
Posted Fri, 07/30/2010 - 15:41 by admin
शिखर की ओर सायना
पिछले एक महीने में तीन बडी सफलताओं के बाद सायना नेहवाल नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी स्पोट्र्स आइकन है। कंपनियां उनसे करार करने का आतुर है। जहां पहले वह एक एड के लिए 8 से 10 लाख रुपये लेती थीं वहीं अब इसकी कीमत 30 लाख रूपए तक पहुंच चुकी है। इससे भी सायना के बढ़ते कद का अंदाजा हो जाता है।
द्यरत्ना श्रीवास्तव:
हैदराबाद ने हाल के बरसों में भारतीय खेलों को दो करामाती लड़कियां दी हैं। सानिया मिर्जा और सानिया नेहवाल। दोनों का आगाज करीब करीब साथ ही साथ हुआ। दोनों अपने दमखम की बदौलत स्टारडम की सीढियों पर चढ़ीं। एक ही फर्क रहा-एक स्टारडम की रंगीनियों में ऐसी खोई कि खेल को ही भूल गई। दूसरी के लिए खेल ही सबकुछ है। वह अपना सबकुछ बैडमिंटन में झोंक देने में विश्वास रखती है। उसने एक एक कदम मजबूती से बढ़ाया है। आज वह दुनिया की नंबर दो खिलाड़ी है। यानि वो शिखर, जिसे छूना आजतक किसी भी भारतीय महिला खिलाड़ी के लिए एक सपना ही रहा है।

समय अब सायना के लिए सुखद तरीके से बदल रहा है। इस साल
मई से जून के बीच जब उन्होंने लगातार तीन बड़ी प्रतियोगिताएं-इंडियन ओपन ग्रांपी,
सिंगापुर ओपन और इंडोनेशिया सुपर सीरीज जीतीं, तो यकायक उन्होंने तेज छलांग लगाते
हुए वल्र्ड रैंकिंग में दूसरे नंबर की पोजिशन पर कब्जा कर लिया। इसने उन्हें भी
चकित कर दिया। एकबारगी उन्हें ये सपने जैसा ही लगा, क्योंकि उन्होंने मान रखा था कि
साल के आखिर तक वो टॉप फाइव में जगह बना लेंगी। अब उन्हें नंबर वन की पोजिशन साफ
साफ करीब नजर आ रही है, हालांकि चीन की यिहान वांग (७४३०८ अंक) फिलहाल सायना (६४७९१
अंक) से खासी आगे हैं, लेकिन अगस्त में पेरिस में होने वाली वल्र्ड चैंपियनशिप में
अगर विजेता बनती हैं तो यकीनन या तो नंबर वन की गद्दी के बहुत करीब पहुंच जायेंगी
या फिर नंबर वन ही बन जाएंगी।
हाल की सफलताओं ने सायना को देश में क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के बाद देश
का दूसरा बड़ा स्पोट्र्स मार्केटिंग ब्रांड बना दिया है। दो महिने पहले तक अगर वो
एक एंडोर्समेंट के लिए छह लाख से दस लाख लेती थीं तो अब उनकी कीमत २० लाख से ३० लाख
के बीच पहुंच चुकी है, १२ से ज्यादा बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां उन्हें साथ लेने के
लिए कतार में हैं। उन्हें कोकाकोला के साथ करार करने और कोला गर्ल कहलाने से कोई
परहेज नहीं, हालांकि एक दशक पहले उनके गुरु गोपीचंद ने इस एड के लिए ये कहकर मना कर
दिया था आखिर पब्लिक के प्रति उनकी भी कोई नैतिक जिम्मेदारी बनती है। लेकिन सायना
किसी आदर्शवाद में नहीं पडऩा चाहतीं, वो कहती हैं -बेशक गोपी सर ने सही किया होगा
लेकिन उनका मानना है कि लोग ज्यादा समझदार हैं, लिहाजा ये जरूरी नहीं कि अगर वो कोला
का एड करेंगी तो लोग इसे पीयेंगे ही।
हाल में सायना का परिवार हैदराबाद के मेंहदीपट्टनम के पुराने घर से शहर के पाश इलाके
साइबराबाद में बने भव्य बंगले में शिफ्ट हुआ है। बैडमिंटन से सायना के परिवार का
पुराना रिश्ता है। उनके माता -पिता दोनों ही हरियाणा के राज्य स्तरीय खिलाड़ी रह
चुके हैं। आठ साल की उम्र में ही सायना में बैडमिंटन खिलाड़ी की संभावनाएं नजर आने
लगी थीं। लेकिन सायना को खिलाड़ी बनाने के लिए उनके कृषि वैज्ञानिक पिता और परिवार
को काफी समझौते करने पड़े। पिता को रोज न केवल उन्हें २५ किलोमीटर दूर एकेडमी में
छोडऩे जाते थे बल्कि शुरू में महंगे रैकेट-शटल-जूते, देशभर में घूमकर टूर्नामेंट
खिलाने का खर्च को वहन करना आसान नहीं था। लेकिन परिवार ने हाथ खींचकर अपने तमाम
खर्चों से इसलिए समझौता किया कि उन्हें अहसास था कि एक दिन सायना जरूर कुछ करके
दिखाएगी।
सायना की सबसे बड़ी खासियत है उनकी कड़ी मेहनत और
गलतियों से सीखना। लेकिन सबसे अच्छी बात ये हुई कि उन्हें गोपीचंद जैसा जबरदस्त कोच
मिला, जिसने उनकी प्रतिभा और आत्मविश्वास को जमकर निखारा। क्या आप यकीन करेंगे कि
२००६ में सायना की वल्र्ड रैंकिंग १८६ थी। तब वह १६ साल की थीं, लेकिन उन्होंने चोटी
की कई खिलाडिय़ों को हराकर फिलीपींस ओपन जीता था।
शुरुआती दौर में विदेश जाकर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना भी कम आसान नहीं था,
क्योंकि इसमें बेहिसाब खर्चे थे, स्पांसर मिलते नहीं थे, अगर मिलते भी थे तो ज्यादा
मोटी रकम देने को राजी नहीं थे। लेकिन धीरे धीरे सभी का विश्वास उनपर जमता गया।
एक समय वो भी था जब महंगे रैकेट, जूतों, ट्रेनिंग और टूर्नामेंटों में शिरकत कराने
के लिए पिता को अपना प्रोविडेंट फंड भी निकालना पड़ा। उस दौरान सायना पर हर महिने
तकरीबन दस से बारह हजार रुपये का खर्चा होता था, एक सामान्य पृष्ठभूमि वाले अभिभावकों
के लिए ये बिल्कुल आसान नहीं था लेकिन तब भी उन्होंने इसे चुनौती की तरह कबूल किया।
वर्ष २००२ में उन्हें योनेक्स के रूप में पहला स्पांसर मिला। फिर २००५ में जब
उद्योगपति लक्ष्मी निवास मित्तल ने देश के प्रतिभावान खिलाडिय़ों के लिए एक ट्रस्ट
बनाया तो सायना जैसी खिलाडिय़ों के लिए ये वरदान साबित हुआ। सायना के देश-विदेश में
खेलने का खर्च काफी हद तक अब ये ट्रस्ट वहन करता है।
सायना अपने शहर की दूसरी प्रसिद्ध खिलाड़ी सानिया मिर्जा से इस बात में अलग जरूर
हैं कि उन्हें मालूम है कि अगर उनका खेल है तो सब कुछ है, खेल नहीं तो कुछ भी नहीं,
लिहाजा वो एंडोर्समेंट तो कर रही हैं लेकिन सावधानी के साथ। वो साफ कहती हैं कि खेल
की कीमत पर वह कुछ नहीं करने वाली।
कड़ा अनुशासन
सायना अपने जीवन को कड़े अनुशासन में बांधा हुआ है। सुबह छह बजे उठती है। ०७.३० बजे
तक प्रैक्टिस कोर्ट पर पहुंच जाती है। सुबह जहां पूरे जोरशोर से बैडमिंटन की
प्रैक्टिस करती है, वहीं शाम का सेशन जिम, रनिंग के नाम होता है। अगर वो हैदराबाद
में अपने घर में होती हैं तो शाम को एक घंटे कोच के साथ रियाज कर अपनी खेल को और
दमदार करने की कोशिश करती हैं। हफ्ते में एक दिन रिलैक्स करती हैं और उस दिन घर में
फिल्में देखती हैं, बाहर घूमती घामती हैं और परिवार के साथ खाना पसंद करती हैं।
चार दिग्गज ये भी
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प्रकाश पादुकोण १९८० में आल इंग्लैंड चैंपियन बने - पहली बार जब प्रकाश ने इंग्लैंड में ये प्रतियोगिता जीती, तो देश के लिए ये गौरव का क्षण था। आल इंग्लैंड चैंपियनशिप को गैर आधिकारिक वल्र्ड चैंपियनशिप का दर्जा हासिल है। तब प्रकाश ने ये साबित किया कि अगर भारतीय खिलाड़ी चाहें तो वो इस खेल की चोटी पर पहुंच सकते हैं।
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वर्ष २००१ में पुलेला गोपीचांद बने आल इंग्लैंड विजेता-प्रकाश पादुकोण की जीत के बाद आल इंग्लैंड खिताब भारतीय खिलाडिय़ों के लिए फिर एक सपना बनकर रह गया था। जिसे इक्कीस साल बाद साकार किया गोपीचांद ने। तब तक खेल बदल चुका था और बैडमिंटन में पॉवर खेल के साथ-साथ चाइनीज खिलाडिय़ों की तूती बोलने लगी थी।
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नंदू नाटेकर, सेलंगोर इंटरनेशनल, १९५६ -नाटेकर पहले भारतीय थे, जिन्होंने विदेश में पहचान बनाई। उनके पास स्ट्रोकों की भरमार थी और खेल में अलग ही बात, जो उनको ऊंचाई तक ले गई।
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दिनेश खन्ना, एशियन बैडमिंटन चैंपियनशिप, १९६५-साठ के दशक में दिनेश खन्ना बैडमिंटन जगत में ..द वाल.. के नाम से मशहूर थे। उनके पास हर तरह के स्ट्रोक्स की तोड़ रिवर्स शाट्स के रूप में मौजूद थी। उनके बाद अब तक कोई भी भारतीय एशियाई खिताब नहीं जीत सका है ठ्ठ
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