सुरक्षा के लिए खतरनाक ब्लैकबेरी

ब्लैकबेरी को लेकर भारत सरकार की सुरक्षा चिंताएं एकदम जायज हैं। भारत ही नहीं बल्कि करीब एक दर्जन देश अपने संदेशों की गोपनीयता भंग होने की बात समय से करते रहे हैं। ब्लैकबेरी की मौजूदा प्रणाली इसलिए खतरनाक हैं, क्योंकि इसके जरिए दुनिया भर में आदान-प्रदान किए जाने वाले संदेशों को पकड़ा नहीं जा सकता। भारत सरकार के कड़े रूख के बाद ब्लैकबेरी घुटने टेकता हुआ लग रहा है। आशीष शर्मा की रिपोर्ट

देश में हुई संचार क्रांति से जहां आम लोगों को फायदा पहुंचा है, वहीं संचार और सूचना प्रौद्यौगिकी की नई-नई तकनीकों ने सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर दी है। ब्लैक बेरी फोन सेवा को लेकर चल रहा ताजा विवाद इसका उदाहरण है। इससे पूर्व सरकार ने विदेशों से आयातित संचार उपकरणों को लेकर कड़े नियम-कायदे बनाए। थोड़ा और पहले जाएं तो चीन से आ रहे बिना (इंटरनेशनल मोबाइल इक्विपमेंट आइडेंटिटी) आईएमईआई नंबर के फोन सैटों ने चिंता पैदा की थी। इधर ब्लैकबेरी सेवा के कारण पैदा हो रही सुरक्षा चुनौतियों को लेकर अभी गृह मंत्रालय और ब्लैकबेरी सेवा देने वाली कंपनी रिसर्च इन मोशन (रिम) के बीच बातचीत चल रही है। फिलहाल, कोई सार्थक नतीजा नहीं निकला है। यदि 3१ अगस्त तक समस्या का समाधान नहीं होता है तो देश में ब्लैकबेरी की सेवाएं बंद की जा सकती हैं। देश में ब्लैकबेरी इस्तेमाल करने वाले दस लाख से ज्यादा अतिविशिष्ट लोग हैं। इनमें केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों, नेताआें, नौकरशाहों के अलावा कारपोरेट क्षेत्र भी शामिल है। कहने का तात्पर्य यह है कि ब्लैकबेरी सेवा बंद होना रिम और इसके ग्राहकों दोनों के लिए घाटे का सौदा होगा।

क्या हैं सुरक्षा चिंताएं
मौजूदा नियमों के तहत सुरक्षा एजेंसियां जरूरत पडऩे पर फोन से होने वाली बातचीत, संदेश या ईमेल को पकड़ सकती हैं। कानून उन्हें यह अधिकार प्रदान करता है। उनके पास इन संदेशों और ई मेल को पकडऩे का करने जरिया है। यहां तक कि कंप्यूटर पर बैठकर इंटरनेट के जरिये जो ईमेल भेजे जाते हैं, उन्हें भी ट्रेस किया जा सकता है। सिक्योरिटी एजेंसियों के पास इसकी तकनीक है और इन सेवाओं पर नजर रखने का जरिया उनके पास है। गृह मंत्रालय की एक एजेंसी है जो यही काम करती है।

उपकरण आपूर्ति करने वाली कंपनियां का कहना है कि इस खुलासे का मतलब है कि उनकी तकनीकी जानकारी लीक करना जो उनके मालिकाना अधिकार का उल्लंघन है। लेकिन सरकार अपने रुख पर अडिग है


जरूरत पडऩे पर किसी फोन कंपनी के सर्वर से फोन कॉल रिकार्ड की जा सकती हैं। एसएमएस को भी अब पढ़ा जा सकता है। इसी प्रकार ईमेल को भी सेवा प्रदान करने वाली कंपनी के सर्वर से पकड़ा जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति हाटमेल के जरिये ईमेल करता है तो इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी मसलन एमटीएनएल से इसका ब्यौरा जाना जा सकता है। इस प्रकार सुरक्षा एजेंसियां इन सेवाओं पर नजर रखती हैं। लेकिन ब्लैकबेरी की सेवाएं सुरक्षा एजेंसियों के दायरे से बाहर हैं। ब्लैकबेरी इंटरप्राइजेज सर्वर (बीईएस) के जरिए संचालित होने वाले कारपोरेट ई मेल पर सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ संभव नहीं है। इस सेवा का इस्तेमाल कंपनी अपने संगठनात्मक ई मेल के लिए करती है। इसमें ब्लैकबेरी डिवाइस पिन नंबर से ई मेल भेजी जाती है। ये संदेश ब्लैकबेरी डिवाइस से कोड के रूप में ब्लैकबेरी के कनाडा स्थिर सर्वर में पहुंचते हैं तथा वहां से फिर ब्लैकबेरी डिवाइस तक पहुंचते हैं। इसलिए इन्हें वायरलैस सेवा प्रोवाइडर से बीच में डिकोड नहीं किया जा सकता है। कम से कम भारत के पास ऐसी तकनीक अभी नहीं है। इसी प्रकार ब्लैकबेरी की मैसेजिंग सेवा (बीबीएम) भी सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है। इसमें ब्लैकबेरी डिवाइस के चार अंकों वाले यूनिक पिन नंबर से दुनिया में कहीं भी दूसरे ब्लैकबेरी डिवाइस पर संदेशों का आदान प्रदान किया जा सकता है। इसमें मैसेज का शुल्क भी नहीं लगता है क्योंकि इसमें वायरलैस नेटवर्क का इस्तेमाल ही नहीं होता है। यह ब्लैक बेरी सर्वर के साफ्टवेयर की विशेषता की वजह से संभव है। सुरक्षा एजेंसियांे को इन दो सेवाओं से होने वाले ईमेल और मैसेंजिंग पर नियंत्रण चाहिए। नियंत्रण का मतलब है कि वे चाहते हैं कि ब्लैक बेरी ऐसा इंतजाम करे जिसमें भारतीय सुरक्षा एजेंसियां जब चाहें जिस फोन नंबर पर नजर रखे सकें। इन संदेशों को डिकोड करने की तकनीक ब्लैकबेरी उपलब्ध कराए।

खुफिया एजेंसियां उन्हीं लोगों की जांच करती हैं जो संदिग्ध हों। देश के लिए खतरा हों या आतंकी गतिविधियों आदि में लिप्त हों। इसलिए सरकार की पहल को प्राइवेसी में हस्तक्षेप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए

क्या यह प्राइवेसी का उल्लंघन है ?
इंडियन टेलीग्राफ एक्ट के प्रावधानों के तहत सरकार को सुरक्षा कारणों से फोन पर होने वाली बातचीत या संदेशों को जानने का अधिकार मिल जाता है। इसलिए सुरक्षा कारणों से की गई कार्रवाई को प्राइवेसी का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता है। फिर यह कार्य विशेष परिस्थितियों में होना है। यदि ब्लैकबेरी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को डिकोड एक्सेस प्रदान कर देता है तो इसका यह मतलब नहीं है कि हर ब्लैकबेरी वाले के फोन पर नजर रखी जा रही है। जहां तक ब्लैकबेरी का सवाल है, उसकी लोकप्रियता और बढ़ती मांग की प्रमुख वजह ही प्राइवेसी से जुड़े उसके ये फीचर भी हैं। हालांकि यह भी सच है कि अभी तक बाजार में उपलब्ध सभी स्मार्ट फोन में ब्लैक बेरी उम्दा है। इसलिए भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को इसका एक्सेस देने से ब्लैकबेरी की इस खूबी पर कोई खास फर्क नहीं पडऩा चाहिए। वैसे भी खुफिया एजेंसियां उन्हीं लोगों की जांच करती हैं या निजता भंग करती हैं जो संदिग्ध हों। देश के लिए खतरा हों या किसी संगठित अपराध, आतंकी गतिविधियों आदि में लिप्त हों। इसलिए सरकार की इस पहल को प्राइवेसी में हस्तक्षेप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अन्य देशों की स्थिति
कई देशों ने सुरक्षा कारणों से ब्लैकबेरी के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रखी है। सऊदी अरब ने इस सेवा को बंद करने की चेतावनी दी तो रिम ने उसकी शर्त मान ली। यूएई ने 11 अक्टूबर तक का अल्टीमेटम दिया है। उसने डाटा देश से बाहर भेजने पर आपत्ति की है। यानी यूएई चाहता है कि ब्लैकबेरी अपना सर्वर वहीं स्थापित करे। लैबनान, कुवैत ने कंपनी से डाटा तक पहुंच बनाने की मांग की है। बहरीन ने चिंता जताई है। अल्जीरिया समीक्षा कर रहा है। इस प्रकार कई देशों ने ब्लैकबेरी की सेवा पर सुरक्षा संबंधी चिंताएं व्यक्त की हैं। एक सवाल यह उठता है कि विकसित देशों ने ब्लैकबेरी का विरोध नहीं किया है।

जबकि आतंकवाद की चिंता सबसे ज्यादा अमेरिका को होती है तो ब्लैकबेरी के मामले में वह चुप क्यों है। 91 देशों में ब्लैकबेरी की सेवाएं चल रही हैं लेकिन सुरक्षा संबंधी चिंताएं कुछ ही देश क्यों व्यक्त कर रहे हैं। इसके बारे में खबर है कि तमाम बड़े देशों की खुफिया एजेंसियों ने ब्लैकबेरी के संदेशों को डिकोड करने में सफलता हासिल कर ली है। उनके पास पहले से ऐसी तकनीकी उपलब्ध हैं। इसलिए उन्हें ब्लैकबेरी की सेवाओं की परवाह नहीं। आमतौर पर सुरक्षा एजेंसियां के पास एेसे एक्सपर्ट होते हैं जो इंसरेप्सन के विशेषज्ञ होते हैं लेकिन भारतीय एजेंसियां इसमें फिसड्डी हैं। वैसे खबर है कि क्रैकरों के समूह ने गृह मंत्रालय से संपर्क किया है और कहा कि वे उन्हें मौका दें वे ब्लैक बेरी के संदेशों को चुटकियों में खुफिया एजेंसियों के सुनने लायक बना देंगे।

गृह मंत्रालय और ब्लैकबेरी की बातचीत
ब्लैकबेरी के वाइस प्रेसीडेंट राबर्ट ई क्रो के नेतृत्व में एक टीम ने पिछले दिनों गृह सचिव जी. के. पिल्लई से मुलाकात की। कंपनी की तरफ से सुरक्षा एजेंसियों को संदेशों का ब्यौरा करने के लिए मैनुअल तकनीक मुहैया कराई गई है। कंपनी अपने एक एक्सपर्ट को नार्थ ब्लॉक में तैनात करने पर भी सहमत है। लेकिन गृह मंत्रालय इससे संतुष्ट नहीं है। दरअसल, इस व्यवस्था में यदि सुरक्षा एजेंसियों को किसी ब्लैकबेरी नंबर से होने वाली मैसेसिंग का ब्यौरा चाहिए तो उसमें 8-10 दिन का समय लग सकता है। जबकि सुरक्षा एजेंसियों को रियल टाइम एक्सेस चाहिए। मलसन, यदि दो आतंकवादी किसी घटना को अंजाम देने के संदेश भेज रहे हों तो दस दिन बाद इसका ब्यौरा सुरक्षा एजेंसियों को मिल भी गया तो फायदा क्या होगा। तब तक तो वे अपने मंसूबों में कामयाब हो भी जाएंगे।

समस्या सुलझने में अभी लगेगा वक्त
ब्लैकबेरी का कहना है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को रियल टाइम एक्सेस डाटा प्रदान करने में उसे कम से कम एक साल का वक्त लग सकता है। जबकि गृह मंत्रालय ने इसके लिए 31 अगस्त की समयावधि निर्धारित कर रखी है। दूसरी बात यह है कि जो मैनुअल एक्सेस अभी ब्लैकबेरी देने जा रही है, वह भी ब्लैकबेरी मेसेजिंग के लिए जबकि ब्लैकबेरी इंटरप्राइजेज सर्वर सेवा के लिए कंपनी कोई योजना अभी तक मंत्रालय को नहीं दे पाई है। इसलिए माना जा रहा है कि विवाद फिलहाल हल होने के आसार नहीं हैं।

चीनी उपकरण विवाद
देश में दूरसंचार कारोबार तेजी से बढ़ रहा है और इस इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने के लिए जो बुनियादी उपकरण चाहिए वे विदेशों से आयात किए जाते हैं। चीनी की दो बड़ी कंपनियां हुवावेई और जेडटीई जैसी बड़ी कंपनियां बड़े पैमाने पर उपकरण आपूर्ति करती हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने इन कंपनियों के बारे में यह आशंका जाहिर की थी कि इन उपकरणों में सुरक्षा पासवर्ड और डिजाइन कोड के बहाने ऐसी कोडिंग हो सकती है जिससे इन देशों की खुफिया एजेंसियां भारतीय टेलीकॉम नेटवर्क में घुसपैठ कर लें। इसके चलते पहले सरकार ने उपकरणों के आयात पर रोक लगाई। अब रोक तो खोल दी गई है लेकिन इसके लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं। यानी उपकरण आपूर्तिकर्ताओं को इनसे जुड़े सुरक्षा कोड और डिजाइन कोड की जानकारी उपलब्ध करानी होगी। दूरसंचार विभाग ने कहा कि आपूर्तिकर्ताओं को सुरक्षा कोड तथा डिजाइन संबंधी जानकारियों को एस्क्रो खाते में कूट रूप में रखा जाएगा। जिसकी सुरक्षा एजेंसियां जांच कर पाएंगी। इसका उल्लंघन करने पर उपकरण आपूर्ति करने वाली कंपनी पर अनुबंध मूल्य का सौ फीसदी जुर्माना लगाया जा सकता है जबकि बिना कोड की जानकारी के उपकरण खरीदने वाली कंपनी को 50 करोड़ रुपये का जुर्माना भरना पड़ सकता है। दूसरी तरफ उपकरण आपूर्ति करने वाली कंपनियां का कहना है कि इस खुलासे का मतलब है कि उनकी तकनीकी जानकारी लीक करना जो उनके मालिकाना अधिकार का उल्लंघन है। लेकिन सरकार अपने रुख पर अडिग है।

आईएमईआई नंबर
आईएमईआर नंबर के फोन को अब देश में प्रतिबंधित कर दिया है। दरअसल, हर मोबाइल हैंडसेट पर एक आईएमईआई नंबर होता है। यदि कोई फोन खो जाए और कोई व्यक्ति उसमें दूसरा सिमकार्ड डालकर इस्तेमाल करे तो आईएमईआई नंबर से उसे पकड़ा जा सकता है। चीन से भारी सं या में ऐसे फोन आ रहे थे जिनके इस्तेमाल से सुरक्षा संबंधी एेसी ही चुनौतियां पैदा हो गई थी। आतंकी तत्वों के लिए ऐसे हैंड सैटों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इन्हें पकडऩा मुश्किल होता है। बहरहाल, अब इन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया है। अब बिना आईएमईआई नंबर वाले हैंडसैट चल ही नहीं पाते हैं।