ऋतु सन्धि एवं उसकी उपयोगिता

स्वास्थ्य-रक्षा के निर्मित आयुर्वेद में ऋतु के अनुसार आहार-विहार का निर्देष किया गया है। वर्ष में 6 ऋतुयें होती हैं। पहली ऋतु का अन्तिम सप्ताह और आने वाली ऋतु का प्रथम सप्ताह, इन दो सप्ताहों की अवधि को ऋतु-संधि कहते हैं। ऋतु-संधि काल में पूर्व ऋतु में अपनाएं गये आहार-विहार को क्रमश: छोडऩा चाहिए तथा आने वाली ऋतु के अनुसार आहार-विहार को क्रमश: अपनाना चाहिए जिससे ऋतु के बदलाव से होने वाले रोग उत्पन्न नहीं होते है।

प्रकृति परीक्षा: व्यक्तिगत शारीरिक संगठन एवं स्वभाव को प्रकृति कहते हैं। गर्भ निर्माण के समय दोषों (वात पित्त कफ) की सम या प्रबलता की जो स्थिति होती है, तदनुसार ही प्रकृतियों का निर्माण होता है, वही प्रकृति व्यक्ति के जीवन पर्यन्त बनी रहती है।

प्रकृति परिक्षण की आवश्यकता
1- सामान्य अवस्था में आहार-विहार के आयोजन हेतु
2- चिकित्सा में औषध एवं पथ्य योजना हेतु

सात प्रकार की प्रकृतियाँ

  • एकदोषज - 1 वात 2 पित्त 3 कफ
  • द्विदोषज - 4 वातपित्त 5 वातकफ 6 पित्तकफ
  • त्रिदोषज - 7 समधातु (समदोष)

वातज प्रकृति आहार:

  • आहार द्रव्य सेवन योग्य सेवन के अयोग्य
  • फल मीठे फल, केला, नारियल अधिक मात्रा में फल, सेब, खजूर, ताजे अंजीर, आम नासपाती, अनार, तरबूज
  • अगूर, खरबूजा, संतरा
  • पपीता, अनानास, भिगोए मुनक्का
  • सब्जियां पकाई हुई सब्जियां, मेथी, अंकुरित सूखी सब्जियां,फूल, गोभी, बीज, गाजर, खीरा, कद्दू, मूली, लहसुन कच्चा प्याज, मटर, मिर्च, टमाटर
  • धान्य पके धान्य, सभी चावल, गेहूं कच्चे धान्य, जौ, मक्का, बाजरा
  • दालें मूंग उड़द, मसूर, सोयाबीन, राजमा
  • मसाले प्राय : सभी मसाले, सौंफ लाल मिर्च
  • हींग, अजवायन, इलायची
  • तलसी, काली मिर्च, अदरक
  • पोदीना, पके प्याज, नींबू
  • दुग्ध पदार्थ प्राय: सभी दूध, घी, मक्खन दूध पाउडर
  • छाछ,पनीर, आइसक्रीम, दही
  • पेय प्राय: सभी फलों का ताजा रस प्राय: सभी कार्बेनिटेड पेय
  • नाशपाती का रस, अनार का रस, तेज चाय, कॉफी

साभार : भारतीय धरोहर