये की दर से अनुग्रह राशि मुहैया करायी जाएगी और उनके लिए कोई अन्य पुनस्र्थापन तथा पुनर्वास के लाभ नहीं दिये जाएंगे।

परियोजना प्रभावित परिवारों को पुनस्र्थापन व पुनर्वास लाभ के अतिरिक्त स्वरोजगार कार्यक्रम चलाने के लिए कौशल विकास हेतु प्रशिक्षण की सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
यदि भूमि अर्जन किसी प्राधिकरण के लिए किया जाता है तो पुनस्र्थापन तथा पुनर्वास पर आने वाला खर्च भूखंड की कीमत में जोड़ दिया जाएगा, जिसे निर्धारित ब्याज के साथ जब कभी भूखंड किसी शासकीय या निजी संस्था अथवा किसी व्यक्ति को आवंटित किया जाएगा तो उसे प्राधिकरण द्वारा वसूला जाएगा। भूमि अर्जन किसी कम्पनी के लिए किया जाता है, तो पुनस्र्थापन तथा पुनर्वास पर होने वाला व्यय सम्बन्धित कम्पनी से लिया जाएगा।

किसानों के लिये देरसबेर राहत की घोषणा करने वाली उत्तर प्रदेश सरकार यदि समय रहते जाग जाती तो किसान आन्दोलन उग्र रूप धारण नहीं करता। १७ दिनों से अलीगढ़ में धरना देकर गांधीवादी रास्ते से चल रहे संघर्ष पर ध्यान तब गया जब चार की मौत के बाद इसकी लपटें सत्ता के सिंहासन तक पहुंची तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आनन फानन में मुख्यमंत्री मायावती द्वारा अलीगढ़ मण्डल के कमिश्नर और जिलाधिकारी तथा एसएसपी को हटाकर आग को ठंण्डा करने का प्रयास किया है। लेकिन विपक्षी आक्रमण और २०१२ के विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगे राजनैतिक दल इस मुद्दे को किसी भी कीमत पर छोडऩे को तैयार नहीं है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने मथुरा एवं अलीगढ़ के किसानों द्वारा उनकी अधिग्रहण की गयी जमीन के मुआवजे को लेकर किए जा रहे आन्दोलन के चलते हुई हिंसक घटनाओं पर दु:ख प्रकट करते हुए इस पूरी घटना की निन्दा की है। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार की यह सर्वोच्च प्राथमिकता रही है कि किसानों की जमीन को आपसी सहमति से करार नियमावली के तहत उचित मुआवजा देने के बाद ही लिया जाए। उन्होंने कहा कि किसानों की जमीन के मुआवजे के बारे में अधिकारियों को इस विषय की गम्भीरता में जाकर तथा सभी तथ्यों पर विचार करके किसानों के हित में ही निर्णय लेना चाहिए। क्योंकि हमारी सरकार यह कभी नहीं होने देगी कि किसानों की जमीन को सस्ती दरों पर लेकर कोई उद्योगपति या अन्य व्यक्ति उसका भारी मुनाफा कमा सके।

सुश्री मायावती ने किसानों की भूमि अधिग्रहण के मुआवजेे को लेकर विभिन्न विपक्षी दलों द्वारा की जा रही राजनीति को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी को तो किसानों का हितैषी बनने से पहले दादरी में पावर प्लंाट के लिए पूर्ववर्ती सपा की सरकार द्वारा जबरन अधिग्रहित की गयी हजारों एकड़ भूमि के मामले को याद कर लेना चाहिए था, जहां कौडिय़ों के दाम किसानों की जमीन लेकर समाजवादी पार्टी के मुखिया ने अपने एक चहेते औद्योगिक घराने को दे दी थी, जिसके चलते किसानों को लम्बे समय तक उग्र आन्दोलन करना पड़ा और अन्तत: न्यायालय की शरण लेने पर ही किसानों को कुछ राहत मिल पायी। उन्होंने कहा कि सपा अध्यक्ष इस मामले में अपना मुंह खोलने से पहले अपने गिरेहबान में झांककर देख लेते तो अच्छा होता।

मुख्यमंत्री ने सपा एवं अन्य विरोधी दलों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि किसानों का हित साधक बनने वाली इन पार्टियों को चाहिए था कि वह किसानों को भड़काने के बजाय उन्हें शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात सरकार के सामने रखने के लिए प्रेरित करते, जबकि सभी विरोधी पार्टियां इसके विपरीत केवल अपने राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने के लिए घडिय़ाली आसू बहा रही हैं, जिसका कोई मतलब नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी की केन्द्र की सरकार ने एस.ई.जेड. (विशेष आर्थिक क्षेत्र) के नाम पर जिस तरह से किसानों की देशभर में लाखों एकड़ जमीन को औने-पौने दाम में लेकर कौडिय़ों के मोल उद्योगपतियों को दिया है, उसकी मिसाल देश में मिलना असम्भव है और ऐसी पार्टी जब किसानों का हितैषी बनकर उनको उचित मुआवजा दिलाने के लिए संघर्ष करने की बात कहती है तो उसे हास्यास्पद ही कहा जायेगा।

किसान 19 दिन से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले हफ्ते कैबिनेट सचिव शशांक शेखर के साथ किसान नेताओं से वार्ता के बाद 14 रुपये मुआवजा बढ़ाया गया था पर किसानों की मांग है कि नोएडा के मुकाबले ही मुआवजा दिया जाए

उन्होंने कहा कि इसके विपरीत हमारी सरकार की नीति एकदम साफ है कि वह किसानों के हितों की अनदेखी कभी भी नहीं होने देगी और इसीलिए वर्ष २००७ में सत्ता संभालने के बाद से एक स्पष्ट नीति भूमि अधिग्रहण के बारे में लागू की गयी थी, जिससे कि किसानों को उनकी जमीनों का भरपूर मुआवजा मिल सके। इसीलिए अलीगढ़ के किसानों की भूमि अधिग्रहण के मामले को लेकर किसानों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकर विचार-विमर्श शासन स्तर पर किया गया था तथा सहमति बनाने की कोशिश की गयी थी।

सुश्री मायावती ने कहा कि उन्होंने मथुरा एवं अलीगढ़ में किसानों के आन्दोलन के दौरान हुई हिंसक घटनाओं को गम्भीरता से लेेते हुए घटना की न्यायिक जांच कराने का निर्णय लिया है और हिंसक घटनाओं में मारे गए व्यक्ति के परिवार को पांच लाख रूपये की आर्थिक सहायता भी स्वीकृत कर दी गयी है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों को उनकी भूमि के मुआवजे के पूरे प्रकरण को गम्भीरता से परीक्षण करने के लिए आयुक्त, अलीगढ़ मण्डल की अध्यक्षता में एक समिति भी गठित करने के आदेश दे दिए गए हैं, जो किसानों के पक्ष को सुनकर इस प्रकरण में अपनी रिपोर्ट शासन को देगा। जिससे कि किसानों के हितों की पूरी रक्षा की जा सके। विवाद की जड़ बने मुआवजा के प्रति स्थानीय प्रशासन की संवेदनहीनता और लोकतांत्रिक तरीके से लगातार धरना दे रहे किसानों के प्रति उदासीनता बरतने वालों को सिर्फ स्थानान्तरण की सजा देने से किसानों का गुस्सा कम होता नजर नहीं आ रहा है। किसान नेता बताते है कि इस विवाद की जड़ अलीगढ़ के टप्पल में हाईवे किनारे ४८८ हेक्टेयर भूमि पर टाउनशिप बसाने की योजना है। इसमें से २०१ हेक्टेयर भूमि पर किसानों से करार हो सका है। २८७ हेक्टेयर भूमि अभी तक नहीं मिल सकी है। किसान इसलिए करार नहीं कर रहे कि उन्हें मौजूदा मुआवजा दर (४३६ रुपये र्पति वर्ग मीटर) मंजूर नहीं है।

मांग पूरी करने के लिए किसान १९ दिन से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले हफ्ते कैबिनेट सचिव शशांक शेखर के साथ किसान नेताओं से वार्ता के बाद १४ रुपये मुआवजा बढ़ाया गया था लेकिन किसान इस बात के लिये तैयार नहीं थे। उनकी मांग थी नोएडा के मुकाबले ही मुआवजा दिया जाए। आन्दोलन को दबाने के लिये रातों रात किसानों के नेता रामबाबू कटेलिया को गिरफ्तार करके हिंसा के लिये किसानों को विवश कर दिया गया। लाखों की सम्पत्ति आग की भेंट चढ़ गयी। इस आन्दोलन में आगरा के किसानों के शामिल होने के बाद सरकार संशकित हो गयी है ।
आगरा में कैबिनेट सचिव शशंाक शेखर सिंह द्वारा आगरा आकर किसानों से वार्ता कर की गयी घोषणाओं के प्रति किसानों ने उत्साह दिखाया है। जिलाधिकारी अमृत अभिजात ने बताया है कि खराब मौसम के बाबजूद ग्राम गढीरामी और छलेसर के तीन कृषकों ने स्वेच्छा से भूमि का करार किया है।

श्री अभिजात ने बताया कि ग्राम गढीरामी की श्रीमती किशनदेवी पत्नी ओमप्रकाश तथा इनके सह-खातेदार ने रकबा १-४४ है, भूमि का करार किया है। श्री भंवर सिंह पुत्र राम दयाल निवासी छलेसर ने ०-६९६३ है, भूमि का करार किया है। इन्हें ५८० रूपये प्रति वर्ग मीटर मुआवजा दिया जायेगा।

किसानों को ३ करोड ६८ लाख रूपए का मुआवजे का वितरण किया गया। इस धनराशि के २१ चेक किसानों को वितरित किये गये तो दूसरी ओर जेबी समूह द्वारा अनेक अज्ञात लोगों के विरूद्ध पुलिस ने एफआईआर दर्ज कराकर दबाव बनाने की राजनीति शुरू हो गयी है। वही ंदूसरी ओर रालोद नेता चौधरी अजीत सिंह २६ अगस्त को दिल्ली घेरने की तैयारी में लग गये है। देखना यह है कि किसानों की यह जंग क्या रंग लाती है।