
कश्मीर की स्वायत्तता

- सुरेश चिपलूनकर : http://blog.sureshchiplunkar.com
प्रधानमंत्री जी ने कश्मीर मुद्दे पर सभी दलों की जो बैठक बुलाई थी, उसमें उन्होंने एक बड़ी गम्भीर और व्यापक बहस छेडऩे वाली बात कह दी कि यदि सभी दल चाहें तो कश्मीर को स्वायत्तता दी जा सकती है ---- लेकिन आश्चर्य की बात है कि भाजपा को छोड़कर किसी भी दल ने इस बयान पर आपति दर्ज करना तो दूर स्पष्टïीकरण मँागना भी उचित नहीं समझा। प्रधानमंत्री द्वारा ऑफर की गई स्वायत्तता का क्या मतलब है? क्या प्रधानमंत्री या कंाग्रेस खुद भी इस बारे में स्पष्टï है या ऐसे ही हवा में कुछ बयान उछाल दिया? कंाग्रेस वाले स्वायत्तता किसे देंगे? उन लोगों को जो बरसों से भारतीय टुकड़ों पर पल रहे हैं फिर भी अमरनाथ में यात्रियों की सुविधा के लिए अस्थाई रूप से जमीन का एक टुकड़ा देने में उन्हें खतरा नजर आने लगता है और विरोध में सड़कों पर आ जाते हैं या स्वायत्तता उन्हें देंगे जो सरेआम भारत का तिरंगा जला रहे हैं, १५ अगस्त को काला दिवस मना रहे हैं किस स्वायत्तता की बात हो रही है मनमोहन जी, थोड़ा हमें भी तो बतायें। मीडिया बार-बार कश्मीर की हिंसा की खबरें दिखा रहा हैं जी हाँ जरूर दिखा रहा है, लेकिन हेडलाइन, बाइलाइन, टिकर और स्क्रीन में नीचे चलने वाले स्क्रोल में आपको कश्मीर में गुस्सा, कश्मीर का युवा आक्रोशित, कश्मीर में सुरक्षा बलों पर आक्रोशित युवाओं की पत्थरबाजी जैसी खबरें दिखाई देंगी। सवाल उठता है कि क्या मीडिया में राष्टï्रबोध नाम की चीज एकदम खत्म हो गई है या ये किसी के इशारे पर इस प्रकार की हेडलाइनें दिखाते हैं कश्मीर में गुस्सा, आक्रोश किस बात पर आक्रोश और किस पर गुस्सा भारत की सरकार पर लेकिन भारत सरकार यानी प्रकारान्तर से करोड़ों टैक्स भरने वाले तो इन कश्मीरियों को ६० साल से पाल-पोस रहे हैं, फिर किस बात का आक्रोश? भारत की सरकार के कई कानून वहाँ चलते नहीं, कुछ को वे मानते नहीं, उनका झंडा अलग है, उनका संविधान अलग है। भारत का नागरिक वहाँजमीन खरीद नहीं सकता, धारा ३७० के तहत विशेषाधिकार मिला हुआ है, हिन्दुओं (कश्मीरी पण्डितों) को बाकायदा धार्मिक सफाये के तहत कश्मीर से बाहर किया जा चुका है फिर किस बात का गुस्सा है भई? कहीं यह हरामखोरी की चर्बी तो नहीं? लगता तो यही है। वरना क्या कारण है कि १४-१५ साल के लड़के से लेकर यासीन मलिक, गिलानी और अब्दुल गनी लोन जैसे बुजुर्ग भी भारत सरकार से जब देखो तब खफा रहते हैं।
जबकि दूसरी तरफ देखें तो भारत के नागरिक, हिंदू संगठन, तमाम टैक्स देने वाले और भारत को अखण्ड देखने की चाह रखने वाले देशप्रेमी जिनको असल में गुस्सा आना चाहिए, आक्रोशित होना चाहिए, नाराजगी जताना चाहिए चुपचाप बैठे हैं और स्वायत्तता का राग सुन रहे हैं? कोई भी उठकर ये सवाल नहीं करता कि कश्मीर के पत्थरबाजों को पालने, यासीन मलिक जैसे देशद्रोहियों को दिल्ली लाकर पाँच सितारा होटलों में रूकवाने और भाषण करवाने के लिये हम टैक्स क्यों दें? किसी मीडिया कर्मी ने कभी किसी कश्मीरी पंडित का इंटरव्यू लिया कि उसमें कितना आक्रोश है? लाखों हिंदू लूटे गये, बलात्कार किए गये, उनके मन्दिर तोड़े गये, क्योंकि गिलानी के पाकिस्तानी आका ऐसा चाहते थे, तो जिन्हें गुस्सा आया होगा कभी उन्हें किसी चैनल पर दिखाया ? नहीं दिखाया, क्यों? क्या आक्रोशित होने और गुस्सा होने का हक सिर्फ कश्मीर के हुल्लड़बाजों को ही है, राष्टï्रवादियों को नहीं लेकिन जैसे ही राष्टï्रवाद की बात की जाती है मीडिया को हुडहुडी का बुखार आ जाता है, राषट्रवाद की बात करना, हिंदू हितों की बात करना तो मानो वर्जित ही है-- किसी की औकात नहीं है कि वह कश्मीरी पण्डितों की दुर्गति और नारकीय परिस्थितियों पर कोई कार्यक्रम बनाए और उसे हेडलाइन बनाकर जोर-शोर से प्रचारित कर सके, कोई चैनल देश को यह नहीं बताता कि आज तक कश्मीर के लिये भारत सरकार ने कितना कुछ किया है, क्योंकि उनके मालिकों को पोलिटिकली करेक्ट रहना है, उन्हें कंाग्रेस को नाराज नहीं करना है स्वाभाविक सी बात है कि तब जनता पूछेगी कि इतना पैसा खर्च करने के बावजूद कश्मीरी में बेरोजगारी क्यों है पिछले ६० साल से कश्मीर में किसकी हुकूमत चल रही थी? दिल्ली में बैठे सूरमा, खरबों रूपये खर्च करने बावजूद कश्मीर में शांति क्यों नहीं ला सके? ऐसे असुविधाजनक सवालों से सेक्यूलरिज्म बचना चाहता है, इसलिए हमें समझाया जा रहा है कि कश्मीरी युवाओं में आक्रोश और गुस्सा है।
इधर अपने देश में गैर जिम्मेदार किस्म का मीडिया है, प्रस्तुत चित्र में देखिए एक अखबार फोटो के कैप्शन में लिखता है कश्मीरी मुसलमान महिला और भारतीय पुलिसवाला। क्या मतलब है? इसका? पुलिस कश्मीरी मुस्लिमों पर अत्याचार कर रही है? यही तो पाकिस्तानी और अलगाववादी कश्मीरी भी कहते क्या अखबार इशारा करना चाहता है कि कश्मीर भारत से अलग हो चुका है और भारतीय हैं मजे की बात तो यह कि यह मीडिया संस्थान 'अमन की आशाÓ जैसे कार्यक्रम भी आयोजित कर लेते हैं। जबकि उधर पाकिस्तान में उच्च स्तर पर भी लोग कश्मीर को भारत से अलग करने में जी-जान से जुटे हैं, इसका सबूत यह है कि हाल ही में जब संयुक्त राष्टï्र के महासचिव बान की मून ने कश्मीर के सन्दर्भ में अपना विवादास्पद बयान पढ़ा था (बाद में उन्होंने कहा कि यह उनका मूल बयान नहीं है) असल में बान के बयान का मजमून बदलने वाला व्यक्ति संयुक्त राष्टï्र में पाकिस्तान का प्रवक्ता फरहान हक है, जिसने मूल बयान में हेराफेरी करके उसमें कश्मीर जोड दिया। क्यों अपना मुँह सिले बैठे रहते हैं? जमाने भर में फरतन ने तो अपने देश के प्रति देशभक्ति में दिखाई लेकिन भारत के तथाकथित सेक्यूलरिज्म के पेरौकाट दाऊद इब्राहिम का पता लेकर घूमते रहते हैं दाऊद यहाँ है, दाऊद वहाँ है, दाऊद ने आज खाना खाया, दाऊद ने आज पानी पिया, अरे भाई देश की जनता को इससे क्या मतलब देश की जनता तो तब खुश होगी, जब सरकार रॉ जैसी संस्था के आदमियों की मदद से दाऊद को पाकिस्तान में घुसकर निपटा दें और फिर मीडिया भारत की सरकार का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गुणगान करे यह तो मीडिया और सरकार से बनेगा नहीं इसलिये 'अमन की आशा का राग अलापते हैं।
दिल्ली और विभिन्न राज्यों में एक अल्पसंख्यक आयोग और मानवधिकार आयोग नाम के दा बिजूके बैठे हैं लेकिन इनकी निगाह में कश्मीरी हिंदुओं का कोई मानवधिकार नहीं? मार-मारकर भगाए गए कश्मीरी पण्डित इनकी निगाह में अल्पसंख्यक नहीं हैं क्योंकि अल्पसंख्यक की परिभाषा भी तो इन्ही कंागे्रसियों द्वारा गढ़ी गई है। मनमोहन सिंह जी को यह कहना तो याद रहता है कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है लेकिन कश्मीरी पंडितों के दर्द और लाखों अमरनाथ यात्रियों के वाजिब हक के मुद्दे पर उनके मुँह में दही जम जाता है। वाकई में गँाधीवादियों, सेकुलरों और मीडिया ने मिलकर एकदम बधियाकरण ही कर डाला है देश का। देशहित से जुड़े किसी मुद्दे पर कोई सार्थक बहस नहीं, भारत के हितों से जुड़े मुद्दों पर देश का पक्ष लेने की बजाय, या तो विदेशी ताकतों का गुणगान या फिर देशविरोधी ताकतों के प्रति सहानुभूति पैदा करना। आखिर कितना गिरेगा हमारा मीडिया ?
अब जबकि खरबों रूपये खर्च करने के बावजूद कश्मीर की स्थिति २० साल पहले जैसी ही है, तो समय आ गया है कि हमें गिलानी, यासीन जैसों से दो टूक बात करनी चाहिए कि आखिर किस प्रकार की आजादी चाहते है वे कैसी स्वायत्तता चाहिये उन्हें ? क्या स्वायत्तता का मतलब यही है कि भारत उन लोगों को अपने आर्थिक संसाधनों से पाले-पोसे, वहाँ बिजली परियोजानाएं लगाये, बाँध बनवाये यहाँ तक की डल झील की सफाई भी केन्द्र सरकार करवाए ? उनसे पूछना चाहिये कि ६० साल में भारत सरकार ने जो खरबों रूपया दिया, उसका क्या हुआ उसके बदले में पत्थरबाजों और उनके आकाओं ने भारत को एक पैसा भी लौटाया क्या वे सिर्फ फोकट का खाना ही जानते हैं, चुकाना नहीं?
गलती पूरी तरह से उनकी भी नहीं है, नेहरू ने अपनी गलतियों से जिस कश्मीर को हमारी छाती पर बोझ बना दिया था, उसे ढोने में सभी सरकारें लगी हुई हैं जो वर्ग विशेष को खुश करने के चक्कर में कश्मीरियों की परवाह करती रहती हैं। ये जो बार-बार मीडियाई भांड, कश्मीरियों का गुस्सा, युवाओं का आक्रोश जैसी बात कर रहे हैं, यह आक्रोश गुस्सा सिर्फ पाकिस्तानी भावना रखने वालों के दिल में ही है। बाकियों के दिल में नहीं और यह लोग मशीनगनों से गोलियों की बौछार खाने की औकात ही रखते हैं जो कि उन्हें दिखाई भी जानी चाहिए उलटे यहाँ तो सेना पूरी तरह से हटाने की बात हो रही है। अलगाववादियों से सहानुभूति रखने वाले देशभक्त हो ही नहीं सकता, उन्हें जो भी सहानुभूति मिलेगी वह विदेश से । चीन ने जैसे थ्येन आनमन चौक में विद्रोह को कुचलकर रख दिया था अब तो वैसा ही करना पडेगा। कश्मीर को ५ साल के लिये पूरी तरह सेना के हवाले करो, अलगाववादी नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में सड़ाओं या उड़ाओ, धारा ३७० खत्म करके कश्मीरी उग्रवादी नेताओं और भटके हुए नौजवानों को समझाओ कि भारत के बिना उनकी औकात दो कौड़ी की भी नहीं है क्योंकि यदि वे पाकिस्तान में जा मिले तो नर्क मिलेगा और उनकी बदकिस्मती से आजाद कश्मीर बन भी गया तो अमेरिका वहाँ किसी न किसी बहाने कदम जमाएगा, अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी की परवाह मत करो पाकिस्तान जब भी कश्मीर राग अलापे, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का मुद्दा जोर-शोर से उठाओ। ऐसे कई-कई कदम हैं, जो तभी उठ पाएंगे, जब मीडिया सरकार का साथ दे और अमन की आशा जैसी नॉस्टैल्जिक उलटबाँसियां न करे।
खरबों रूपये खर्च करने के बाद कश्मीर की स्थिति २० साल पहले जैसी ही है, समय आ गया है कि हमें गिलानी, यासीन जैसों से दो टूक बात करनी चाहिए कि आखिर किस प्रकार की आजादी चाहते है वे कैसी स्वायत्तता चाहिये उन्हें
लेकिन अमेरिका क्या कहेगा, पाकिस्तान क्या सोचेगा, संयुक्त राष्ट्र क्या करेगा, चीन
से सम्बन्ध खराब तो नहीं होंगे जैसी मूर्खतापूर्ण और डरपोक सोचों की वजह से ही हमने
इस देश और कश्मीर का ये हाल कर रखा है कंाग्रेस आज कश्मीर को स्वायत्तता देगी, कल
असम को, परसों पश्चिम बंगाल को, फिर मणिपुर और केरल को। इजराइल तो बहुत दूर है हमारे
पड़ोस में श्रीलंका जैसे छोटे से देश ने तमिल अंादोलन को कुचलकर दिखा दिया कि यदि
नेताओं में 'रीढ़ की हड्डी मजबूत है और जनता में देशभक्ति का जज्बा हो और मीडिया
सकारात्मक रूप से देशहित में सोचे तो बहुत कुछ किया जा सकता है।
घाटी का सच
अपनी इन्ही देशद्रोही नीतियों की वजह से कश्मीरी नेताओं और जनता ने देखिए
क्या-क्या हासिल कर लिया है।
१- कश्मीर घाटी से गैर-मुस्लिमों का पूरी तरह से सफाया कर दिया गया है।
२- कई आतंकवादी, जिन्हें सुरक्षाबलों ने जान की बाजी लगाकर पकड़ा था, पैसा, बिरयानी
आदि लेकर जेल से बाहर आजाद घूम रहे हैं।
३- कश्मीर घाटी में अलगाववादी भावनाएं जोरों पर हैं, चाहे खुद का प्रधानमंत्री हो
या फिर छ: साल की विधानसभा।
४- पश्चिमी मीडिया (खासकर बीबीसी) के सामने हमेशा कश्मीरी मुसलमान रोते-गाते नजर आते
हैं कि हम पर भारतीय सुरक्षा बल बहुत अत्याचार करते हैं।
५- केन्द्र से मिली मदद, सब्सिडी और छूट का फायदा उठाने (यानी हमारा खून चूसने) में
ये पिस्सू सबसे आगे रहते हैं।
६- कश्मीरियत का झूठा राग सतत अलापते रहते हैं, जबकि अब कश्मीरियत मतलब सिर्फ
इस्लाम हो चुका है।
७- कश्मीरी सारे भारत में कहीं भी रह सकते हैं, कहीं भी जमीनें खरीद सकते हैं,
लेकिन कश्मीरी में वे किसी को बर्दाश्त नहीं करते ।
कुल मिलाकर कश्मीरियों के लिए यह विन-विन की स्थिति है (दोनों हाथों में लड्डू) फिर
क्या वे मूर्ख हैं जो इतनी आसानी से ये सुविधायें अपने हाथों से जाने देंगे? ढोंगी
मुफ्ती मुहम्मद चाहते हैं कि आतंकवादियों के परिवारों का पुनर्वास किया जाये (जाहिर
है कि केन्द्र के पैसे से यानी हमारे-आपके पैसे से) जिसके लिए करोड़ों की योजना
उन्होंने केन्द्र को भेजी है। हमेशा की तरह इस योजना को मानवधिकारवदियों और
धर्मनिरपेक्षतावादियों ने हाथों-हाथ लपक लिया है। इनसे पूछना चाहिये कि आखिर किस
बात का पुर्नवास और मुआवजा ? तुम्हारा लड़का हमसे पूछकर तो आतंकवादी नहीं बना था।
वह तो जन्नत में ७२ परियों के लालच में जेहादी बना था ना फिर हमारे खून-पसीने की
कमाई पर। तुम क्यों ऐश करोंगे ? जरा इजराइल से सबक लो वहाँ स्पष्ट नीति है कि
आंतकवादी के पूरे परिवार को दंड दिया जाता है, बुलडोजर से उसका घर बार उखाड़ दिया
जाता है और आतंकवादी के परिवार वाले फिलीस्तीन की सड़कों पर भीख माँगते हैं। शायद
सड़क पर भीख माँगती अपनी माँ को देखकर किसी कट्टर आतंकवादी का दिल पिघले। जले पर
नमक छिड़कने की इंतहा तो यह कि महबूबा मुफ्ती कहती हैं कि घाटी से गए पंडितों का
स्वागत है, हम उनकी सुरक्षा का पूरा ख्याल रखेंगे, लेकिन महबूबा ने यह नहीं बताया
कि पंडितों की जिस सम्पति और मकानों पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया था, वह उन्हें
वापस मिलेगा या नहीं ? है ना दोगलापन।
विचार : पूर्व डाइरेक्टर जनरल बार्डर सिक्योरिटी फोर्स और पूर्व डाइरेक्टर जनरल उत्तर प्रदेश और असम पुलिस
कश्मीर के अलगाववादी तत्व और आतंकवादी संगठनों ने यह अच्छी तरह देख लिया है कि भारत सरकार की सैन्य शक्ति कितनी भी हो, उसमें लडऩे का माद्दा नहीं है और उसको आसानी से दबाया और झुकाया जा सकता है। इसका हुर्रियत कांफ्रेस के नेता पूरी तरह लाभ उठा रहे हैं। भारत सरकार बार-बार उन्हें वार्ता के लिए आमंत्रित करती है, परंतु वह गैर जिम्मेदाराना बयान देकर बातचीत से मुकर जाते हैं। हां, अपने पाकिस्तानी आकाओं से बात करने के लिए वह जरूर सदैव उत्सुक रहते हैं। भारत सरकार भी उन्हें आसानी से वीजा दे देती हे। सरकार के विरुद्ध अलगाववादी तत्व जहर उगलते रहते हैं, परंतु न तो उनके भाषण कोई टेप करता है और न ही उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलता है। सीबीआई नरेंद्र मोदी के बयान जरूर टेप कर रही हंै। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को चित करना जरूरी है, देशद्रोहियों को खुली छूट दी जा सकती है।
- जो लोग, जम्मू-कश्मीर में देश की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं, उन्हें कम से कम पांच वर्ष के लिए निरुद्ध किया जाए और कश्मीर के बाहर किसी जेल में रखा जाए। जो युवा बहक गए हैं उन्हें प्यार से किसी री-एजुकेशन कैंप में रखा जाए और उन्हें गलती का एहसास कराया जाए।
- उत्तर-पूर्व में यूनाइटेड नागा काउंसिल और आल नागा स्टूडेंट्स ऑफ मणिपुर पुन: २० अगस्त से रास्ता जाम करने वाले है। राष्ट्रीय राजमार्ग ३९ और ५३, जो इंफाल को बाकी देश से जोड़ते हैं, दोनों पर आवागमन अवरुद्ध किया जाएगा। कुछ ही महीने पहले इन संगठनों ने मणिपुर का ६९ दिनों का ब्लॉकेड किया था। मणिपुर में त्राहि-त्राहि मच गई थी, लेकिन केंद्र सरकार मूकदर्शक बनी रही। मणिपुर के अधिकांश व्यक्ति वैष्णव धर्म के अनुयायी हैं इसलिए शायद उनके साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। मानवाधिकार संगठन आतंकवादियों की हिमायत तो तुरंत करते हैं, परंतु मणिपुर के अधिकार के लिए कोई आवाज उठाने वाला नहीं दिखता है।
क्या कश्मीर केवल देश का खून चूस रहा है
अब देखते हैं कि कैसे कश्मीरी मुसलमान हमारा खून चूस रहे हैं कश्मीर के बारे में आर्थिक आँकड़े टटोलने की कोशिश कीजिये आपकी आँखें फटी की फटी रह जाएंगी। आप क्या सोचते हैं कि कश्मीर में गरीबी की दर क्या हो सकती है बाकी भारत के मुकाबले कम या ज्यादा १० प्रतिशत या २० प्रतिशत। तमाम छातीकूट दावों के बावजूद हकीकत यह है कि कश्मीर में गरीबी की दर है सिर्फ ३-४ प्रतिशत जबकि भारत की गरीबी दर है अधिकत २६ प्रतिशत (बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों में) और ऐसा क्यों है क्योंकि उन्हें पर्यटन (जो कि ९०प्रतिशत भारतीय पर्यटक ही हैं) सूखे मेवों और पशमीना शालों के निर्यात से भारी कमाई होती है। ऊपर से तुर्रा यह कि कश्मीर को केन्द्र की तरफ से भारी मात्रा में पैसा मिलता है, मदद, सब्सिडी और सहायता के नाम पर सीएजीआर की रिपोर्ट के अनुसार १९९१ में कश्मीर को १,२४४ करोड़ रूपए का अनुदान दिया गया जो कि वर्ष २००२ तक आते-आते बढ़कर ४,५७८ करोड़ रूपए हो गया था (सन्दर्भ इंडिया टुडे १४ अक्टूबर २००२) १९९१ से २००२ के बीच केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर को दी गई मदद कुल जीडीपी का ५ प्रतिशत से भी अधिक बैठता है। इसका मतलब है कि कश्मीर को देश के बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा हिस्सा दिया जाता है, किसी भी अनुपात से ज्यादा। यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी परिवार के सबसे निकम्मे और उद्दंड लड़के को पिता का सबसे अधिक पैसा मिले मदद के नाम पर। क्या आपको बचपन में सुनी हुई कोयले और कौव्वे की कहानी याद नही आई? जिसमें कोयल अपने अंडे कौव्वे के घोंसले में रखे देती है और कौवा उसके अंडे तो सेता ही है, कोयल के बच्चे भी जोर-जोर से भूख-भूख चिल्लाकर कौव्वे के बच्चों से अधिक भोजन प्राप्त कर लेते हैं। ठीक यही कश्मीर में हो रहा है, वे हमारे पैसों पर पाले जा रहे और वे इसे अपना हक बताकर और ज्यादा हासिल करने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत के ईमादार करंदाताओं का पैसा इस तरह से नाली में बहाया जा रहा है। जब नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि गुजरात से कोई टैक्स न लो और न ही केन्द्र कोई मदद गुजरात को दे तो कंाग्रेस इसे तत्काल देशद्रोही बयान बताती है। अर्थात यदि देश का कोई पहला राज्य, जो हिम्मत करके कहता है कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ तो उसे तारीफ की बजाये उलाहने और आलोचना दी जाती है, जबकि गत बीस वर्षों से भी अधिक समय से जोंक की तरह देश का खून चूसने वाला कश्मीर बेचारा और धर्मनिरपेक्ष एक बार रेलयात्रा में गृह मंत्रालय के एक अधिकारी मिले थे, उन्होंने आपसी चर्चा में बताया कि कश्मीर में आतंकवाद कभी भी खत्म नहीं होगा, क्योंकि आतंकवाद के धंधे से जुड़े लगभग सभी पक्ष नहीं चाहते कि इसका खात्मा हो। और खुलासा चाहने पर उन्होंने बताया कि आतंकवाद से लडऩे के नाम पर कश्मीर में पुलिस, बीएसएफ, सीआरपीएफ और सेना को केन्द्र से प्रतिवर्ष ६०० से ८०० करोड़ रूपया सस्पेंस अकाउंट में दिया जाता है, जिसका कोई अॅाडिट नहीं किया जाता, न ही इस बारे में अधिकारियों से कोई सवाल किया जाता है कि वह पैसा कहाँ और कैसे खर्चा हुआ। इसी प्रकार का सस्पेंस अकाउंट प्रत्येक राज्य की पुलिस को मुखबिरों को पैसा देने के लिये दिया जाता है (अब वह पैसा मुखबिरों तक कितना पहँुचता है, भगवान जाने)। अब इसे दूसरी तरह से देखें, तो कश्मीर के प्रत्येक व्यक्ति पर कश्मीर के प्रत्येक व्यक्ति पर केन्द्र सरकार १०,००० रूपये की सब्सिडी देती है, जो कि अन्य राज्यों के मुकाबले लगभग ४० प्रतिशत ज्यादा है, और यह विशाल धनराशि राज्य को सीधे खर्च करने को दी जाती है ( कोई भी सामान्य व्यक्ति आसानी से गणित लगा सकता है कि कश्मीरी नेताओं, हुर्रियत अलगाववादियों, आतंकवादियों और अफसरों की जेब में कितना मोटा हिस्सा आता होगा, ट्रंासपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट में कश्मीर को सबसे भ्रष्ट राज्य का दर्जा इसीलिए मिला हुआ है। इसके अलावा अरबों रूपये की विभिन्न योजनाएं, जैसे रेलवे की जम्मू-उधमपुर योजना ६००, करोड़ उधमपुर श्रीनगर-बारामुला योजना ५००० करोड़, विभिन्न पहाड़ी सड़कों पर २००० करोड़, सलाई पावर प्रोजेक्ट ९०० करोड़, दुलहस्ती हाइड्रो प्रोजेक्ट ६००० करोड़, डल झील सफाई योजना १५० करोड़ यानी पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, लेकिन एक अंधे कुँए में। तो इस बात पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वहाँ की आम जनता की आर्थिक हालत तमाम आतंकवादी कार्रवाईयों के बावजूद, देश के बाकी राज्यों के गरीबों के मुकाबले काफी बेहतर है।
कुलदीप नैयर, वरिष्ठ पत्रकार
यह उपयुक्त होगा कि यह पता लगाया जाए कि वह कौन-सा समाधान था जिसके करीब बाजपेयी और
नवाज शरीफ पहुंचे थे। भारत और पाक, दोनों को ही कश्मीरियों को स्वायत्तता के लिए
राजी करना होगा, क्योंकि आजादी के पक्ष में नई दिल्ली और इस्लामाबाद, दोनों में से
कोई भी नहीं लगता।
महबूबा मुफ्ती, अध्यक्ष पीडीपी व पूर्व मुख्यमंत्री, कश्मीर
- पीएम की ओर से अब तक कश्मीर को लेकर सीधे कोई बात हमने सुनी नहीं है।
- उमर सरकार तो बनने के साथ ही नाकाम हो गई थी। लेकिन इसने बहुत चालाकी से अपनी नाकामी को राष्ट्रविरोधी ताकतों की साजिश का नाम दे कर छुपाया है। यह प्रचारित करने की कोशिश की है कि कश्मीर के लोग राष्ट्रविरोधी हैं। नतीजा यह है कि आज केंद्रीय सुरक्षा बल और यहां की जनता सीधे आमने-सामने है।
- केंद्र सरकार राज्य सरकार के लिए सेफ्टी वाल्व का काम कर रही है।
एस-के- सिन्हा, पूर्व राज्यपाल जम्मू कश्मीर
- मूल समस्या है मजहबी कट्टरता। जरूरत उसके स्रोतों यानी अलगाववादियों और ऐसी ताकतों पर प्रहार की है, लेकिन हम सिर्फ तुष्टीकरण की नीति पर चलते रहे।
- अशांति की तात्कालिक वजह हैं तुष्टीकरण की नीति। कश्मीरियों को ही नहीं, पाकिस्तानियों और अमेरिका सबको खुश रखने का रवैया। इस वजह से सीमा पार और अलगाववादी ताकतों ने मजहबी कट्टरता को बढ़ाया और पूरा माहौल विषाक्त कर दिया। सैय्यद अली शाह गिलानी का हाथ बिल्कुल सामने है, लेकिन उसे गिरफ्तार करने की बात ही नहीं हो रही।
- मानवाधिकार आयोग के सामने सेना की १५०० शिकायतें की गई। इसमें से १४०० को मानवाधिकार आयोग ने गलत पाया।
- गलत तत्वों को सलाखों के पीछे डालें।
- राज्य में ३५ प्रतिशत हिंदू, बौद्ध और सिख हैं। इसके अलावा २० फीसदी गुर्जर और बकरवाल है। इस ५५ फीसदी समूह का अलगाववादियों से कोई लेना-देना नहीं। ४५ फीसदी कश्मीरियों में ही कुछ तबका है जो अशांति फैलाता है।
जम्मू, लद्दाख की अनदेखी क्यों : तरूण विजय
प्रधानमंत्री ने स्पष्ट तौर पर कहा कि कश्मीर घाटी की वर्तमान दुरावस्था के लिए पाकिस्तान जिम्मेदार है जो वहां असंतोष भड़काकर कश्मीर मामले का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना चाहता है। चमनलाल गुप्ता ने ५ अगस्त की बैठक में मनमोहन सिंह से स्पष्ट कहा कि लद्दाख और जम्मू के प्रति केंद्र की अनदेखी कहीं वहां भी लोगों को हुर्रियत जैसे संगठन पैदा करने को मजबूर न कर दे, क्योंकि उन्हें लगता है कि जब तक उग्र तरीका न अपनाया जाए, केंद्र सुनेगा नहीं। श्रीनगर का तंत्र पूर्णत: साम्प्रदायिक विद्वेष के आधार पर काम करता है। वहां लद्दाख के बौद्ध इतने संत्रस्त हैं कि उन्होंने श्रीनगर से मुक्ति के लिए लद्दाख को पृथक 'केंद्र शासित प्रदेशÓ बनाने का आंदोलन छेड़ा और स्थानीय शासन में बहुमत हासिल किया।
- कश्मीर में हालात में सुधार के लिए कुछ कदम तुरंत उठाए जाने की आवश्यकता है।
सर्वप्रथम तो सुरक्षा बलों को अधिक अधिकार एवं स्वतंत्रता दी जाए। दूसरे, स्थानीय
अलगाववादी संगठनों को प्रतिबंधित कर उनके नेताओं को गिरफ्तार किया जाए। स्थानीय
युवाओं से साथ वार्ता कर विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में नियमित शैक्षिक कार्य
सुनिश्चित किया जाए। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख में केंद्रीय वित्तीय सहायता के
न्यायपूर्ण प्रबंधन के लिए केंद्रीय सरकार की देखरेख में त्रिपक्षीय प्रबंध-मंडल बने
जो हर क्षेत्र के प्रति किसी भी अन्याय की जांच करे एवं बजट का उचित आबंटन करे।
- हुर्रियत गुट चाहे गिलानी का गुट हो या उमर शेख का, दोनों ही पाकपरस्त अतिवादी
गुट हैं। इन दोनों को सरकार से न केवल सुरक्षा व्यवस्था मिलती है, बल्कि सरकार इनके
नेताओं की बीमारी का खर्च भी उठाती है। भारत के पैसे पर पलने वाले ये भारत विरोधी
सांप हमसे ही भारत को डसने की ताकत प्राप्त करते आए हैं।
- ये लोग मांग करते हैं कि कश्मीर मैं सेना की मिले विशेष अधिकार समाप्त कर देना चाहिए। इस प्रकार की मांग का स्वयं सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने सार्वजनिक रूप से विरोध् किया, लेकिन केंद्र सरकार तब भी चुप रही।
अब सिखों को धमकी
घाटी में बंद, हिंसक प्रदर्शन, कफ्र्यू और पुलिस की सख्ती के चलते होने वाली
घटनाएं पहले की तरह जारी हैं। भीड़ और पुलिस के बीच हिंसक झड़पों में ८० दिनों में
करीब साठ लोगों की मौत यह बताती है कि घाटी के हालात किस हद तक खराब हो चुके हैं।
अब वहाँ एक नया खतरा सिखों के लिए उभर आया है। कश्मीरी पंडित वहाँ से पहले ही खदेड़े
जा चुके हैं। लगता है कि अब अलगाववादी तत्वों ने सिखों पर निगाह टेढ़ी कर ली है।
घाटी के सिखों को जिस तरह धमकाया गया उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह
कैसी कश्मीरियत है जिसमें गैर मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं नजर आता ? केंद्र
सरकार की मानें तो घाटी के सिखों को धमकाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ हो सकता है।
यदि वास्तव में ऐसा है तो यह भारतीय कूटनीति की एक और पराजय के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
- हुर्रियत ने अमरनाथ ब्राइबोर्ड कोजमीन आवंटित करने के मुद्दे पर भी राष्ट्रद्रोही
सांपदायिक आग भड़काने का काम किया। एनएन वोहरा जम्मू कश्मीर के दतिहास के सबसे लचर
और कमजोर राज्यपाल साबित हुए। तीर्थयात्रियों को नि:शुल्क भोजन देने वाले लंगरों और
तीर्थयात्रियों की गाडिय़ों पर टैक्स का मामला राज्यपाल टाल सकते थे, पर वह हिंदुओं
को दुख देकर किसकी सहानुभूति अर्जित करना चाहते हैं? यह समझ नहीं आता।
- कश्मीर में बचे-खुचे साठ हजार सिखों को इस्लाम कबूल करने या घाटी छोडऩे की धमकी
उसी सिलसिले का एक पड़ाव है जिसके अंतर्गत पहले सात सौ से अधिक मंदिर तोड़े गए,
पाँच लाख हिंदुओं को निकाला गया, लद्दाख के बौद्धों को सताया गया और छितीसिंह पुरा
जैसे सिख नरसंहार किए गए।
- ये अलगाववादी समूह खुद भी परस्पर विरोधी गुटों में बंटे हुए हैं। जेकेएलएपफ पूरी
आजादी चाहता है, हुर्रियत में अली शाह गिलानी पाकिस्तान से मिलना चाहते हैं, पीडीपी
ज्यादा स्वायत्तता की बात करती है तो नेशनल कंाफ्रेंंस कंाग्रेस के साथ मिलकर सरकार
बनाते हुए भी १९५३ से पहले की स्थिति बहाल करना चाहती है।
- असलियत में कश्मीरी आजादी का तथाकथित आंदोलन हिंदू-विरोध की मानसिकता पर टिका है। वे पाकिस्तान के साथ इसलिए मिलना चाहते हैं, क्योंकि हर प्रकार से सामंतवादी, अलोकतंात्रिक शक्तियों से संचालित होने के बावजूद वह इस्लामी राज्य है और भारत दुनिया के सबसे प्रगतिशील, लोकतंात्रिाक तथा सर्वपंथ समभाव का आदर्श होने के बावजूद सिर्फ हिंदूबहुल होने के कारण उन्हें त्याज्य प्रतीत होता है। होना यह चाहिए था कि देश के एकमात्रा मुस्लिम बहुल राज्य होने के कारण जम्मू-कश्मीर एक भाईचारे और आत्मीय राष्ट्रीयता की मिसाल बनता है।










