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Posted Mon, 02/20/2012 - 12:54 by admin

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14 फरवरी 2012 : भारत के बच्चों को कैसी भाषा में पढ़ाया जाए, इस बात की सुध हमारे मानव संसाधन मंत्रालय को अब आई है| उसने राज्यों को निर्देश भिजवाएं हैं कि बच्चों को ऐसी भाषा में पढ़ाया जाए, जो उनके घरों में बोली जाती हो|
क्या खूब सुझाव है ! इसे कहते हैं कि अकल का अतिरेक! बच्चों को सरल-सहज स्वाभाविक भाषा में पढ़ाया जाए या मातृभाषा में पढ़ाया जाए, इस सिद्घांत का पालन करने की बजाय अब यह नया मुहावरा गढ़ा जा रहा है| बोलचाल की भाषा का मतलब क्या है? न तो उसमें उच्चारण की, न व्याकरण की और न ही समझ की एकरूपता होती है| वह तो बोली होती है| अगर बोली में पढ़ाई होगी तो ये बच्चे आगे जाकर ऐसी भाषा का प्रयोग करेंगे, जो एक-दूसरे को समझ में ही नहीं आएगी| यह संवाद की अराजकता बन जाएगी| बोली हुई और लिखी हुई भाषाओं में सदा गहरा अंतर होता है| उस अंतर को ध्यान में रखते हुए ही बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए|
लेकिन बोली हुई भाषा में पढ़ाने का आग्रह करनेवाले अफसरों का हमें स्वागत करना होगा, क्योंकि कुल मिलाकर उनका आग्रह मातृभाषाओं पर आकर ही टिकेगा| इस देश में जब तक उन सब स्कूलों पर प्रतिबंध नहीं लगेगा, जो बच्चों को विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाते हैं, मातृभाषा के माध्यम की पढ़ाई अच्छी हो ही नहीं पाएगी| हमारे केंद्र और राज्य के शिक्षा मंत्रालयों का बर्ताव किसी गुलाम देश के शिक्षा-मंत्रालयों की तरह रहा है| उन्होंने अंग्रेजी माध्यम के तथाकथित पब्लिक स्कूलों का कभी विरोध ही नहीं किया| सारी दुनिया के महान शिक्षाविदों की राय है कि बच्चों को विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाने पर उनकी बुद्घि कुंठित हो जाती है, उनकी मौलिकता नष्ट हो जाती है, वे रट्टू-तोते बन जाते हैं| यूरोप के बच्चों पर जब अंग्रेजी थोपी गई तो मालूम पड़ा कि ज्यादातर बच्चों को अनिद्रा, विस्मरण और कंपन आदि की बीमारियां हो गई| हमारे देश में तो जिन बच्चों पर अंग्रेजी थोपी जाती है, उन्हें एक भयंकर रोग हो जाता है| उसका नाम है, उच्चता ग्रंथि! इस उच्चता के अभिमान में वे अपने देश, परिवार और माता-पिता से भी कट जाते हैं| वे भारतीय नहीं रहते| वे इंडियन बन जाते हैं| इसी गलत शिक्षा नीति के कारण हमारे एक देश में दो देश खड़े हो गए है| ‘शिक्षा मंत्रालय’ का नाम बदलकर मानव संसाधन मंत्रालय कर दिया गया| मनुष्य को जो साध्य नहीं, साधन बना दे, क्या हम उसे शिक्षा कहेंगे? शिक्षा के नाम पर देश में अशिक्षा फैलानेवाले हमारे नेताओं ने ज्ञान आयोग भी बनाया है, जिसका काम देश में अज्ञान फैलाना है| देश में अशिक्षा और अज्ञान फैलानेवाले नेताओं से जब तक छुटकारा नहीं होगा, हमारे बच्चों की पढ़ाई नहीं सुधरेगी|

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