चढ़ गया कबड्डी का रंग

वर्ल्ड कप कबड्डी ने देसी खेलों के प्रति लोगों के जज्बे और जुनून को साबित किया है। टूर्नामेंट में उमड़ी भीड़ ने क्रिकेट की लोकप्रियता को भी पीछे छोड़ दिया। देसी खेलों को भी अगर पेशेवर अंदाज में आगे बढ़ाएं तो न तो उनमें संभावनाओं की कमी है और न ही पैसे की..

( रत्ना श्रीवास्तव )
कुछ दिनों पहले पंजाब में हुई वर्ल्ड कप कबड्डी का आयोजन कई मायनों में अनूठा रहा। दुनिया भर के 9 देश इसमें जुटे। विजेता टीम को एक करोड़ रुपये का इनाम दिया गया। सबसे बड़ी बात ये रही कि इस प्रतियोगिता में जबरदस्त दर्शक ही नहीं जुटे बल्कि इसको लेकर उनका उत्साह भी देखते ही बनता था। फाइनल मैच के दौरान भीड़ की संख्या करीब करीब एक लाख तक पहुंच गई थी, जो वाकई एक रेकार्ड भी है। वैसे हकीकत ये है कि आज भी छोटे शहरों और कस्बों में कुश्ती और अन्य खेलों के मैच देखने के लिए अपने आप हजारों की भीड़ जुट जाती है। उस समय इन दर्शकों को जोश और जुनून देखते ही बनता है। कबड्डी हमारे देश का सबसे लोकप्रिय देसी खेल रहा है, सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण एशियाई देशों में ये खूब खेला जाता है। इस खेल में न तो किसी तरह के महंगे उपकरणों की जरूरत होती है और न ज्यादा तामझाम की। इसलिए इसे खेलना सबसे आसान रहा है। उत्तर भारत के गांवों और कस्बों में ये आज भी सबसे लोकप्रिय खेल है। पिछले दो दशक में निश्चित तौर पर तमाम दूसरे खेल हमारे देश में जिस तरह लोकप्रिय हुए हैं, उससे कबड्डी निश्चित तौर पर धक्का लगा है लेकिन अब लगता है कि कबड्डी को न केवल गंभीरता से लिया जा रहा है बल्कि उसे आगे बढ़ाने की कोशिशें भी सही तरीके से शुरू हुई हैं। खासकर उसमें पंजाब सरकार की भूमिका की सराहना करनी होगी। वर्ल्ड कप कबड्डी का फाइनल भारत ने पाकिस्तान को हराते हुए जीता। जिस स्टेडियम में ये फाइनल मैच हुआ, उसमें दर्शकों का जबरदस्त जमावड़ा था। मैच के हर पल के साथ न केवल रोमांच हर किसी पर हावी दिख रहा था। इससे पहले सेमीफाइनल में भारत ने कनाडा को 57-36 से हराया था और पाकिस्तान ने इटली को 57-33 से शिकस्त दी थी। इस वर्ल्ड कप में भारत और पाकिस्तान के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, इटली, ईरान और आस्ट्रेलिया जैसी टीमों ने हिस्सा लिया था। ये भी पहली बार हुआ था कि कबड्डी का आयोजन एक बड़े स्तर पर ही नहीं किया गया बल्कि उसमें खेल के प्रोत्साहन के लिए बड़े पैमाने पर इनामों की भी घोषणा की गई। फाइनल में भारत ने एकतरफा तरीके से पाकिस्तान को 58-24 से रौंद दिया। भारत के खिलाडिय़ों का दमखम और कला कौशल देखते ही बनता था। जिस आत्मविश्वास के साथ उन्होंने फाइनल मैच में पाकिस्तान को पटखनी दी, उससे जाहिर हो गया कि इस खेल में अभी हमारा कोई सानी है भी नहीं। हालांकि ये बात भी दीगर है कि कबड्डी जितनी लोकप्रिय भारत में है, उससे कम पाकिस्तान में नहीं। दोनों ही देशों में इसके जबरदस्त दीवानें हैं। खासकर ग्रामीण अंचल में तो ये लोगों में खासा रचा बसा खेल है। गुरु नानक देव स्टेडियम लुधियाना में खेले गये फाइनल मैच में एक बात और महसूस हुई कि लोग चाहते हैं कि ये खेल भी नियमित तौर पर होते रहें ताकि हमारे देसी खेल बचे ही नहीं रहें बल्कि इंटरनेशनल स्तर भी उनकी एक पहचान बने।

कोरिया, चीन, जापान जैसे एशियाई देशों ने अपने कुछ खेलों को इंटरनेशनल स्तर पर स्थापित करने में सफलता हासिल की है। कबड्डी को लेकर भारत ने भी ये कोशिशें की थीं। एशियाई खेलों में हमने इसे शामिल भी कराया, लेकिन इसे आगे बरकरार नहीं रख पाये, नतीजा ये हुआ कि कबड्डी जो रुतबा हासिल होना चाहिए था, वो हासिल नहीं हो पाया। अगर एक खेल के तौर पर देखें तो कबड्डी में वो सबकुछ है, जो एक रोमांचक खेल में होना चाहिए। इसमें तेजी है, क्षमता है, दमखम है और भरपूर उतार-चढ़ाव की स्थितियां भी। यहां तक की जो विदेशी इस खेल को देखता है, वो इसके रोमांच को महसूस किये बिना नहीं रह पाता, इसे समझने के लिए तकनीकी दावपेंचों को भी समझने की भी जरूरत नहीं। जिस तरह फुटबाल दुनियाभर में स्वाभाविक खेल के रूप में लोकप्रिय हुआ है, वैसी ही कुछ प्रवृतियां कबड्डी में भी हैं। सही मायनों में ये उन सभी लोगों का खेल है, जिन्हें दमखम भी पसंद है और फुर्ती-चुस्ती भी। अगर फाइनल मैच की बात करें तो पूरे टूर्नामेंट में भारत और पाकिस्तान ने सबसे बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया था। दोनों ही टीमें अपराजित रहते हुए यहां तक पहुंची थीं। ऐसे में तय था कि आखिरी मुकाबला जोरदार होगा। पाकिस्तान ने फाइनल मैच के दौरान लगातार हमले किये लेकिन भारतीय टीम के शानदार डिफेंस ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इस बेहतरीन डिफेंस के हीरो रहे भारतीय कप्तान मंगत सिंह मंगी। पहले हाफ में उन्होंने सात बार विरोधी टीम के राइडर को योजना बनाकर धरदबोचा। हाफटाइम तक भारत 26-12 की बढ़त ले चुका था। दूसरे हाफ में पाकिस्तान वापसी की काफी कोशिश की लेकिन भारत के बेहतरीन रक्षण के साथ पैने आक्रमण के सामने उसे हथियार डालने पड़े। पूरी भारतीय टीम ने बेहतरीन खेल दिखाया। फाइनल मैच के बाद पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह ने कहा कि कबड्डी को लेकर जो अनपेक्षित रिस्पांस देखने को मिला है, उससे लगता है कि कबड्डी हमारे दिलों में काफी गहरे तक है। लिहाजा अब इसे आगे बढ़ाने के लिए हर तरह की कोशिश की जायेगी। इसी क्रम में उन्होंने अगले एक साल में राज्य में इस खेल के आठ नये स्टेडियम बनाने की भी घोषणा की। अगला वल्र्ड कप इन्हीं नये स्टेडियमों में होगा। ये तो तय है कि जिस तरह से ये वर्ल्ड कप आयोजित किया गया, वो कबड्डी में निश्चित रुप से नई जान फूंकेगा। इसके प्राइज मनी लोगों को इस खेल की ओर खींचेगी, क्योंकि उन्हें महसूस होगा कि इस खेल में भी पैसा है और एक खेल के तौर पर इसमें भी करियर बनाया जा सकता है।

एक और बात ये है कि कबड्डी खुद को भी बदल रही है और नये जमाने के खांचे में खुद को फिट करने की कोशिश कर रही है। स्टापर और राइडर जैसे नये शब्द गढें गये हैं। इसी टूर्नामेंट में डिफेंस में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले भारतीय कप्तान मंगत सिंह को बेस्ट स्टॉपर घोषित किया गया जबकि कनाडा के कुलजीत सिंह को बेस्ट राइडर का इनाम दिया गया। भारतीय टीम के लिए एक खुशी की बात ये भी रही कि पंजाब सरकार टीम के सभी सदस्यों को नौकरी देने जा रही है। राज्य सरकारें अगर चाहें तो अपने दम पर भी कुछ खेलों को गोद लेकर उन्हें न केवल संवार सकती हैं बल्कि उनमें नई जान भी डाल सकती हैं। पंजाब सरकार की ये पहल तो कम से कम यही बताती है। दूसरे राज्यों को भी इससे सीख लेनी चाहिए। खासकर उन राज्यों को जो खेलों के आवंटित किये धन का उपयोग भी सही तरीके से नहीं कर पातीं और खेलों को लेकर उनके उपेक्षापूर्ण तौर तरीकों के चलते खेल हाशिये पर चले जाते हैं।