
Posted Wed, 02/01/2012 - 23:14 by admin
ग्रेग शील्डन
क्या भारत सचमुच चीन से बहुत पीछे है? सामान्य विश्लेषक यही अनुमान लगाते हैं, मगर
चीन चिन्तित है। लोकतांत्रिक परिवेश में भारत का तेजी से होता विकास चीन के लिए बड़ी
चुनौती है और वह भारत को हर क्षेत्र में अपना प्रबल प्रतिद्वंद्वी मानने लगा है। एक
विश्लेषण।
चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी का पानी रोकने और भारत पर हमले की तैयारी करने को लेकर
कुछ समय पहले उठी चिंता की लहर संसद तक पहुंची और पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह
यादव ने तो यहां तक कह दिया कि उन्हें इस बात की पक्की जानकारी है कि चीन भारत पर
हमला करने वाला है। इसके जवाब में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें आश्वस्त किया
कि घबराने की कोई बात नहीं क्योंकि चीन हमला नहीं करने वाला है। उन्होंने पानी रोकने
संबंधी खबरों को बेबुनियाद करार दिया और कहा कि इस संबंध में उनकी बीजिंग से बात
हुई है। मनमोहन सिंह ने यह भी कहा कि संबंधों को मजबूती देने के लिए भारत ने हमेशा
से ही बातचीत को काफी अहमियत दी है और अब भी चीन के साथ भारत की बातचीत चल रही है।
प्रधानमंत्री की सफाई के बावजूद चीन को लेकर तमाम चिंताएं और आशंकाएं बरकरार हैं।
एक महाशक्ति का उदय हमेशा से बड़ा ही अनजाना और परेशान करने वाला रहा है। इस पूरी
प्रक्रिया के दौरान जमकर चीखें निकलती हैं और गहरे दर्द का सामना करना पड़ता है। ये
बातें इस प्रक्रिया में निहित होती हैं लेकिन इसके बावजूद कुछ अच्छी चीजें कभी-कभार
दिख जाती हैं। बात द्वितीय विश्व युद्ध से पहले की है। पश्चिम बंगाल की मौजूदा
राजधानी कोलकाता पर उस वक्त आस्ट्रेलिया के रिचर्ड कैसी का शासन था। एक शहर के तौर
पर कोलकाता में भी आपका सामना उन सभी मुश्किलों से होगा जिनसे किसी दूसरे भारतीय
शहर में दो-चार होना पड़ता है। हवाईअड्डे के नजदीक साल्ट लेक में बहुमंजिली इमारतों
और आईटी क्षेत्र के कार्यालयों की भरमार है। वहीं दूसरी ओर सिटी सेंटर के ओबरॉय
होटल को देखकर ऐसा लगता है कि अंग्रेजों के जमाने की हर एक चीज को बड़ी खूबसूरती से
संवारकर रखा गया है।
कई दशकों तक वामपंथियों का राज इस राज्य पर रहा है। उनके राज में कोलकाता ने उस गति
से तरक्की से नहीं की जितनी दूसरों शहरों ने की। ओबरॉय से थोड़ी ही दूरी पर लोग
फुटपाथ पर जीवन बसर करने के लिए मजबूर हैं। बदहाली का आलम यह है कि उस इलाके में
मांएं अपने बच्चों को खुले में नहलाते दिख जाएंगी। अधेड़, बेघर और भूखे लोग पार्कों
में बने फुटपाथ और शेड्स पर सोते दिख जाएंगे। हर रविवार को वहां हर तरफ लोग क्रिकेट
खेलते दिख जाएंगे।
पर सतह पर दिख रही इन गड़बड़ियों से कोई नतीजा मत निकालिए क्योंकि बगैर आर्थिक सुधारों
की गाड़ी को आगे बढ़ाए भारत की अर्थव्यवस्था अगले दो दशक तक सात या आठ फीसदी की
रफ्तार से विकास करने वाली हैै। इस तरह से भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में तीसरी
सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। रक्षा मंत्री स्टीफन स्मिथ ने कहा भी था कि २१वीं
सदी में तीन ही महाशक्तियां होंगी- अमेरिका, चीन और भारत। पर यह मत सोचिए कि यह सफर
इतना आसान है।
अभी पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन हैं। वे सिविल सेवा के अधिकारी रहे हैं
और वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर भी काम कर चुके हैं। बीते दिनों उन्होंने
मेलबर्न विश्वविद्यालय के ऑस्ट्रेलिया इंडिया संस्थान द्वारा एशियाई सदी पर आयोजित
एक कांफ्रेंस का उद्घाटन किया। यहां उन्होंने मुख्यत: दो बातें कहीं। पहली बात तो
यह कि भारत के उभार से ऑस्ट्रेलिया के चिंतित होने का कोई आधार नहीं है। दूसरी बात
उन्होंने जो कही वह चीन से संबंधित है। उन्होंने कहा कि चीन अंतरराष्ट्रीय कायदों
का पालन नहीं करता। उन्होंने जो बात कही वह सोलह आने सच है।
हर किसी को इस बात का अहसास है कि आने वाले दिनों में किस तरह की रणनीतिक
प्रतिस्पर्धा दिखने वाली है। क्योंकि पहले से स्थापित महाशक्तियों को नए
महाशक्तियों के लिए जगह बनाने में तकलीफ होगी। हर कोई यह मानता है कि चीन के लिए
जगह बनाने में अमेरिका को दिक्कत होगी। पर जहां तक तनाव और टकराव की सबसे अधिक
आशंका वाली स्थिति की बात है तो यह चीन की तरफ से होने की संभावना है। क्योंकि चीन
के लिए भारत के उभार को पचा पाना आसान नहीं होगा।
चीन और भारत के संबंध के कई परत हैं और यह बेहद पेचीदा भी है। पर दोनों देशों के
बीच जमकर कारोबार हो रहा है। पिछले साल दोनों देशों के बीच ८५ अरब डॉलर का कारोबार
हुआ था। इससे दोनों पक्षों को फायदा हो रहा है। एशिया में भारत के अलावा कोई और ऐसा
देश नहीं है जो चीन को रणनीतिक टक्कर दे सके। दोनों देशों के अंतर्विरोधों पर भी
चर्चा होती है। भारत जहां एक लोकतंत्र है तो वहीं चीन में मोटे तौर पर एक वामपंथी
तानाशाही का राज है।
चीनी मॉडल के समर्थकों का तर्क है कि सरकारी निर्णय प्रक्रिया आसान होने की वजह से
चीन को आर्थिक लाभ मिल रहा है। वहीं भारतीय मॉडल के समर्थकों का तर्क है कि भले ही
तानाशाही स्थायी दिखे लेकिन भविष्य तो लोकतंत्र का ही होता है। भारत में युवाओं की
बड़ी आबादी इस बात का संकेत देती है कि भारत विकास की रफ्तार को चीन से कहीं ज्यादा
लंबे समय तक बनाए रख सकेगा।
एशिया के इन दो बड़ी ताकतों के बीच भू-रणनीतिक टकराव पर ज्यादा बातचीत अभी नहीं की
जा रही है। भारतीय दृष्टि से देखें तो बीजिंग दशकों से भारत को कमजोर बनाए रखने की
कोशिश करता रहा है। ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान में भारत के राजदूत रहे जी
पार्थसार्थी कहते हैं, 'परमाणु हथियारों और मिसाइलों को सबसे ज्यादा बढ़ावा देने
वाला देश आज चीन बन गया है। पिछले चार दशकों में चीन ने पाकिस्तान को न सिर्फ
परमाणु हथियारों के डिजाइन दिए हैं बल्कि यूरेनियम संवर्धन से संबंधित उपकरण भी दिए
हैं। हाल के सालों में चीन ने पाकिस्तान को प्लूटोनियम रिएक्टर दिए हैं ताकि चीन के
मिसाइलों में प्लूटोनियम का इस्तेमाल हो सके। चीन और पाकिस्तान के बीच इस परमाणु
सहयोग की वजह से पाकिस्तान इतना सक्षम हो गया कि उसने उत्तरी कोरिया, लीबिया और
इरान तक परमाणु तकनीक पहुंचाने का काम किया।Ó वे कहते हैं, 'चीन ने ये कदम भारत को
ध्यान में रखकर उठाए हैं। भारत से निपटने के लिए पाकिस्तान चीन का एक औजार है।Ó
हालांकि, हर भारतीय चीन के बारे में वही राय नहीं रखता जिस तरह की राय पार्थसार्थी
रखते हैं। पर इस बात को लेकर मोटे तौर पर एक सहमति दिखती है कि चीन ने ऐसे कई काम
किए हैं जिससे भारत को हमेशा पश्चिमी सीमा पर दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।
भारत में माओवाद की समस्या दिनोंदिन गहराती जा रही है। पूर्वोत्तर भारत में इनकी
जड़े सबसे अधिक मजबूत हैं। इस बारे में साउथ एशियन इंटेलीजेंस रिव्यू के संपादक और
इंस्टिट्यूट फॉर कॉन्फिलिक्ट मैनजमेंट के निदेशक अजय साहनी कहते हैं, 'माओवादियों
के साथ चीनी सरकार की कोई सीधी संलिप्तता नहीं है। माओवादी अभी के चीन को खारिज
करते हैं। वे माओ के जमाने के चीन से पे्ररणा पाते हैं।Ó पर चीन कुछ उन विद्रोहियों
का जरूर समर्थन करता है जो उत्तरपूर्व भारत में चीन और बर्मा की सीमा से सटे इलाकों
में हिंसा करते हैं।
साहनी कहते हैं, 'ऐसे ही विद्रोहियों के जरिए कुछ चीनी हथियार माओवादियों के हाथ लग
जाते हैं। इन विद्रोहियों को निश्चित तौर पर चीन से कोई न कोई संबंध है। इनमें से
कुछ संगठनों के लिए सुरक्षित ठिकाने का काम भूटान, बांगलादेश और नेपाल थे। अब इन
देशों ने अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं। अब ये समूह म्यांमार यानी बर्मा का रुख कर
रहे हैं जहां वे आसानी से चीनी सरकार की शह पा सकते हैं।Ó
वरिष्ठ रणनीतिक विश्लेषक प्रवीण स्वामी भी कहते हैं कि कुछ नगा विद्रोहियों को चीन
से हथियार मिल रहे हैं और उनके जरिए ये हथियार भारत के माओवादियों तक पहुंच रहे
हैं। वे कहते हैं, 'जब भी इस मसले को चीन सरकार के सामने उठाया जाता है तो उनका
जवाब होता है कि ये तो ब्लैक मार्केट के हथियार हैं। पर जानकार तो यह बताते हैं कि
ये वहीं हथियार हैं जो चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी रखती है।Ó
हवाई के एक थिंक टैंक के साथ जुड़े मोहन मल्लिक ने भारत-चीन संबंधों पर एक किताब
लिखी है- चाइना ऐंड इंडिया: ग्रेट पावर राइवल्स। यह पुस्तक बड़ी चर्चित रही है।
मल्लिक का मानना है कि चीन भारत के उभार को रोकने की कोशिश कर रहा है। वे मानते हैं
कि चीन की सहमति से ही पाकिस्तान परमाणु तकनीक उत्तरी कोरिया और ईरान तक पहुंचाने
का काम कर रहा है। मल्लिक यह भी बताते हैं कि चीन ने रणनीतिक ढंग से भारत को चौतरफा
घेर रखा है। वे लिखते हैं, 'चीन से हथियार खरीदने के मामले में पांच सबसे बड़े
खरीदार पाकिस्तान, बर्मा, बांग्लादेश, ईरान और श्रीलंका हैं। ये सभी देश भारत के
पड़ोसी हैं।Ó
२००६ से ही चीन ने अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत से सटे अन्य इलाकों में स्वायत्ता की
मांग को हवा देने का काम लगातार किया है। चीन अब तक कश्मीर के उस हिस्से पर कब्जा
जमाए हुए है जिसे उसने भारत के साथ १९६२ की लड़ाई में हड़पा था। २००६ तक वैश्विक
पर्यवेक्षकों को यह लगता था कि दोनों देशों के बीच ये मसले सुलझ गए हैं और दोनों
देश मौजूदा नियंत्रण रेखा को ही सम्मान करने पर राजी हो गए हैं। मल्लिक का मानना है
कि चीन का गश्ती दल जानबूझकर भारत की सीमा में घुसता है। भारत के रणनीतिक
विश्लेषकों का मानना है कि चीन ऐसा इसलिए करता है ताकि वह दिल्ली तक अपने असंतोष के
संदेश को पहुंचा सके। पर यह एक खतरनाक खेल है। भारत ने चीन के सीमा पर सैनिकों की
संख्या बढ़ा दी है और वहां सुखोई लड़ाकू विमान तैनात कर रखे हैं।
मल्लिक लिखते हैं कि भारत को लेकर बीजिंग की रणनीति के तीन हिस्से हैं। इनमें पहला
है तिब्बत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, बर्मा और हिंद महासागर में
रणनीतिक मौजूदगी के जरिए भारत की घेराबंदी करना। चीन की दूसरी कोशिश यह है कि भारत
के सभी पड़ोसियों को वह अपने साथ और मजबूत ढंग से जोड़ सके। चीन की तीसरी रणनीति है
भारत को आंतरिक अंतरविरोधों और कई सुरक्षा खतरों में ही उलझाए रखने की।
ऐसा नहीं है कि भारत इन सबसे अनजान है। भारत भी अमेरिका के साथ सैन्य रिश्तों को
गहराता जा रहा है। दक्षिणी चीन समंदर में भारत ने भी अपने नौ सेना को उतार दिया है।
चीन वियतनाम जैसे पड़ोसियों को करीब लाने की कोशिश भी भारत कर रहा है। जैसे-जैसे
भारत की अर्थव्वयव्था का विकास हो रहा है वैसे-वैसे उसके रणनीतिक विकल्प भी बढ़ते जा
रहे हैं। जब भारत ने १९९८ में परमाणु परीक्षण किया था तो उस वक्त भारत ने चीन को
सबसे बड़ा खतरा बताया था।
क्या ऑस्ट्रेलिया के लिए इसका कोई मतलब बनता है? जाहिर है कि भारत और चीन के इस
आपसी विवाद में ऑस्ट्रेलिया नहीं फंसना चाहेगा। पर ऐसा लगता है कि भारत और
ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ती रणनीतिक नजदीकी की वजह से चीन चिंतित है। बीजिंग ने भारत
और अमेरिका के बीच हो रहे परमाणु समझौते को रोकने की भी कोशिश की थी और ऑस्ट्रेलिया
द्वारा भारत को यूरेनियम बेचने के फैसले पर भी उसने नाराजगी जाहिर की थी। बीजिंग को
ये बड़ा अखरता रहा है कि एशिया में किसी 'बाहरीÓ ताकत की सक्रियता बढ़े।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को रोका
नहीं जा सकता। कम से कम इतना तो मानना ही चाहिए कि २१वीं सदी में जो वैश्विक
राजनीति होगी उसके केंद्र में इन दो देशों की आपसी राजनीति रहेगी।
(ग्रेग शील्डन ऑस्ट्रेलियन के विदेश मामलों के संपादक हैं।)
सरहद पर सरगर्मियां
आपसी विवाद के कांटेदार रास्तों से गुजरते हुए भारत और चीन ने सरहद पर तनाव घटाने
के मकसद से सीमा प्रबंधन तंत्र गठित करने पर सहमति बना ली है। दोनों देशों की विशेष
प्रतिनिधि स्तर की 15वें दौर की वार्ता के अंतिम दिन इस तंत्र को स्थापित करने पर
सहमति बनी। चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की ओर से प्रस्तावित इस वर्किंग तंत्र को
वजूद में लाने पर मुहर भारतीय विशेष प्रतिनिधि शिवशंकर मेनन और उनके चीनी समकक्ष
दाई बिंगुओ के बीच वार्ता के अंतिम दिन लगी। लेकिन चीन के साथ शांति के भारत सरकार
के दावे केवल जबानी और कागजी ही हैं क्योंकि 2010 से 2011 के बीच चीन के साथ लगती
सीमा पर चीनी सेना के घुसपैठ करने की सात सौ से अधिक घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें
से 400 से अधिक घटनाओं की सूचना जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र से मिली है। 15
अगस्त, 2011 को 44 चीनी सैनिकों ने भारतीय क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश के असाफिला इलाके
में तीन किलोमीटर अंदर आकर टेंट स्थापित किए थे।
लेकिन भारत कहता है कि चीन के साथ लगी सीमा सबसे शांत है। विदेश मंत्रालय के
आधिकारिक प्रवक्ता का बयान था कि चीन के साथ हमारी लंबी सीमा है। चीन के साथ
वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) अभी तक सीमांकित नहीं है और इसलिए, चूंकि रेखा
सीमांकित नहीं है, अवधारणा में मतभेद है जो बहुत स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि
समय-समय पर गश्ती दल भटक जाते हैं। यह कोई नया नहीं है। यह होता है, लेकिन जब होता
है, वे अपने क्षेत्र में लौट जाते हैं। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, इस तंत्र को
सरहद विवाद को निर्णायक तरीके से सुलझाने या मौजूदा विशेष प्रतिनिधि मैकेनिज्म को
प्रभावित करने का अधिकार नहीं दिया जा रहा है। दोनों देशों के बीच सीमा पर भारत और
चीन के बीच हुए पुराने समझौते के तहत शांति बनाए रखने की दिशा में प्रयास इस तंत्र
के जरिये होंगे। वर्किंग मैकेनिजम दोनों देशों के बीच सीमा पर सैन्य सहयोग और
एक्सचेंज को मजबूत करने के उपायों और तरीकों का अध्ययन भी करेगा। भारतीय विदेश
मंत्रालय के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी और चीनी विदेश मंत्रालय के महानिदेशक
स्तर के अधिकारी इसके प्रमुख होंगे। इसमें दोनों तरफ से राजनयिक और सैन्य अधिकारी
भी रहेंगे। विदेश मंत्रालय ने बताया कि वर्किंग मैकेनिजम सीमावर्ती इलाकों में
दोनों ओर ऐसी गतिविधियों या मुद्दों का निपटारा करेगा जो सरहद पर शांति भंग करते
हों। इसका लक्ष्य दोनों देशों के बीच तनाव पैदा होने के सीमा पर उपजने वाले कारणों
पर काबू पाने का भी होगा। साल में एक या दो बार यह तंत्र चर्चा करेगा जो भारत और
चीन में बारी-बारी से होगी। अगर जरूरत हुई तो आपातकालीन बैठक भी आपसी सहमति से
बुलाई जा सकती है। इसके साथ ही दोनों पक्षों ने एलएसी को लेकर आपसी सहमति का सम्मान
करने में ही दिलचस्पी दिखाई है।
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