
Posted Mon, 02/20/2012 - 12:38 by admin
15 फरवरी 2012 : भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन को लेकर उच्चतम
न्यायालय ने केंद्र सरकार के कान खींच दिए हैं| अदालत ने सरकार से पूछा है कि दस
महीने बीत गए लेकिन उसने अभी तक यह क्यों पता नहीं लगाया कि बालकृष्णन के पास अकूत
संपत्ति कहां से आई? बालकृष्णन की अकूत संपत्तियों का कई अखबारों ने भांडाफोड़ कर
रखा है लेकिन सरकार की कान पर कोई जूं रेंगती नहीं दिखाई पड़ती| इसका अर्थ क्या है?
सरकार बालकृष्णन के ‘सदाचार’ पर पर्दा डाले रखना चाहती है| इसका एक अर्थ यह भी है
कि बालकृष्णन ने न्याय को दरकिनार करके सरकार के पक्ष में कई फैसले किए होंगे| ऐसे
मुख्य न्यायाधीश पर यह सरकार हाथ कैसे डाल सकती है? पहले इस न्यायाधीश ने सरकार पर
मेहरबानियां की और अब सरकार उस पर मेहरबानियां कर रही है| बालकृष्णन को सरकार ने
मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बना रखा है| इन्हीं कारणों के चलते वकील शांतिभूषण ने
लिखित में आरोप लगाया था कि हमारे लगभग आधे न्यायाधीश भ्रष्ट रहे हैं| यदि यह आरोप
गलत होता तो जो पूर्व मुख्य न्यायाधीश अभी जीवित हैं, वे या तो शांतिभूषण को जेल
भिजवा देते या आत्महत्या कर लेते या आमरण अनशन करके अपने प्राण दे देते| लेकिन इस
मुद्दे पर सब चुप है| बालकृष्णन पर इतना गंभीर आरोप है और वे भी चुप है| क्या यह
उनकी मानहानि नहीं है? अब तो उनकी अपनी अदालत ने ही उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया
है|www.vpvaidik.com
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