परमाणु क्षतिपूर्ति विधेयक

  • आधा रास्ता पार

आखिरकार नाभिकीय क्षतिपूर्ति नागरिक उत्तरदायित्व विधेयक को संसद में हरी झंडी दिखाने का इंतजाम सरकार ने कर ही लिया है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा की आपत्तियों के मुताबिक विधेयक में संशोधन पेश कर सरकार ने मत विभाजन के बावजूद लोकसभा से विधेयक को पारित करा लिया। अब राज्यसभा में पास कराना सरकार के लिए कोई मुश्किल काम नहीं लगता। वैसे प्रधानमंत्री ने इन आरोपों से इनकार किया है कि इस विधेयक को पारित कराने के लिए वो खुद भी काफी सक्रिय थे। दरअसल भाजपा इस मुद्दे पर इसलिए सरकार के साथ आई क्योंकि इस परमाणु समझौते की प्रक्रिया उनके कार्यकाल यानि 1999 में ही शुरू हुई थी।

वैसे यूपीए सरकार ने इस बात का खंडन किया है कि इस विधेयक के जरिए वह अमेरिका का हित साधने जा रही है। ये अच्छा हुआ कि सरकार ने बीजेपी का सुझाव मान लिया। उसने मूल विधेयक में दो सुधार कर लिये। हर्जाने की राशि को पांच सौ करोड़ से बढ़ाकर 1500 करोड़ कर दिया और हर्जाने के दावे की अवधि दस साल से बढ़ाकर 20 साल कर दी। सरकार ने बुद्धिमत्ता और लचीलेपन का परिचय दिया। बीजेपी ने विपक्ष की स्वस्थ भूमिका निभाई। लेकिन सरकारी अफसरों ने जरा अतिरिक्त चतुराई दिखा दी। उन्होंने विधेयक के अनुच्छेद 17बी में दो ऐसे संशोधन कर दिये, जिनके कारण सप्लायरों के दोषी होने के बावजूद एक बच निकलने का पूरा इंतजाम हो गया। एक जगह और शब्द जोड़ दिया गया और दूसरी जगह जान बूझकर जोड़ दिया गया। ये दोनों संशोधन उन्होंने अपनी तरफ से किये। ये दोनों शब्द विज्ञान और तकनीक की स्थायी संसदीय समिति के दस्तावेज में कहीं नहीं थे। इन दोनों शब्दों को जोडऩे का लक्ष्य एकदम स्पष्ट है। वह यह कि सप्लायर का अगर कोई दोष हो तो उस पर जिम्मेदारी न आये। उसकी जगह केवल आपरेटर यानि भारत सरकार हर्जाना भरे। किसी भी अदालत में ये कैसे सिद्ध किया जा सकता है परमाणु सप्लायर ने जो सयंत्र या पुर्जे दिये हैं, वो जानबूझकर खराब दिये हैं। ऐसा कोई क्यों करेगा? क्या भारत पाकिस्तान से परमाणु पुर्जे खरीद रहा है?

सरकार इन शब्दों को हटाने पर राजी हो गई है। ये अच्छी बात है लेकिन यदि एक भारतीय अखबार और बीजेपी के एक दो जागरूक सांसद उक्त चतुराई को पकडऩे में चूक जाते तो क्या होता? सप्लायरों को पूरी छूट मिल जाती। अब उन पर ये दबाव बना रहेगा कि भारत को भी चीज सप्लाई की जाये, वह बेहतरीन होनी चाहिए और उनके रखरखाव और संचालन पर भी उन्हें ध्यान देना होगा। तो ये माना जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे से पहले भारत सरकार उनके लिए तोहफे का इंतजाम पुख्ता करके रखना चाहती है। ये हर्जाना विधेयक इस मायने में बेहतर है कि भोपाल की मुआवजे के लिए लोगों को कोर्ट की शरण में नहीं जाना पड़ेगा। वह उन्हें तत्काल मिलेगा। डायलॉग इंडिया ब्यूरो ठ्ठ

वेदांता को झटका

एक अच्छा फैसला : उड़ीसा का नियमगिरी पहाड़ बस बरबाद होते होते रह गया। मनमोहन सिंह के पर्यावरण मंत्रालय ने वेदांता को पहाड़ से बॉक्साइट निकालने की अनुमति नहीं देना एक अच्छा फैसला ही कहा जायेगा। दरअसल जिस पहाड़ को खोदकर वेदांता अपना बॉक्साइट का खनन करने वाली थी, वो नियमगिरी पहाड़ कालाहांडी जिले में रहने वाले डोंगरिया कोंध आदिवासी समुदाय की श्रृद्धा और आस्था से जुड़ा हुआ है। इन आदिवासी समुदाय ने इसे बचाने के लिए शांतिपूर्ण युद्ध भी लड़ा है। दरअसल देश के बाहर मौजूद तीन वजहें केंद्र सरकार के इस फैसले की वजह बनीं। एक, कुछ ईसाई संगठनों ने वेदांता के बेरहम रवैये को पश्चिम देशों में मुद्दा बनाया, दो अमेरिका और यूरोप के फैशन सर्किलों में काफी चलने वाली एक पत्रिका ने नियमगिरी डोंगरिया कोंध समुदाय के रिश्तों पर एक स्टोरी छापी और तीन कुछ पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अपने निर्वस्त्र प्रदर्शन के जरिए इसे पिछले साल की चर्चित फिल्म अवतार मेंं दिखाये गये परग्रही नावी जाति के शोषण से जोड दिया। इन तीनों पहलों ने पश्चिम समाज में वेदांता की छवि एक क्रूर माइनिंग कंपनी की बना दी। भारत सरकार भी विदेशों में अपनी छवि खलनायक को सरंक्षण देने वाली सरकार के रूप में नहीं बनाना चाहती थी, लिहाजा एेन मौके पर पर्यावरण मंत्री ने इसे हरी झंडी दिखाने से मना कर दिया। बेशक ये अच्छा फैसला है लेकिन क्या देश में नियमगिरी की तरह न जाने कितनी खानों के जरिये पर्यावरण से खिलवाड़ नहीं किया जा रहा।