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Posted Wed, 02/01/2012 - 23:39 by admin

पुस्तक समीक्षा : अनुज अग्रवाल
देश में एक समय सनसनी मचा देने वाले हवाला कांड के तहत यह सनसनीखेज खुलासा हुआ था कि देश के प्रमुख नेताओं और आला अफसरों को अवैध रूप से करोड़ों रुपये का भुगतान जिन स्रोतों से हो रहा था, उन्हीं स्रोतों से कश्मीर के आतंकवादियों को भी पैसा पहुंच रहा था। यह ब्यौरा भिलाई इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक सुरेंद्र कुमार जैन की डायरी में दर्ज था। ये डायरियां जैन बंधुओं के यहां अचानक डाले गये छापे में मिली थीं। जब तक यह रहस्य जैन डायरियों में छिपा था, तब तक किसी को कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन इस खतरनाक सच को सार्वजनिक करने और दोषियों को दंडित करने की कोशिश विनीत नारायण जैसे साहसी पत्रकार के लिए भारी पड़ गई।
विनीत नारायण की यह किताब बताती है कि सच को सामने न आने देने की कदम-कदम पर कैसी कोशिश की गई। चूंकि डायरी में ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के नाम थे, इसीलिए सच को दबाने में सभी जनसेवक उसी तरह एक हो गए, जैसे वे संसद में अपना वेतन-भत्ता बढ़ाने के समय एकजुट हो जाते हैं। जिन दिग्गज नेताओं को पहले इस पत्रकार से बातचीत करते हुए कोई परेशानी नहीं होती थी, वे नेता अब इनसे कन्नी काटने लगे। अगर वे सामने कभी मिल भी जाते थे, तो उन्हें प्रलोभन देते थे। किताब में इसका कच्चा चिठा है कि किस तरह उन लोगों ने भी इस अभियान की हवा निकाल देने की सुनियोजित कोशिश की, जो न्याय और कानून की बड़ी-बड़ी बातें किया करते हैं।
लेखक ने कहा है कि सितंबर 1993 से जून 1994 तक इन्होंने देश के सैकड़ों अखबारों के नाम हवाला कांड पर डाक से सामग्री भेजी, लेकिन कुछ क्षेत्रीय अखबारों को छोड़ कर किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। इस कांड के पेचीदगियों को बताने के लिए लेखक स्वयं कुलदीप नैयर, निखिल चक्रवर्ती, खुशवंत सिंह, सुमन दुबे, एच के दुआ, वी एन नारायणन, दिलीप पडगांवकर, सुनील सेठी, शैलजा वाजपेयी, अरुण पुरी और तमाम दूसरे बड़े पत्रकारों के घर और दफ्तर गये, लेकिन किसी ने अपने कॉलम में इस मामले का जिक्र नहीं किया। बहुत कहने पर कुलदीप नैयर ने चलताऊ उल्लेख कर दिया।
हालांकि सच के इस अभियान में वकील अनिल दीवान जैसे लोगों ने विनीत नारायण का साथ निभाया, तो फिल्म रिवाइजनिंग कमेटी की अध्यक्ष कमला मानकेकर, फिल्म प्रमाणन अपील पंचाट के अध्यक्ष न्यायमूर्ति बख्तावर लेंटिन आदि ने विनीत नारायण के साहस की प्रशंसा की। अलबत्ता करोड़ों रुपये हवाला के जरिए लेने के बावजूद कानून के शिकंजे में ताकतवर लोगों के न फंसने का दुख फिर भी कम नहीं होता। यह किताब देश में भ्रष्टाचार के संस्थानीकरण के बारे में जिस बेबाक ढंग से बताती है, वह स्तब्ध करती है।
किताब यह बताती है कि दिग्गज वकील राम जेठमलानी अगर हवाला मामले को खतरनाक मानते थे, तो सिर्फ इसलिए कि जैन डायरी में कांग्रेसी नेताओं के नाम थे। लेकिन अंतत: उनकी भी कोशिश इस मामले को रफा-दफा करने की ही थी। इसलिए इस मामले में उन्होंने सबसे पहले कार्टूनिस्ट राजिंदर पुरी, वकील कामिनी जायसवाल व प्रशांत भूषण को सह-याचिकाकर्ता बना दिया। कायदे से इन तीनों को लेखक के साथ सच को सार्वजनिक करने की मुहिम में जुटना चाहिए था। लेकिन वे सच को दबाने की कवायद में लग गए। अदालती कार्यवाहियों में मौजूद रहना तो दूर, ये लेखक को समझाते थे कि मामले को रफा-दफा करने में ही भलाई है।
किताब में इस बात उल्लेख है कि सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एम. एन. वेंकटचलैया ने शुरू में इस मामले का संज्ञान नहीं लिया और जिस दिन वह सेवानिवृत्ति होने वाले थे, उस दिन महज दो घंटे में वह इस मामले का निपटारा करना चाहते थे। बाद में भी इसे लगातार ठंडे बस्ते में डालने की कवायद चलती रही। अपनी तरह का यह इकलौता मामला है, जिसमें शरद यादव जैसे राजनेताओं ने हवाला के जरिए पैसे लेने की बात स्वीकार की, इसके बावजूद अदालत ने दोषियों को रिहा कर दिया।
किताब के अनुसार, समाज उत्थान के लिए हजारों सक्षम लोग भारी तकलीफ उठा कर देश के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहे हैं। क्यों न ऐसे सब जुझारू लोग मिलकर एक साथ, एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत एक राष्ट्रीय आंदोलन शुरू करें। वास्तव में इस किताब ने वर्तमान में व्यवस्था परिवर्तन, काला धन, लोकपाल व चुनाव सुधारों की बात करने वाले लोगों व संगठनों को एक दिशा दी है। इस किताब को पढ़ने से पाठक को स्पष्ट हो जाताा है कि भारत की तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था अंदर से कितनी काली और खोखली है। व्यवस्था का प्रत्येक स्तम्भ चाहे वह कार्यपालिका हो, विधायिका हो या न्यायपालिका, सभी विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहे हैं। लोकतंत्र का तथाकथित चौथा खंभा कारपोरेटवाद की चपेट में सिर्फ खबरों और मुद्दों को दबाने व जनता को भ्रमित करने का ही काम कर रहा है। देश में व्यवस्था के पांचवें खंभे के रूप में तथाकथित सिविल सोसाइटी भी लेखक के अनुसार राजनीतिक दलों व कारपोरेट समूहों के बड़े घोटालों और कारनामों से जनता का ध्यान भटकाने का सेफ्टी वाल्व मात्र हैं। पुनर्प्रकाशन समसामयिक है तथा व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ने वाले लोगों के लिए एक सबक है कि वे किस तरीके के लोगों को अपने साथ जोड़ें, किस प्रकार आंदोलन खड़ा करें और किस प्रकार सरकार व राजनीतिक दलों के खेलों को समझते हुए अपनी रणनीति बना कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें।
 

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