
कुदरत के कहर ने भारत की छत पर ला दी आफत
लेह में हुई त्रासदी ने दुनिया भर को हिलाकर रख दिया। समुद्र तल से 11500 फुट की ऊंचाई पर स्थित और अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए दुनिया में मशहूर लेह पल भर में उजड़ गया। साथ ही लेह में बादल फटने की घटना ने वैज्ञानिक चर्चाओं को नए सिरे से उठा दिया है। शशांक कुमार की रिपोर्ट
2010 में लेह में सबसे बडी त्रासदी ने लेह के जन-जीवन को अस्त-वयस्त कर दिया। छह अगस्त को घटी इस भयावह त्रासदी ने हजारों की संख्या में लोगों को प्रभावित किया और 165 लोग काल के गाल में समा गए, जिसमें पांच विदेशी पर्यटक भी शामिल है। सरकारी आंकडों के मुताबिक कुदरत के इस कहर ने हजारों लोगों को बेघर कर दिया ओर 200 लोग अभी तक लापता है। लेह में रात के समय हुई मूसलाधार बारिश ने सभी को चौंका कर रख दिया। साढ़े बारह से एक बजे के बीज बिजली फटने की वजह से ऐसा कोहराम मचा कि अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए मशहूर लेह पल भर में उजड़ गया। कई इमारतों समेत अस्पताल तबाह हो गए। बस र्टिमनल, रेडियो स्टेशन ट्रांसमीटर, टेलीफोन एक्सचेंज और मोबाइल फोन टावर उखड़ गए। तबाही के मंजर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बस स्टेशन पूरी तरह तबाह हो गए और बसें एक मील दूर उड़ कर पहुंच गई। यहां तक कि शहर का एयरपोर्ट बर्बाद हो गया।
छोगलामसार गांव जो कि लेह के बाहर पड़ता है बुरी तरह बर्बाद हो गया। राहत कार्यों में सबसे बड़ी परेशानी पानी और दस फीट तक भरा हुआ कीचड़ था। इसके अतिरिक्त सड़क रास्तों में राहत कार्य पहुंचाने के लिए ट्रक तक का जाना दुश्वार हो रहा था। चार सौ गंभीर रूप से घायल लोगों को बचा लिया गया उनमें से कुछ को आर्मी अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस घटना पर शोक व्यक्त किया है। साथ ही पीडि़त परिवार के परिजनों को एक लाख रूपए की सहायता राशि देने की घोषणा की है। साथ ही घायल हुए लोगों को पचास हजार रूपए की राहत राशि देने का ऐलान किया है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री को सहायता राशि के तौर पर एक करोड रुपए का चेक दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसी त्रासदियों को बिहार अच्छी तरह समझ सकता है क्योंकि करीब हर वर्ष बिहार को ऐसी आपदाओं का सामना करना पड़ता है।

घटना मौतें
:- 1961, धारचूला, पिथौरागढ : 12
- 1968 तवाघाट, पिथौरागढ़ : 22
- 1973, बागेश्वर : 37
- 1985, रैतोली, पिथौरागढ़ : 16
- 1989, मदमहेश्वर घाटी : 109
- 2000, खेत गांव : 5
- 2002 बाल गंगा घाटी : 28
- 2009, ला-झेक्ला : 42
लेह
लेह
जम्मू-कश्मीर
का
सबसे बड़ा
कस्बा
है।
यह समुद्र
तल
से 11500
फुट
की
ऊंचाई पर
है।
श्रीनगर से 160
मील
पूर्व तथा
यारकंद
से 300
मील
दक्षिण में
स्थित
है।
यहां एशिया
की
सबसे ऊंची
मौसमी
वेधशाला
है।
यह पर
बौद्घ
धर्म
मानने
वाले
की
संख्या सबसे
अधिक
है।
साथ ही
ये
कस्बा अपने
प्राकृतिक
सौंदर्य के
लिए
दुनिया में
मशहूर
है।
लेह से
श्रीनगर
एवं
कुल्लू घाटी
होती
हुई
सड़कें भारत
के
आंतरिक भाग
में
आती है
तथा
एक मार्ग
कारकोरम
दर्रे
की
ओर जाता
है।
लेह में 19
एव 20
वीं
सदी के
डोगरा
वंशी
राजाओं
के
पूर्व के
राजाओं
का
राजप्रसाद भी है।
अगस्त
माह
में पश्चिमी
देशों
से
हजारों की
संख्या
में
पर्यटक यहां
आते
हैं। लेह
में
अस्सी हजार
विदेशी
और
एक लाख
देशी
सैलानी
सालाना
आते
हैं।
क्या
हुई
घटना
लेह
में जो
बादल
फटने
की
घटना हुई
है
उसने एक
बार
फिर इस
प्राकृ
तिक
आपदा लेकर
पहले
से
चल रही
वैज्ञानिक
चर्चाओं को
नए
सिरे से
गरमा
दिया
है।
एक तरफ
जहां
कुछ
वैज्ञानिकों ने इसे
ग्लोबल
वार्मिंग
का
असर माना
है,
वहीं कुछ
का
कहना है
कि
इस तरह
की
घटनाओं का
ग्लोबल
वार्मिंग
से
कोई लेनादेना
नहीं
है।
आइए जानते
हैं
क्या है
बादल
फटने
की
असली वजह
और
तथ्यपरक जानकारी
बादल
फटने
का
अर्थ
बादल
फटने
को
समझने के
लिए
पहले बादल
बरसने
को
समझना होगा।
बरसने
वाले
बादल
लगातार
संघनित
होते
हुए
बूंदों में
बदलते
रहते
हैं
और बारिश
होती
है।
कोई बादल
जितनी
तेजी
से
संघनित होता
है,
बारिश उतनी
ही
तेज होती
है।
अब अगर
कोर्ई
भारी
वर्षा
की
संभावनाओं से भरा
बादल (जिसे
मौसम
विज्ञान
की
भाषा में
प्रेग्नेंट
क्लाउड
कहते
हैं)
किसी
वजह
से एकाएक
पूरा
संघनित
हो
जाए तो
इसे
बादल का
फटना
कहते
हैं।
इसमें
बादल
का
सारा पानी
एक
साथ एक
ही
जगह बरस
जाता
है।
पानी गिरने
की
रफ्तार सौ
मिलीमीटर
प्रति
घंटा
से
भी ज्यादा
होती
है।
पानी इतनी
तेजी
से
आता है
कि
लगता है
आसमान
से
बाढ़ आ
गई।
हालांकि बादल
फटने
की
इस परिघटना
का
दायरा ज्यादातर
एक-डेढ़
वर्ग
किलोमीटर
से
ज्यादा नहीं
होता।
बादल
फटने
की
वजह
इसकी
पूरी
ठीक-ठीक
वजह
अभी वैज्ञानिकों
को नहीं
पता,
लेकिन
माना
यह
जाता है
कि
कोई बादल
जब
अचानक धरती
की
अपेक्षाकृत ज्यादा
गर्म
हवा
और ज्यादा
वायु
दबाव
के
संपर्क में
आता
है, तो
वह
फट जाता
है।
पहाड़ों
पर
ही नहीं
फटते
बादल
पहले
यही
धारणा थी
कि
बादल फटने
की
घटना हमारे
उपमहाद्वीप
में हिमालयी
और
उप-हिमालयी
क्षेत्रों
में
होती है,
और
इसका मुख्य
कारण
ठोस
चीज से
चलंत
बादलों
का
टकराना ही
होता
है,
लेकिन मुंबई
में 26
जुलाई 2005
को बादल
फटने
की
एक घटना
के
बाद यह
धारणा
अब
बदलने लगी
थी।
अब वैज्ञानिक
स्वीकार
करते
हैं
कि तेज
उड़ते
पनियाले
बादल
कुछ
खास स्थितियों
में भी
फट
सकते हैं,
खासकर
बहुत
गर्म
हवा
से टकराने
पर
भी। ये
स्थितियां
जहां बने
बादल
फट
सकते हैं।
कराची
में
भी 2009 में
बादल
फटा
था।
बादल
फटने
का
क्षेत्र और
उसके
असर
का दायरा
ऐसा
नहीं
है।
बादल फटने
से
गिरा पानी
भले
ही सीमित
क्षेत्र
पर
गिरता है,
लेकिन
आमतौर
पर
इसका असर
दूर
तक होता
है।
मसलन, किसी
पहाड़
पर
यदि बादल
फटता
है
तो गिरने
वाला
पानी
रास्ते
में
आने वाले
सभी
कंकड़, पत्थर,
मिट्टी,
घर
वगैरह को
अपने
साथ
तेजी से
बहाता
हुआ
नीचे घाटी
तक
ले जाएगा।
ऐसे
में
रास्ते में
जो
भी इमारतें
या
मानव बस्तियां
वगैरह
आती
हैं, उन्हें
भारी
नुकसान
पहुंचता
है।
क्या
पहाड़ों
पर
ही फटते
हैं
पहले
यही
धारणा थी
कि
बादल फटने
की
घटना हिमालयी
और
उप हिमालयी
क्षेत्रों
में
होती है।
लेकिन
मुंबई
में 2005
में
बादल फटने
की
घटना के
बाद
यह धारणा
बदल
गई। बादल
कुछ
खास स्थितियों
में फटता
है।
स्थितियां जहां
भी
बन जाएं
बादल
फट
सकता है।
बादल
फटने
से
गिरा पानी
भले
ही सीमित
क्षेत्र
पर
गिरता है,
लेकिन
आमतौर
पर
इसका असर
दूर
तक पड़ता
है।
मसलन किसी
पहाड़
पर
यदि बादल
फटता
है
तो उसका
सारी
पानी
रास्ते
के
सारे कंकड़,
पत्थर,
मिट्टी
वगैरह
को
अपने साथ
तेजी
से
बहाता हुआ
नीचे
घाटी
ते
ले जाएगा।
ऐसे
में
रास्ते में
जो
भी इमारतें
या
मानव बस्तियां
वगैरह
आती
हैं उन्हें
भारी
नुकसान
पहुंचता
है।
ये
हुआ नुकसान
लेह
में बादल
फटने
से
आई बाढ़
में
सामरिक दृष्टि
से
अत्यंत महत्वपूर्ण
निमु पुल
बह
गया था।
इस
वजह से
लेह
से सड़क
मार्ग
से
कारगिल में
तैनात
सैनिकों
तक
रसद और
सामग्री
भेजना
संभव
नहीं
था।
इस पुल
का
बह जाना
सेना
के
लिए काफी
बड़ा
झटका
माना
जा
रहा था।
यहां
हुए
एक महत्वपूर्ण
बैठक
में
निमु पुल
को
तुरंत बनाने
को
सर्वोगा प्राथमिकता
दी
गई। सेना
इंजीनियरों
की
दो रेजिमेंट
इस
काम के
लिए
तैनात की
गई।
निमु पुल
एक
तरफ निमु
को
लेह से
और
दूसरी तरफ
करगिल
से
जोड़ता है।
मौसम
खराब
होने
से
हवाई मार्ग
से
भी रसद
भेजना
मुश्किल
हो
गया था।
एन.एच.1डी
के
तीन हिस्से
बहे
इसके
अलावा
श्रीनगर-करगिल-लेह
को
जोडऩे वाले
राष्ट्रीय
राजमार्ग संख्या 1डी
के
तीन अत्यंत
महत्वपूर्ण
हिस्से बाढ़
में
पूरी तरह
बह
गए।
डीआरडीओ
प्रयोगशाला
तबाह
इस
बीच, रक्षा
अनुसंधान
व
विकास संगठन
की
एक प्रयोगशाला
डिफेंस
इंस्टीट्यूट
ऑफ
हाई अल्टीट्यूड
रिसर्च भी
बुरी
तरह
बर्बाद हो
गई।
यह प्रयोगशाला
लेह-लद्दाख
के
पर्यावरण और
इससे
जुड़े
विषयों
पर
शोध करती
है।
प्रयोगशाला के तमाम
आउट
स्टेशन भूस्खलन
और
बाढ़ में
बह
गए हैं।
मुख्य
प्रयोगशाला
काक भी
भारी
नुकसान
हुआ
है और
मलबा
भर
गया है।
लेह
की एक
कालोनी
का
नामोनिशान मिटा
लेह
की एक
पूरी
कालोनी
तबाह
हो
गई है
और
यहां करीब 100
लोगों
के दबे
होने
की
आशंका है।
रक्षा
मंत्रालय
के
प्रवक्ता ने
बताया
कि
हादसे मे
घायल 400
नागरिकों
को सेना
के
अस्थाई अस्पतालों
में भर्ती
किया
गया
है क्योंकि
लेह
के सिविल
अस्पताल
में
मलबा भर
गया
है।











