वर्ल्ड कप फुटबाल मेंदरका यूरोपीय किला

वर्ल्ड कप फुटबाल का सफर जारी है। इसी के साथ जारी है उठापटक और जबरदस्त मुकाबलों का सिलसिला भी। बड़े बड़े दिग्गजों के पैर उखड़ चुके हैं। यूरोप कीमंदी की आंच यूरोपीय टीमों पर भी नजर आने लगी है। पिछले वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंचने वाली दोनों टीमें इटली और फ्रांस बाहर हो चुकी हैं। वहीं उस लातीनी अमेरिकी देशों की टीमें कमाल कर रही हैं। लातीनी अमेरिकी देशों में गरीबी है, गुरबत है-फुटबाल के खिलाड़ी अभावों में पलते हैं, लेकिन फुटबाल में उनका कोई सानी नहीं। वर्ल्ड कप है तो इसके रंग और छटाएं भी हैं। फुटबाल के महाकुंभ पर रत्ना श्रीवास्तव की रिपोर्ट

वर्ल्ड कप फुटबॉल क्या आपको एक नया ट्रेंड नहीं दिख रहा। दुनियाभर के फुटबालरों को अकूत पैसा देकर आकर्षित करने वाले यूरोप का किला दरकने लगा है। यूरोप में छाई मंदी ने पहले से ही यूरोप की नींद हराम की हुई है। अब फुटबाल में यूरोपीय दिग्गजों की बुरी गत ने हालत और खराब कर दी है। वैसे कुछ लोगों ने वर्ल्ड कप में यूरोपीय फीकेपन को वहां की मंदी से ही जोड़ा है, बकौल उनके इस मंदी ने यूरोप के जनजीवन पर बुरी तरह असर डाला है। लिहाजा यही असर अगर वहां के फुटबालर्स पर भी नजर आया हो तो क्या किया जा सकता है। वैसे बात सही है कि यूरोप के बड़े पावरहाउस में फ्रांस, इटली और इंग्लैंड के खेल में कहीं भी और कभी भी वो जोश और रंग नहीं दिखा, जो पिछले वल्र्ड कप में नजर आया था। फ्रांस और इटली की टीमें तो पिछले वर्ल्ड कप फाइनलिस्ट टीमें थीं। अगर फ्रांस उपविजेता था तो इटली ने विजेता के तौर पर गर्व से सिर उठाया था। लेकिन इस बार तो पहले ही दौर में दोनों टीमों का बिस्तर गोल हो गया। फ्रांस की हार के बारे में बहुत बातें हो चुकी हैं। टीम में कलह थी, कोच अक्खड़ था, लिहाजा टीम में न तो एका था और न ही खेलने की जिजीविषा। इसी ने उनको मैच से पहले ही उखाड़ दिया।  लेकिन इटली इतनी जल्दी क्यों बेरंग होकर बाहर निकला, इसका जवाब भी सामने आ चुका है। कहा जा रहा है कि टीम के खिलाड़ी इतने बुढ़े हो गये थे कि उनके पैर मैचों के दौरान कांपने लगे थे। वो हांफने लगे थे, उनकी क्षमता जवाब देने लगी थी, चुनौती के सामने उनका हाल जिस तरह हो रहा था, वो तो देखने लायक था। बेचारे कोच लिप्पी ने चुपचाप हार का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया। बकौल उनके टीम अगर कुछ नहीं कर पाई तो शायद गलती उनकी ही है। वैसे ये भी अचरज की बात ही है कि इटली की टीम इतनी बुरी थी नही, जितना बुरा हाल उसका वल्र्ड कप में हुआ। सभी खिलाड़ी तपेतपाये थे, अनुभवी थे और उनके खेल में कमी थी भी नहीं। लेकिन लगता है कि चैंपियन होने के साथ साथ इटली में उनसे की गई जबरदस्त अपेक्षाएं उन्हें ले डूबीं।

इटली का बच्चा बच्चा इन दिनों गमगीन है। यूरोप में तीन ही देश हैं, जहां से वल्र्ड फुटबाल की इकोनामी संचालित होती है और वो देश हैं इटली, इंग्लैंड और स्पेन। और फुटबाल में इन देशों में पैसा इसलिए बहता है क्योंकि यहां के लोग फुटबाल के जबरदस्त दीवाने माने जाते हैं। इटली को तो हर वल्र्ड कप में ही फेवरिट माना जाता रहा है। उसके खेल में कुछ अलग बात भी है। अब बात इंग्लैंड की भी हो जाये, जिसे कुछ लोग इस बार बेहद ऊंचा आंक रहे थे, उसकी वजह भी थी, क्वालिफाइंग राउंड में इंग्लैंड का खेल इतना परफेक्ट था कि लगने लगा था कि कुछ सालों में इंग्लैंड शायद अपने सबसे बेहतरीन कांबिनेशन के साथ वल्र्ड कप में उतर रहा है। लेकिन कुछ उसका दुर्भाग्य कहिये या जर्मनी के खिलाफ मुकाबले में यकायक उसके आत्मविश्वास का गायब हो जाना कि फिर सबकुछ उनके खिलाफ ही होता चला गया। एक समय था जब इंग्लैंड 0-२ से पीछे था, तभी लैम्बार्ड ने एक गोल दागा। इसके कुछ ही देर बाद लैम्बार्ड ने एक बार फिर गेंद को गोल में पहुंचा दिया। लेकिन रेफरी ने इसे गोल नहीं माना। काश ये गोल अगर मान लिया जाता तो शायद वल्र्ड कप में तस्वीर ही कुछ और होती। इसके बाद शायद इंग्लैंड के खिलाड़ी अपसेट हो गये। उनका कांबिनेशन बिगड़ गया। उनकी डिफेंस लाइन कहां चली गई, पता ही नहीं चला, रणनीति कहां हवा हो गई, ये भी नहीं दिखा। लेकिन ये भी मानिये कि जिस तरह से रेफरी ने इंग्लैंड के दूसरे गोल को अमान्य घोषित किया, वो एक अपराध की तरह है। किसी भी रेफरी को समझ में आना चाहिए कि उसकी एक भूल महज 11 खिलाडिय़ों की टीम नहीं बल्कि करोड़ों दिलों को आहत करती है। बाद में बेशक फीफा अध्यक्ष ने रेफरियों की गलती के लिए माफी मांग ली लेकिन जो नुकसान टीमों को होना था वो तो हो ही गया। वैसे रेफरीशिप के लिहाज से ये वर्ल्ड कप सबसे खराब वल्र्ड कप कहा जा सकता है। जहां रेफरी कुछ ज्यादा ही लापरवाह दिख रहे हैं। शायद तकनीक का कुछ हद तक प्रयोग अब कुछ फैसलों में फुटबाल में भी होना चाहिए। ये काम क्रिकेट और कई अन्य खेलों में हो ही रहा है और उससे इन खेलों की जीवतंता और विश्वसनीयता दोनों बढ़ी है। फीफा अगर तकनीक की ओर से मुंह मोड़ता है तो तय मानिये कि ऐसा करके वो किसी और का नहीं बल्कि फुटबाल का ही नुकसान कर रहा है।

1930 के बाद पहली बार चार लातीनी देशों की टीमें वल्र्ड कप के क्वार्टर फाइनल में पहुंची हैं। लातीन देशों में गुरबत है, गरीबी है- वहां गरीबी में फुटबाल पलती है और स्टार ऐसे घरों से निकलते हैं, जहां एक समय खाना भी मुश्किल से मयस्सर होता है, वहां स्लम्स के बच्चे बचपन से एक ही सपना देखते हैं, फुटबाल स्टार बनने का, जिससे वो जीवन को बदल सकें, ऐसा होता भी है, चाहे रोनाल्डो की बात करिये या रोनाल्डिन्हो की या फिर आलटाइम ग्रेट पेले या माराडोना, सभी का बचपन अभाव की गलियों के बीच से यहां तक पहुंचा है। यहां के खिलाडिय़ों को फुटबाल नैसर्गिक प्रतिभा के तौर पर मिलती है, फुटबाल का जादू उनकी नस नस में समाया होता है। आप खुद ही ब्राजील और अर्जेंटीना के खेल को देख लीजिये, इस बात का अहसास हो जायेगा। हार जीत अब किसके खाते में आयेगी, ये तोआगे आने वाले मैच बताएंगे लेकिन ये एकदम साफ है कि दूसरी टीमों के साथ खेलते हुए उनका खेल कुछ अलग ही नजर आता है। वहीं यूरोप के पैसे की चमक के बावजूद फुटबाल धूल चाट रही है। इस वर्ल्ड कप में लातीनी देशों में ब्राजील, अर्जेंटीना, उरुग्वे और पैराग्वे की टीमों ने अगर अंतिम आठ में जगह बनाई तो अफ्रीका के बेहद गरीब देश घाना ने ये सफर तय कर डाला। यूरोप से जर्मनी, स्पेन और नीदरलैंड मैदान में बचे हैं। लातिनियों के फुटबाल दर्शन और यूरोपीय फुटबाल के अंदाज में भी उतना ही अंतर है। कहीं न कहीं ये भी है कि एक फुटबाल ही है जिसके जरिए लातीनी देश पूरी दुनिया के सामने अपने दबदबे का प्रदर्शन करते हैं। अर्जेंटीना के खेल में अगर पैनापन है और उसके खिलाडियों को मालूम है कि मैदान पर क्या करना है तो ब्राजीलियों के खेल में सुंदरता और क्लास नजर आती है। चार साल में फुटबाल वाकई बहुत बदल गई है। 2006 के जर्मनी वल्र्ड कप को याद करिये, तब सेमीफाइनल में पहुंचने वाली चारों ही टीमें यूरोप की थीं। लेकिन इस बार ये भी हो सकता है कि सेमीफाइनल में पहुंचने वाली चारों ही टीमें दक्षिण अमेरिका की हों, चार न सही दो टीमों का तो सेमीफाइनल में पहुंचना तय ही है। अगर इतिहास को देखें तो पता लगेगा कि जब वर्ल्ड कप यूरोप से बाहर हुआ है तब ट्राफी लातीनी देशों के पास गई है..

उरुग्वे और पैराग्वे को भी कम मत समझिये
हो सकता है कि लोग उरुग्वे और पैराग्वे को कम आंक रहे हों लेकिन दोनों टीमों की अपनी खासियतें हैं। अगर उरुग्वे के पास शानदार स्ट्राइकर हैं तो पैराग्वे का डिफेंस और लंबी पासिंग बेजोड है। ये दोनों ही टीमें हमेशा वर्ल्ड कप में बेहतरीन खेल दिखाती रही हैं।

दक्षिण अफ्रीका ने उदाहरण पेश किया
सही मायनों में दक्षिण अफ्रीका ने उस वल्र्ड कप में एक उदाहरण पेश किया। पहली बार वर्ल्ड कप में खेलते हुए उन्होंने गजब का उदाहरण पेश किया। पहले मैच में मैक्सिको के साथ 1-1 से बराबरी कर नैतिक जीत हासिल की। फिर उरुग्वे से 0-3 से हारने के बाद हर कई उन्हें हल्का आंकने लगा था। लेकिन फ्रांस के खिलाफ उनके गजब के खेल ने खुद फ्रांसीसी दर्शकों को इस टीम की तारीफ करने पर मजबूर कर दिया। मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका दोनों के अंक बराबर थे लेकिन गोल औसत के आधार पर मैक्सिको दूसरे राउंड में पहुंच गया। लेकिन इसके बावजूद खुद के पहले राउंड से बाहर होने को मेजबान टीम ने खेलभावना की तरह लिया। फिलहाल स्थिति ये है कि हर कोई इस टीम का प्रशंसक बन चुका है। तो आपने देखा कि पहले दौर से बाहर होने वाली इन दो टीमों में अंतर क्या रहा। एक ने सबका दिल जीत लिया तो दूसरे ने अपने प्रशंसकों को भी उनसे दूर कर दिया।

वर्ल्ड कप को जीवंत करते ये कैरेक्टर्स
दक्षिण अफ्रीका के वर्ल्ड कप को देखते हुए भी आपको महसूस हो रहा होगा कि ये वल्र्ड कप कितना अलग है। इसके रंग निराले हैं। स्टेडियम से लेकर मैदान तक ही अलग ही रंग, अलग कैरेक्टर्स। सबसे बड़ा कैरेक्टर तो इस वर्ल्ड कप का एक मीटर लंबा खास तरह का वुवुजेला भोंपू है। पूरे मैच के दौरान ये बजता ही रहता है और हजारों लाखों मक्खियों के भनभनाने जैसी अजीब की आवाज कभी रुकती ही नहीं। इससे ध्वनि की तीव्रता 122 से 128 डेसिबल तक पहुंच जाती है। जबकि कान के स्वस्थ रहने के लिए सामान्य सीमा 80-77 डेसिबल मापी गई है। प्लास्टिक के इन भोंपुओं पर विदेशी टीमों और कोचों ने खासा इतराज किया था लेकिन फीफा ने इसे दक्षिण अफ्रीका की सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ते हुए इस पर रोक लगाने से मना कर दिया। अब वुवुजेला दक्षिण अफ्रीका में जमकर बिक रहे हैं।
रंग बिरंगी खास तरह की हेलमेट वाली टोपियां इस वर्ल्ड कप के रंग को एक और आयाम देता है। इन टोपियों को मकारापा कहा जाता है। ये डेकोरेटिव होती हैं, अलग अलग रंगों में आकार प्रकार की बनाई जाती हैं, इनकी खास बात एक ही है कि इनका बेस मजबूत हेलमेट होता है। तीस साल पहले एक छोटे से कस्बे से एल्फ्रेड बालोगी ने इसे बनाना शुरू किया, अब इसकी डिमांड इतनी बढ़ गई है कि जोहांसबर्ग में उन्होंने एक बड़ा स्टूडियो ले लिया है और एक बड़ा स्टाफ उनकी मदद करता है।
ये तो थी स्टेडियम की बात, जो उत्साही दर्शकों से खचाखच भरे रहते हैं। मैदान पर भी ऐसे चरित्रों की कमी नहीं। अर्जेंटीना टीम के कोच डिएगो मेराडोना सूट में देखना, पल पल में निराशा या उत्साह जाहिर करना भी अलग याद दिलाता है। मुश्किल से एक दशक पहले मेराडोना मैदान के राजा हुआ करते थे। उन्हें सदी के महानतम खिलाडिय़ों में पेले के साथ शुमार किया जाता है। मेराडोना को तब मैदान पर खेलते देखना और अब कोच के रूप में मैदान में साइड लाइंस के परे खड़े देखना वाकई अजीब लगता है, उनकी मुख-मुद्राएं देखकर लगता है कि बस मौका मिलते ही वो फिर मैदान में कूद जाना चाहते हैं। जब भी गेंद लाइन से बाहर जाती है, तो मेराडोना खुद ही भागकर गेंद पकड़ते हैं और खिलाडिय़ों को लौटाते हैं। मेराडोना जहां महान खिलाड़ी रहे हैं तो एक और टीम के एक ऐसे कोच भी यहां पहुंचे हैं, जिनके चयन के तौरतरीके अजीबोगरीब रहे हैं, ये हैं फ्रांस के रेमंड डोमिनिक, जिन्होंने खिलाडिय़ों को मैदान पर उनके प्रदर्शन के साथ साथ ज्योतिषीय गणना के हिसाब से भी छांटा है, इसकी बहुत आलोचना हुई,लेकिन रेमंड के अपने तर्क हैं। इस वर्ल्ड कप के सबसे महंगे खिलाड़ी पुर्तगाल के क्रिस्टियानों रोनाल्डो हैं, रियाल मैड्रिड ने उन्हें खरीदने के लिए पिछले साल 131 मिलियन डालर खर्च कर दिये। रोनाल्डो गरीब परिवार में पैदा हुए। बचपन से ही उनके अंदर फुटबाल की गजब की प्रतिभा थी। उनका नाम अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से प्रभावित होकर रखा गया था। 

फ्रांस की हार कुछ सिखाती है
फ्रांस टीम जिस तरह से पहले ही राउंड के बाद बाहर निकली, उसने दिखाया कि जीत के लिए जितने जरूरी अच्छे खिलाड़ी और टीम हैं तो उतना ही जरूरी है अनुशासनहीनता, बेहतर संवाद और उचित प्रबंधन।
मैक्सिको के खिलाफ हार के बाद स्टार खिलाड़ी अनलेका ने कोच रेमंड डोमेनिक के साथ अभद्रता की। गुस्से से लाल-पीले कोच ने अनलेका को बाहर करने में एक मिनट की देरी नहीं की लेकिन अनलेका टीम के लोकप्रिय खिलाड़ी हैं, टीम में विद्रोह फैल गया, टीम ने प्रैक्टिस करने से मना कर दिया। सोचिये भला कि इंटरनेशनल स्टेज पर जहां हर किसी की निगाह आप पर हो, वहां इन घटनाओं का क्या असर पड़ा होगा। खैर खिलाडिय़ों को मनाया, लेकिन टीम में असंतोष तो आ ही चुका था, जिसका असर अगले मैच पर पड़ा। फ्रांस को दक्षिण अफ्रीका ने 2-1 से हराकर तहलका ही नहीं मचाया बल्कि फ्रांसीसी टीम को बाहर का रास्ता ही दिखा दिया। फ्रांस टीम जिस तरह से पहले ही राउंड के बाद बाहर निकली, उसने दिखाया कि जीत के लिए जितने जरूरी अच्छे खिलाड़ी और टीम हैं तो उतना ही जरूरी है अनुशासनहीनता, बेहतर संवाद और उचित प्रबंधन।