
सुपरबग का भूत
लांसेट इन्फेक्शस डिजीज जर्नल ने एक ऐसे बैक्टीरिया का दावा किया है जिसके लिए भारत और पाकिस्तान जिम्मेदार हैं। ये एक ऐसा बैक्टीरिया है जो भारत और पाकिस्तान में जन्मा और अब दुनियाभर के मरीजों में फैल रहा है। साफ है, इस रिसर्च के हवाले से विकसित देशों को दबी जुबान में इलाज के लिए भारत नहीं जाने की हिदायत दी जा रही है। और यहीं से आती है साजिश की बू।
- डा. सारिका अग्रवाल की रिपोर्ट

नाम- नई दिल्ली मेटालो-१। जाति- बैक्टीरिया। उम्र- एक साल से कम और जन्म स्थान- भारत-पाकिस्तान। ये ब्रिटेन के मेडिकल एक्सपर्ट की एक बैक्टीरिया को दी गई पहचान है। इस बैक्टीरिया के नाम से ही भेदभाव की बू आती है। क्या आपने अब तक कभी वाशिंगटन बैक्टीरिया या लंदन बैक्टीरिया का नाम सुना है? लेकिन ब्रिटेन वालों ने एक बैक्टीरिया को भारत की राजधानी के नाम से जोड़ दिया है--नई दिल्ली मटेलो -१। ये खलबली शुरू हुई मेडिकल साइंस की गीता माने जाने वाले लांसेट से। लांसेट इन्फेक्शस डिजीज जर्नल के ऑनलाइन एडिशन में एक ऐसे बैक्टीरिया का दावा किया गया है जिसके लिए भारत और पाकिस्तान जिम्मेदार हैं। ये एक ऐसा बैक्टीरिया है जो भारत और पाकिस्तान में जन्मा और अब दुनियाभर के मरीजों में फैल रहा है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों की मानें तो इस बैक्टीरिया की वजह से मरीज के शरीर में एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोध पैदा हो जाता है। ऐसे में किसी भी बैक्टीरिया का हमला होने पर इलाज नामुमकिन हो जाता है---मतलब है मरीज की मौत तय।
लांसेट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत और पाकिस्तान से सर्जरी कराकर यूके लौटे ३७ लोगों में सुपरबग का पता चला है। यूके के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, नीदरलैंड, यूएस और स्वीडन में भी रेजिस्टेंस जीन मिला है। रिसर्च से जुड़े लोगों का दावा है कि यूके और यूएस के बहुत सारे लोग कॉस्मेटिक सर्जरी आदि के लिए भारत और पाकिस्तान आ रहे हैं। ऐसे में उनके जरिए पूरी दुनिया में सुपरबग फैल सकता है।
साफ है, इस रिसर्च के हवाले से विकसित देशों को दबी जुबान में इलाज के लिए भारत नहीं जाने की हिदायत दी जा रही है। और यहीं से आती है साजिश की बू। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने तो इस रिपोर्ट को भारत के बढ़ते मेडिकल टूरिज्म के लिए खतरा बताया है।
भारत में सर्जरी का खर्च अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों की तुलना में दसवां हिस्सा है। एसोचौम की रिपोर्ट के मुताबिक २०१५ तक मेडिकल टूरिज्म के कारोबार को ९५०० करोड़ को छू लेने का अनुमान है।
दरअसल भारत में मेडिकल टूरिज्म बेहद कम समय में बहुत तेजी पकड़ चुका है। और इसके
पीछे बड़ी वजह है पश्चिमी देशों में महंगा इलाज। विकसित देशों में इलाज बहुत ज्यादा
महंगा है और छोटा-मोटा ऑपरेशन भी कम बजट में मुमकिन नहीं। ऐसे में दुनियाभर के लोगों
को बेहतर इलाज के लिए भारत का सस्ता बाजार लुभाता है। इससे विकसित देशों के चिकित्सा
बाजार को बड़ा झटका लगा है। नई दिल्ली नाम से बैक्टीरिया का नाम रखे जाने से
दुनियाभर से भारत आने वाले मरीज चौकन्ने हो जाएंगे और इसका सीधा असर भारत के मेडिकल
टूरिज्म पर पड़ेगा। ब्रिटिश वैज्ञानिकों का दावा है कि अब तक जो २९ मामले सामने आए
हैं उनमें से १७ वो हैं जिन्होंने भारत या पाकिस्तान की यात्रा की थी। इसके अलावा
बाकी वो हैं जो इन देशों के अस्पतालों में कभी न कभी भर्ती रहे। लेकिन इन तथ्यों से
कई सवाल भी उठते हैं। आखिर भारत में इस बैक्टीरिया की मौजूदगी क्यों नहीं दर्ज की
गई? भारत में इस बैक्टीरिया की वजह से मौत क्यों नहीं हो रही जबकि भारत में
एंटीबायोटिक्स का सबसे ज्यादा बेजा इस्तेमाल होने का आरोप लगता है? साफ है, दाल में
कुछ न कुछ काला तो है। देश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सी पी ठाकुर कहते हैं कि भारत
की स्वास्थ्य सेवा दुनियाभर में अव्वल है इसलिए जो कुछ भी कहा जा रहा है वो एक
साजिश है। इस आरोप में साजिश देखने वालों की आपत्तियों को यूं ही नहीं खारिज किया
जा सकता।
भारत में मेडिकल टूरिज्म का बाजार साल २००८ तक १५०० करोड़ का था। एसोचौम की एक
रिपोर्ट के मुताबिक २०१५ तक इसके ९५०० करोड़ को छू लेने का अनुमान है। भारत में
सर्जरी का खर्च अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों की तुलना में दसवां हिस्सा है। इसने
मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा दिया है। जाहिर है, विकसित देशों को इस बाजार के हाथ से
निकलने का गम है और इस पर पकड़ बनाने के लिए पश्चिमी देशों की ंलॉबी साजिश में
शामिल हो जाए तो हैरत की बात नहीं।
एनआईसीडी के मुताबिक लैंसेट जर्नल को फंड यूरोपीय यूनियन देता है। आशंका जताई
जा रही है कि भारत में बढ़ते मेडिकल टूरिज्म के देखते हुए यह भारत के खिलाफ
दुष्प्रचार का हथकंडा हो सकता है
ये कहती हैं रिपोर्ट
सुपरबग का नाम रखा गया है नई दिल्ली-बीटा-लेक्टामोज या एनडीएम-१। एनडीएम-१
की वजह से बैक्टीरिया की एंटीबायोटिक्स से लडऩे की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
यहां तक कि कार्बापीनम्स जैसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक्स भी इस बैक्टीरिया से लडऩे
में नाकाफी होते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर
मेडिकल पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी है उससे इस बात की आशंका बढ़ी है कि आने वाले समय
में ये सुपरबग दुनिया भर में न फैल जाए। वॉल्श और उनके अंतर्राष्ट्रीय टीम ने 2007
से 2009 के बीच भारत में चेन्नई और हरियाणा के अस्पतालों में रोगियों के सैंपल लिए
और उनकी जांच ब्रिटेन की नेशनल रिफरेंस लैबोरटरी में की गई। उन्होंने 4४ एनडीएम-१
बैक्टीरिया चेन्नई में, 26 हरियाणा में, 37 ब्रिटेन में और 7३ बांग्लादेश, भारत और
पाकिस्तान की विभिन्न जगहों पर पाए गए। वैज्ञानिकों का कहना है कि ब्रिटेन में
एनडीएम-१ पाजिटिव पाए गए रोगियों में से अधिकतर ने हाल ही में कई ने भारत और
पाकिस्तान का दौरा किया है।
बग को किसी खास देश से जोडऩा गलत
स्वास्थ्य अनुसंधान सचिव वी. एम. कटोच ने बताया कि स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत
प्रमुख एजेंसी राष्ट्रीय रोग नियंत्रण स्वास्थ्य मंत्रालय इस मुद्दे की विस्तार से
जांच करेगा लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नए बग को किसी खास देश से जोड़ा जा रहा
है जबकि यह एक पर्यावरणीय वस्तु है। स्वास्थ्य अनुसंधान सचिव ने कहा मैं चकित हूं।
कटोच ने कहा कि बग वातावरण में मौजूद है। यह एक घटना है और इसे संचारित नहीं किया
जा सकता है। स्वास्थ्य अनुसंधान सचिव ने कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि एक शोधपत्र ने
इसे भारत से जोड़ दिया जबकि उन्हें जानना चाहिए कि यह एक जैविक परिघटना है। दवा
प्रतिरोधी सुपरबग का नाम भारत की राष्ट्रीय राजधानी के नाम रखे जाने और उसके लिए
केवल भारत को चिन्हित करने पर रोष प्रकट करते हुए सरकार ने कहा कि इस दावे के पीछे
निहित स्वार्थ हैं। आईसीएमआर के डीजी डा. वीएम कटोच ने ब्रिटेन की इस मुहिम को
भारतीय डॉक्टरों और अस्पतालों के खिलाफ साजिश करार दिया है। उन्होंने कहा कि इसमें
द्वेष साफ तौर पर झलक रहा है।
स्वास्थ्य राज्य मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने संसद में कहा कि हम इसे लेकर चिंतित हैं। सुपरबग तो एक वैश्विक घटना है। यह किसी देश विशेष से संबंधित नहीं है। मैं यह बात पूरे विश्वास और विवेक से कह सकता हूं। आप इस रिपोर्ट के सह लेखक कुमारस्वामी कार्तिकन से पूछे, उन्होंने स्वयं इस बात से अपने को अलग किया है।
इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र का संकेत देते हुए उन्होंने कहा कि निस्संदेह हम इस बात का पता लगाएंगे कि इस रिपोर्ट के पीछे क्या निहित स्वार्थ हैं। मेरा मानना है कि अक्सर कुछ बातों के पीछे कारोबारी हित होते हैं। हम इसकी तह तक जाएंगे और एक देश के नाते इसे चुप चाप स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि जहां तक दवा प्रतिरोधिता का सवाल है, यह अलग मुद्दा है। उन्होंने कहा कि सुपरबग का नाम नई दिल्ली के नाम रखना कहीं से उचित नहीं है। उन्होंने बताया कि ऐसा दो साल पहले किया गया है। त्रिवेदी ने कहा कि जहां तक मेरी सूचना है, एचआईवी का पहला मरीज अमेरिका में पाया गया था। तो क्या हम यह कहें कि यह बीमारी अमेरिका से पनपी। तो क्या एचआईवी की बजाय हम इसे अमेरिका एचआईवी कहें।
मशहूर हार्ट स्पेशलिस्ट डॉ. नरेश त्रेहन ने कहा कि वैज्ञानिक तथ्य तो अपनी जगह हैं,
लेकिन इस सुपरबग का नाम नई दिल्ली रखना बहुत गलत है। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली से
तो कोई सैंपल तक नहीं लिया गया है। र्फोिटस ला फेम के सीनियर प्लास्टिक सर्जरी
एक्सपर्ट डॉ. अजय कश्यप कहते हैं कि यूएस और यूके में बीआरई, एमआरएसए जैसे
एंटीबायोटिक्स के खिलाफ रेजिस्टेंस पैदा करने वाले बैक्टीरिया से हजारों लोग
प्रभावित हैं। हालत यह है कि इन खतरनाक बैक्टीरिया से पीडि़त लोगों के लिए वहां के
अस्पतालों में अलग वॉर्ड बनाए गए हैं और मरीजों को उससे बाहर नहीं निकलने दिया जाता
है। जहां तक भारत की बात है तो यहां अब तक ऐसे किसी भी बैक्टीरिया का पता नहीं लगा
है। स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताए जा रहे सुपरबग नामक बैक्टीरिया को भारत से जोडने
को अनुचित और पूरी तरह से गलत बताते हुए केंद्र सरकार ने कहा, इस तरह के बैक्टीरिया
कई देशों में पाए गए हैं।
मेडिकल पर्यटन प्रभावित करने की कोशिश
दिल्ली मेटालो-बी-लेक्टामेस(एनडीएम-१) नाम के सुपरबग से भारत (नई दिल्ली) का नाम
जोड़े जाने पर तीखी प्रतिक्रिया हो रही है। जानकार इसे दुष्प्रचार और मेडिकल
टूरिज्म प्रभावित करने की साजिश का हिस्सा मान रहे हैं। उनके ऐसा मानने के पीछे ठोस
वजह भी है। लैंसेट जर्नल में छपी रिपोर्ट में ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने दावा किया है
कि मेटालो सुपरबग भारतीय उपमहाद्वीप से पूरी दुनिया में फैला है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों
का दावा है कि ऐसे सुपरबग की भारत में भरमार है। इस सुपरबग के शिकार ३७ ब्रिटिश
मरीजों में से १७ भारत या पाकिस्तान की यात्रा कर चुके हैं।
भारत ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर)
और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेबल डिजीज (एनआईसीडी) ने अपने बयान में कहा है कि
मेटालो-बी-लेक्टामेसश् के संक्रमण का खतरा पूरी दुनिया में है। यह खतरा सिर्फ भारत
में है, यह कहना बिल्कुल गलत है और भारत से इसका नाम जोडऩा भी गलत है।
एनआईसीडी के मुताबिक लैंसेट जर्नल को फंड यूरोपीय यूनियन देता है। दरअसल, यह आशंका
जताई जा रही है कि भारत में बढ़ते मेडिकल टूरिजम के कारोबार को देखते हुए यह भारत
के खिलाफ दुष्प्रचार का एक हथकंडा हो सकता है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने दावा किया है
कि इस रिपोर्ट से इंडिया के बढ़ते मेडिकल टूरिजम के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
एनडीएम-१ की कहानी
दरअसल, नई दिल्ली मेटालो-बी-लेक्टामेस की बात कोई नहीं है। इस बग का सबसे पहली बार
पता २००८ में ही चल गया था, जब भारतीय मूल का ५९ वर्षीय व्घ्यक्ति स्वीडन से अपने
देश भारत आया। इससे पहले भी वह कई बार भारत आ चुका और कई बार अस्पतालों में भर्ती
हुआ। आखिरी बार वह दिसम्घ्बर २००७ में नई दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती हुआ था।
वह डायबीटिज का मरीज था और उसे एक फोड़ा हो गया था। वह जनवरी २००८ में स्वीडन लौटा
और कई टेस्ट कराए। इस दौरान उसके मूत्र में लेबसिएलान्यूमोनिया बैक्टीरिया पाए गए।
हालांकि इन बैक्टीरिया से उसे कोई नुकसान नहीं था और उसे किडनी का संक्रमण भी नहीं
था। लेकिन इनकी मौजूदगी डॉक्टरों के लिए शोध का विषय बन गई क्योंकि ये कार्बापेनम
प्रतिरोधी थे। यह बेहद रोचक है कि ये बैक्टीरिया अभी तक ज्ञात सभी कार्बापेनम जीन
के लिए निगेटिव थे। डीएनए जांच के बाद मरीज के शरीर में एक अनूठे एंजाइम का पता चला
जिसे एनडीएम-१ यानि नई दिल्ली मेटालो बीटा लैक्टामेज का नाम दिया गया।
एक शोधपत्र में इस नए एंजाइम के बारे में छपा। इस पत्र के मुताबिक क्लिबसिएला में
मौजूद जीन एसटी १४ था जो तकरीबन एसटी १५ जैसा था। इसे 'न्यू एमआरएसएÓ नाम दिया गया।
इस बैक्टीरिया को प्रजनन के लिए सेक्स की जरूरत नहीं होती है। अब यह साफ हो चुका है
कि एनडीएम-१ जीन कई तरह के बैक्टीरिया में फैल चुका है। हालत यह है कि ब्रिटेन में
पाया जाने वाला यह सबसे आम कार्बापेनेमेज है।
मुंबई के डॉक्टरों ने दे दी थी सुपरबग की चेतावनी
लांसेट इन्फेक्शस डिजीज जर्नल के ऑनलाइन एडिशन में बुधवार को छपी एक रिपोर्ट के
मुताबिक, भारत और पाकिस्तान से सर्जरी कराकर यूके लौटे ३७ लोगों में सुपरबग का पता
चला है। नई दिल्ली मेटालो-१ नाम के एक जीन ने बैक्टीरिया में बदलाव लाकर उसमें
एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर दी है। यह बदलाव ई- कोली
बैक्टीरिया में दिख रहा है जो यूरीनरी ट्रैक (मूत्राशय) के संक्रमण का सबसे आम कारण
है। अपने डीएनए स्ट्रक्चर की बदौलत यह न सिर्फ दूसरे टाइप के बैक्टीरिया की कॉपी कर
सकता है बल्कि उनके हिसाब से बदल भी सकता है। रिसर्चर्स का कहना है कि इंडिया में
सुपरबग काफी तेजी से फैल रहा है और यहां का हेल्थ सिस्टम ठीक न होने के कारण मरीजों
को सबसे ज्यादा परेशानी हो सकती है। इससे निबटने के लिए इंटरनेशनल सर्विलांस की
जरूरत है।
मैगजीन के मुताबिक, यूके के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, नीदरलैंड, यूएस और स्वीडन
में भी रेजिस्टेंस जीन मिला है। रिसर्चर्स का कहना है कि यूके और यूएस के बहुत सारे
लोग कॉस्मेटिक सर्जरी के लिए भारत और पाकिस्तान आ रहे हैं, ऐसे में उनके जरिए पूरी
दुनिया में सुपरबग फैल सकता
है।
साजिशन फैलाई गई दहशत
भारतीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला पूरी तरह से राजनीति से
प्रेरित है और भारत में बढ़ती स्वास्थ्य पर्यटन की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने के
लिए पश्चिमी देशों के चिकित्सकों द्वारा फैलाई जा रही अफवाह है। भारतीय जनता पार्टी
(भाजपा) के वरिष्ठ नेता एस् एस.अहलूवालिया ने कहा कि सुपरबग विदेशी बहुराष्ट्रीय
कंपनियों द्वारा फैलाई जा रही दहशत हो सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार को संक्रमणों
और इलाज के लिए जरूरी एंटीबॉयोटिक दवाओं का एक रिकॉर्ड रखना चाहिए। अहलूवालिया ने
कहा कि रिपोर्ट के समय को लेकर संदेह है क्योंकि यह ऐसे समय सामने आया है जब भारत
चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में एक वैश्विक ताकत के रूप में
उभर रहा है।
उन्होंने कहा कि संभव है कि यह दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा फैलाई जा रही दहशत हो। अहलूवालिया ने कहा कि भूमंडलीकरण के साथ सिर्फ जनसंख्या का ही नहीं बल्कि जीवाणुओं और विषाणुओं का भी पलायन हो रहा है। राज्यसभा में प्रतिपक्ष के उप नेता अहलूवालिया ने इस मामले में कुछ कदम उठाने की मांग की। उन्होंने कहा, जब हम स्वास्थ्य पर्यटन के क्षेत्र में एक बडी ताकत के रूप में उभर रहे हैं तो हमें उन आंकडों के साथ सामने आना चाहिए जिनमें अस्पतालों में पहचाने गए संक्रमणों और उनके इलाज के लिए एंटीबॉयोटिक दवाओं का जिक्र हो।
फिलहाल दुनिया में इसका इलाज संभव नहीं है। कई तरह की दवाइयां इसके इलाज के लिए बनाई गई है लेकिन फिर भी अबतक ये डॉक्टरों के लिए चुनौती ही बना हुआ है। दुनियाभर में एक सुपरबग ने खलबली मचा दी है। नई दिल्ली मेटालो १ नाम का ये बैक्टीरिया ऐसा बैक्टीरिया माना जा रहा है जिसकी चपेट में आने के बाद इसका कोई इलाज नहीं। हालांकि भारत इसे साजिश का बैक्टीरिया कह रहा है और जानकारों की मानें तो ये भारत के मेडिकल टूरिज्म की चूलें हिलाने की साजिश है।










