
प्राथमिक शिक्षा के नाम पर धोखा
उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षकों का हाल बेहाल है। लगता है कि इन स्कूलों को उनके हाल पर ही छोड़ दिया गया है। इसके लिए आवंटित करोड़ों रुपए की राशि कहां चली जाती है पता ही नहीं चलता। न इन स्कूलों में उचित व्यवस्था है और न ही यहां पढ़ाई होती है। इन्हें देखते हुए घोटालों की कलई खुद खुलने लगती है।
रानी दिव्यज्योति की रिपोर्ट
उ. प्र. जिसकी मुखिया मायावती मानव संसाधन मंत्री के सामने ताल ठोककर प्रदेश की बेसिक शिक्षा, सर्वशिक्षा अभियान तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम को अन्य राज्यों के वनिस्पत काफी सुचारू रूप से चलने की बात तो करती है लेकिन वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है क्योंकि जब स्कूल स्तर पर यदि निरीक्षण किया जाता है उससे यही प्रतीत होता है कि वास्तव में ये गरीबों के लिए स्कूल है।
प्रदेश में बेसिक शिक्षा विभाग और सर्वशिक्षा अभियान के तहत आवंटित करोड़ों की धनराशि का आधे से अधिक लाभ मंत्री अधिकारी ही अपने ऐशो आराम में लगा देते हैं जिससे प्राथमिक विद्यालय और उच्च प्राथमिक विद्यालय के बच्चे उस लाभ से वंचित हो जाते हैं जो उन्हें मिलना चाहिए। वैसे तो बच्चों को लाभ पहँुचाने के लिए केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये देती है लेकिन बच्चों तक पहुँचने से पहले ही इसका बंदरबांट हो जाता है। सिर्फ राजधानी लखनऊ की बात करें तो नये स्कूल जिसका निर्माण हुआ है उसमें बच्चों को बैठने की जगह नहीं छत टपक रहे हैं, छत से सीमेंट झरकर कब गिर जाए कोई ठिकाना नहीं, बार-बार फर्श धंस जाते हैं, यहां तक आधा अधूरा निर्माण कर छोड़ दिया गया है, न एक शिक्षक न ही कोई बच्चे उसके बावजूद स्कूल ऑन रिकार्ड विभाग में स्कूल संचालित बताया जाता है।
विद्यालयों में शौचालय निर्माण के लिए दो वर्ष पहले ही धनराशि शिक्षा निधि के खाते
में चली गई लेकिन शिक्षकों पर दबाव बनाकर डब्ल्यू.आर.सी द्वारा पैसे निकलवा लिए जाते
हैं और दो वर्ष बाद भी शौचालय निर्माण नहीं होता सिर्फ उस जगह पर ढांचा तैयार कर
छोड़ दिया गया और लोग पैसे खा पीकर बैठ गये। बच्चों की पढाई के लिए कमरे बेहतर न
होने के कारण अतिरिक्त कक्षा निर्माण में लाखों के पैसे आवंटित हुए लेकिन वो भी
वार्ड समन्वयक और अधिकारियों के जेब में चले गए। यानि हर एक लाभ जो बच्चों को मिलना
चाहिए वो उन्हें मिलता नहीं क्योंकि धनराशि आवंटित होते ही उसका बंटरबांट कर लिया
जाता है। आज उत्तर प्रदेश के सर्वशिक्षा अभियान की रैंक प्रति वर्ष केन्द्र स्तर पर
गिरती जा रही है। पहले जहां प्रदेश सर्वशिक्षा अभियान दूसरे स्थान पर था वहीं अब ९
वें स्थान पर है।
नगर क्षेत्र का सरोजनी नगर, पंडित खेड़ा पूर्व माध्यमिक विद्यालय के अध्यापक जो डब्ल्य०ू आर०सी० भी है और कई स्कूलों के निर्माण में भी इनका नाम आता है पंडित खेड़ा पूर्व माध्यमिक विद्यालय २००८-०९ में ही निर्माण हो जाना था लेकिन आज तक यह विद्यालय पूर्ण नहीं हुआ लेकिन जबसे नींव पड़ी थी उसी समय से विद्यालय को विभाग के रिकार्ड में संचालित दिखाया गया।
पूर्व में इन १२ विद्यालयों जिनके लिए धनराशि उच्च प्राथमिक विद्यालय के लिए ५ लाख ५० हजार से ऊपर तथा प्राथमिक विद्यालयों के लिए साढ़े ४ लाख से ऊपर आवंटन थी, नगर शिक्षा अधिकारी के मुताबिक यह सभी निर्माण ३१ मार्च २००९ तक पूर्ण भी हो गये लेकिन विद्यालय को जाकर देखा गया तो निर्माण कार्य पूर्ण रूप से अधूरे थे फर्श टूट टूट कर अलग हो चुके थे, दीवारों पर दरार पड़ चुकी है लेकिन ये सब ऑन रिकार्ड संचालित थे। इन्हीं विद्यालयों में चपखाखेड़ा, हंसखेड़ा, नरपत खेड़ा, पंडित खेड़ा जैसे और भी स्कूल है जिनके फर्श धंस गये थे दीवार सतह से हट गयी थी इस समय जितने भी निर्माण कराये गये सबकी यही दशा थी, अधिकांश की आज भी यही दशा है। खास बात तो यह कि निर्माण कार्यों में हो रही धोखाधड़ी मानक के विपरीत भवन निर्माण की जानकारी अधिकारियों को थी लेकिन निर्माण प्रभारी पर एक कार्रवाई तक नहीं की गयी । समाचार पत्र में जब यह खुलासा किया गया तब जाकर अधिकारी विद्यालयों की स्थिति से अवगत हुए। अलीनगर सुनहरा के पास स्थिति से अवगत हुए। अलीनगर सुनहरा के पास स्थित चपखाखेड़ा प्राथमिक विद्यालय का निर्माण जिसके लिए ४-५ लाख रूपये की धनराशि वित्तीय वर्ष २००८-०९ में ही आयी थी लेकिन पैसा खत्म हो जाने के कारण निर्माण अधूरा ही रह गया। स्कूल का न दरवाजा, न खिड़की है सिर्फ ईंट पर दीवारें खड़ी की गयी है लेकिन फिर भी इसे विभाग में संचालित दिखाया गया। शौचालय के लिए प्रति विद्यालय जहां २४ हजार रूपये शिक्षा निधि में भेजे गए उसके बावजूद बड़ी लड़कियां हो या फिर अन्य छोटे बच्चे दूर-दूर तालाब और खेतों में शौच के लिए जाते हैं उन्हें शौचालय का लाभ कभी मिला ही नहीं प्राथमिक विद्यालय आमौसी एक, दो, तीन तेलीबाग लोकमान्य गंज चारबाग, घोशियाना जैसे कई स्कूलों की यही हालत है पैसे तो शिक्षा निधि के खाते में आ ही जाते हैं लेकिन दूसरे लोग उड़ा ले जाते है।
अमौसी प्राथमिक विद्यालय एक, दो और तीन में शौचालय के लिए वित्तीय वर्ष २००८-०९ में
२४ हजार प्रति विद्यालय धनराशि आवंटित की गयी थी लेकिन डब्ल्यू आर सी द्वारा
शिक्षिका पर दबाव बनाकर पैसे निकाल लिए गए आरै आज तक बच्चों को शौचालय का लाभ नहीं
मिल पाया उस समय से सिर्फ अब तक ढांचा ही तैयार है। इसी अमौसी के दो, तीन विद्यालय
के अतिरिक्त कक्षा-कक्ष और और बाउंड्री वॉल के लिए लगभग ४ लाख धनराशि आवंटित हुई थी
लेकिन उसका भी निर्माण अब तक नहीं हुआ क्योंकि शिक्षक से डब्ल्यू०आर०सी ने पहले ही
पैसे निकलवा लिए थे।
विद्युत व्यवस्था की जहां तक बात है जिन स्कूलों में वर्ष २००८-०९ में ही हो जानी
थी इसके लिए प्रति विद्यालय २५ हजार १८८ रूपये सिर्फ वायरिेंग और २ हजार कनेक्शन के
लिए आये थे। वायरिेंग तो हो गयी, पंखे ट्यूब बिजली बोर्ड तो लग गए लेकिन सारे मानक
विहीन। खतरनाक वायरिेंग की गयी और आई०एस०आई० मार्का का भी ख्याल नहीं रखा गया। इसके
अलावा २ हजार जो कनेक्शन के लिए आवंटित हुई र्थी वह २००८-०९ में ही विद्युत विभाग
को दे दी गयी लेकिन आज तक कनेक्शन नहीं मिल पाया जिसका नतीजा यह है कि बच्चों को
अपना बस्ता लेकर कमरे से बाहर बैठकर पढऩा होता है। यह पैसा राजधानी में करीब ७००
स्कूलों के लिए आवंटित हुआ था।

चांदन का प्राथमिक विद्यालय की छत कभी भी गिर सकती है, पूर्व माध्यमिक चांदन जैसे ही कई विद्यालय हैं जहां बच्चे खुद को सुरक्षित रखने के लिए टूटे फर्श की मरम्मत करते हैं लेकिन अधिकारी इससे अवगत नहीं होना चाहते हैं।
स्कूलों में हैण्डपम्प वर्षों से लगे हैं, नए भी लगाए गए है लेकिन नए हो या पुराने
किसी में पानी सालों से नहीं आ रहा, जिस कारण अधिकांश स्कूलों के बच्चे पानी पीने
बाहर जाते हैं। मडिय़ाव गांव का प्राथमिक व जूनियर विद्यालय भदरूख-१ का विद्यालय,
उतरटिया-१, प्राथमिक विद्यालय, प्राथमिक विद्यालय तेलीबाग, घोसियाना प्राथमिक
विद्यालय जैसे अन्य कई स्कूल है जिसका खुलासा किया जाए तो राजधानी में सर्वशिक्षा
अभियान की हालात पर रोना आ जाए। पूरे नगर क्षेत्र में इतने गुपचुप तरीके से सारे
निर्माण कार्य किए गए कि बेसिक शिक्षा विभाग के एक भी नियम की परवाह नहीं की गयी।
हालांकि विभाग का इन निर्मार्णों केे बारे में कहना है कि शिक्षा निधि के खाते में
वह सारा धन भेजा गया है परन्तु इनकी कथनी और करनी में फर्क साफ नजर आता है क्योंकि
जब स्कूलों में इस विषय में बात की गई तब न ही शौचालय और न ही भवन निर्माण के पैसे
शिक्षा निधि के खाते में आए हैं स्कूल के इस बयान से बेसिक शिक्षा विभाग के लिए एक
सवाल यह पैदा होता है कि आखिर निर्माण कार्यों के लिए यह पैसे किसके खाते में भेजे
गए जबकि प्राचार्या मौजूद हैं।
इतना ही नहीं नए निर्माण हुए स्कूलों के लिए यह बात क्यों सामने आ रही है कि स्कूल
का निर्माण एकल अध्यापक के द्वारा कराया गया है। क्या एकल अध्यापक को इतने स्कूल
बनाने के अधिकार हैं। प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालय भदरूख से प्राप्त जानकारी
के मुताबिक यह स्कूल पहले काफी अच्छा था इसमें सिर्फ प्राथमिक की कक्षाएं चलती थीं
लेकिन २००३ के आसपास इसमें नए निर्माण हुए और उसमें प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक दोनों
भवनों का निर्माण करा दिया गया। विभाग अपने जवाब में यह कह रहा है कि निर्माण के के
लिए धन शिक्षा निधि में दिया गया है लेकिन प्राचार्या के अनुसार शिक्षा निधि के खाते
में न तो निर्माण कार्य के पैसे आए और न ही शौचालय का निर्माण के लिए यहाँ तक की
रंगाई पुताई के लिए भी इस बार पैसे नहीं आए।
इस विद्यालय के मामले में यह बात संज्ञान में आई है कि पैसा शिक्षा निधि में न आकर
किसी और के खाते में आया है और यह डब्ल्यू.आर.सी द्वारा बनाई गई है। इस विद्यालय के
मामले में सबसे अहम बात जो सामने आयी है उसमें यह कि विद्यालय का भवन निर्माण पुराने
विद्यालय को तोड़ उसी पर बनाया गया है यानी पुरानी दीवारों पर ही नई दीवारें खड़ी
की गई हैं। जहां तक शौचालय की बात है शौचालय भी काफी पुराने है जो जाने लायक नहीं
हैं। शिक्षकों को बच्चों के घर के शौचालय में जाना पड़ता है। बिजली तो इस विद्यालय
में क्या अधिकांश क्षेत्र में नहीं है लेकिन जब शिक्षिकाएं डब्ल्यू.आर.सी से इस पर
सवाल करती है तो कुछ भी नहीं बताया जाता।
इसी प्रकार उतरटिया'-१ प्राथमिक विद्यालय रायबरेली रोड की भी कहानी है यहां भी स्कूल की पुरानी बिल्डिंग तोड़कर उस पर नई खड़ी कर दी गयी जिसमें पुराने ईंटों का प्रयोग किया गया है इस विद्यालय का निर्माण भी एकल अध्यापिका के नाम पर किया गया है। यहां बहुत बड़ी जगह पर विद्यालय में आठ कमरे बने हैं। जिसमें एक कमरे की लागत एक लाख ४० हजार है। लेकिन यह भी शिक्षा निधि के खाते में नहीं आया। इस विद्यालय में कुछ लोगों की मिलीभगत से निर्माण कार्य हुए हैं, यहां भी विभाग के लिए एक सवाल खड़ा हो रहा है कि यदि पुरानी बिल्डिंग पर नयी बिल्डिंग बनवाई गयी तो उसके मलवे और ईंट कहां गये। प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां कुछ मलवे के सामान तथा पेड़ भी बेचे गये हैं लेकिन उन्हीं कुछ गुटों द्वारा जो विभाग में भी बैठे हैं।
बेसिक शिक्षा मंत्री खुद जाँच के घेरे में
बेसिक शिक्षा मंत्री धर्मसिंह सैनी जिनके खिलाफ लोकायुक्त के अनुसार कार्रवाई होनी
चाहिए। राज्यपाल को भेजे विशेष प्रतिवेदन में भी इनका नाम शामिल है और इन पर आरोप
यह सिद्ध हुआ है कि इन्होंने प्रदेश के ७० जनपदों में से ४० जनपदों में बेसिक शिक्षा
अधिकारी के पदों पर वरिष्ठ प्रवक्ताओं की अवैध नियुक्ति की है। करीब दो साल से चल
रहे इस मामले पर अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके साथ ही पूर्व बेसिक शिक्षा सचिव
आर.पी. सिंह भी खुले तौर पर आरोपित है लेकिन अब तक मामला शासन स्तर पर लम्बित है
जबकि उच्च न्यायालय के निर्णय २६ जुलाई २००७ के मुताबिक डायट के वरिष्ठ प्रवक्ता
उत्तर प्रदेश शैक्षिक (सामान्य शिक्षा संवर्ग) सेवानियमावली १९२ में वर्णित सेवा
संवर्ग के सदस्य नहीं है इतना ही नहीं यदि वरिष्ठ प्रवक्ताओं की योग्यता को देखें
तो इस पद पर नियुक्ति पाने वाले व्यक्तियों की योग्यता व आयु उत्तर प्रदेश शैक्षिक
सेवा नियमावली १९९२ में वर्णित जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से बिल्कुल भिन्न है। यह
सब जानते हुए भी सचिव व मंत्री ने यह नियुक्तियां की और जब लोकायुक्त के प्रयासों
से इनके इस कारनामे की पोल खुल चुकी है। सरकार इस अब तक लम्बित रखते हुए हैं और
बेसिक शिक्षा मंत्री जी धर्म सिंह सैनी भी मस्त हैं।

लखनऊ में सरकारी स्कूलों की दुर्दशा:
कुछ चुनिंदा लोगों के शिकार हैं जिले के सरकारी स्कूल कहा जाता है कि शिक्षा निधि के खाते में भेजी गई है धनराशि, लेकिन खाते के हकदार को इसका पता ही नहीं चला विद्यालय के नऐ भवन ऐसे उजडे हैं मानो वर्षों पुराने हों कई ऐसे स्कूल हैं जिसकी जमीन पर अवैध कब्जे कर लिए गए हैं लेकिन अधिकारियों का उस पर ध्यान नहीं जाता छत नहीं, फर्श नहीं फिर भी रिकार्ड में संचालित हैं विद्यालय स्कूलों में न बिजली न शौचालय न बाउन्ड्रीवाल जबकि सबके लिए आवंटित की गई थी धनराशि कुछ चुनिंदा शख्स खा जाते हैं
उत्तर प्रदेश के बजट चौंकाने वाले हैं लेकिन इसके अन्तर्गत आवंटित धनराशि का आधे से अधिक पैसा अधिकारियों के ऐश-ओ-आराम और बंदरबांट में हो जाता हैं खर्च और बच्चे उसी गरीबी की मार झेलते रह जाते हैं।
- वर्ष २००७-०८ में ८६१३ करोड़ आवंटित
- वर्ष २००८-०९ में ९७०० करोड़ आवंटित
- वर्ष २००९-१० में १२४१२ करोड़ आवंटित
- २०१०-११ के लिए १५१७५ करोड़ आवंटित
१- पूरे प्रदेश के लगभग ७५,००० बच्चों को नेत्र चिकित्सा के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष २००९ में करोड़ों की धनराशि प्रदान की गई लेकिन आज तक बच्चों को नहीं मिला उनका चश्मा
२- वर्ष २००९ में ही राजधानी में २४,००० प्रति विद्यालय शौचालय निर्माण के लिए आए पैसे लेकिन आज भी बच्चों को शौचालय नसीब नहीं
३- २००६-०७ में फर्नीचर में चौकी के लिए जूनियर के प्रति पुराने विद्यालयों के लिए १ लाख २७ हजार रूपए तथा प्राथमिक में ९५० हजार प्रति विद्यालय आवंटित हुए हैं लेकिन बच्चे इस लाभ से वंचित रह गए
४- विद्युतीकरण जो स्कूलों में वर्ष २००८-०९ में हो जाने थे वायरिंग तो २५ हजार १८८ रूपए की हो गयी लेकिन कनेक्शन आज तक नहीं हैं
5- २००९ में ५ करोड़ रुपए पूरे प्रदेश के स्कूलों का लघु मरम्मत और विशेष मरम्मत के लिए आया था लेकिन आज भी विद्यालय की छत से पानी टपकता है दीवार टूट रही हैं सीलिंग से प्लास्टर झड़ रहा है, फर्श टूटे पड़े हैं
6- २५ हजार प्रति विद्यालय हैण्डपम्प के लिए आवंटित हुए लेकिन अधिकांश स्कूलों का हैण्डपम्प सूखा ही मिलता हैं। पानी के लिए तरसते हैं बच्चे
7- अतिरिक्त कक्षाओं के लिए २ लाख रूपये आवंटित हुए लेकिन विभाग के लोग इसे दबा गये
कृपया अवैध शराब न पीयें यह जानलेवा हो सकती है।
जनहित में जारी - आबकारी विभाग, कटनी, जिला कटनी











