
Posted Tue, 12/27/2011 - 16:56 by admin
प्रिय दोस्तों,
अब पार्टियों के टिकट लेना बड़ा खेल बन गया है। टिकट के इच्छुक व्यक्ति को अनेक
जनसभाएं, कार्यक्रम, भोज, चंदा बाँटना, शराब पिलाना, पार्टी फंड में चंदा देना,
प्रमुख नेताओं के घरों पर चक्कर काटना, उन्हें नकद धनराशि देना, स्थानीय स्तर पर
चमचों-समर्थकों को पाल कर रखना, वोट बनवाना, विरोधियों के दांव-पेंच काटने के उपाय
करना, चुनाव के समय वोटरों को नकद पैसे, शराब, भोजन इत्यादि देना, पोस्टर, बैनर,
झंडे, बोर्ड, अखबारों-टीवी आदि में विज्ञापन देना, पत्रकारों को खरीद कर श्पेड
न्यूज्य छपवाना, विभिन्न प्रभावी समूहों, जाति समूहों आदि को अपने पाले में करना,
सरकारी मशीनरी को अपने पक्ष में करना जैसे तिकड़म करने पड़ते हैं। इस सब के लिए करोड़ों
रुपये खर्च करने पड़ते हैं। मात्र उत्तर प्रदेश के चुनावों में चुनाव आयोग ने दस
हजार करोड़ से ज्यादा काला धन खर्च होने का अनुमान लगाया है। क्या कोई है इसे रोकने
वाला?
क्या ट्रांस्फर-पोस्टिंग का धंधा बंद हो सकेगा? जानकार मानते हंै कि पीसीएस अधिकारी
मलाईदार पोस्टरों के लिए 10 से 20 लाख रुपये सत्तारूढ़ सरकार के मुखिया को देते हैं,
वहीं आईएएस अधिकारियों के मामलों में यह राशि करोड़ों रुपये होती है। अधिकांश
राजनीतिक पदों (निगमों, निकायों के पदाधिकारियों) की तो खुली बोली लगती है।
जाति-धर्म व परिवार के लोगों को प्रमुखता दी जाती है। भर्ती बोर्डों की परीक्षाओं
में राजनीतिक आकाओं के इशारे पर धांधलियां की जाती हैं तथा अराजपत्रित पदों तक की
भर्तियां 5 से 10 लाख रुपये तक लेकर की जाती हैं। भ्रष्ट रास्तों से पहुँचे लोगों
से कैसे सुशासन की अपेक्षा की जा सकती है। क्या हमारे नये नेता इसे बदल सकेंगे?
येन केन प्रकारेण चुनाव जीता प्रत्याशी अगले पाँच साल अपनी लागत वसूली, अगले चुनाव
का खर्च, व्यक्तिगत लाभ और पार्टी फंड व नेताओं को हिस्सा देने के उपायों में लग
जाता है। विधायक निधि सामान्यतरू 30 से 50 प्रतिशत कमीशन लेकर जारी की जाती है।
विधान सभा क्षेत्र के सभी थानों में विधायक की दलाली चलने लगती है। हत्या, डकैती,
बलात्कार, जमीन व औद्योगिक विवादों में विधायक व पुलिस मिल कर कमाते हैं, क्षेत्र
के सभी उद्योगों व व्यापारियों से मासिक वसूली की जाती है, सभी मंडी समितियों, अनाज
खरीद केन्द्रों व सस्ते राशन की दुकानों पर विधायक अपना स्वाभाविक हक समझता है और
किसानों से सीधा व सस्ता अनाज आदि खरीदकर ऊँचे दामों पर इन केन्द्रों को बेचता है
और सब्सिडी वाले सामान की फर्जी बिक्री दिखाकर इन्हें बाजार के ऊँचे दाम पर बेच कर
बड़ी कमाई करता है। विवादित सम्पत्तियों, ग्राम सभा की जमीनों व गरीब@छोटे किसानों
की जमीनों पर जबरन कब्जे किये जाते हैं। विभिन्न समाज कल्याण की योजनाओं में अफसरों
के साथ मिलकर भारी फर्जीवाड़े किये जाते हैं। सभी सरकारी ठेके अपने लोगों को दिलाना,
ठेकेदारों से कमीशन वसूला, विकास कार्यों के लिए आये धन में बंदरबांट करना आदि
स्थानीय आमदनियां हैं। एक शातिर विधायक 100 करोड़ रुपये सालाना तक बना सकता है, है
कोई इसे रोकने वाला?
यदि विधायक सत्तारूढ़ दल का है और किसी मंत्रिमंडलीय समिति, निगम, बोर्ड, संघ आदि का
सदस्य बन गया तो बल्ले-बल्ले और मंत्री बन गया तो चाँदी ही चाँदी। लूट-खसोट, माल
बनाना और फर्जी कम्पनियां बनाकर पैसे ठिकाने लगाना। शेयर, सोना, जमीन, मॉल आदि में
निवेश तो पुरानी बातें हैं। अब अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, विश्वविद्यालय, तकनीकी
संस्थान, बड़ा उद्योग, व्यापार आदि खोलकर एक श्कारपोरेट हाउस्य के रूप में खड़ा हो
जाना आम बात है। कोई है जो इस कुचक्र को तोड़ सके?
सारे प्रदेश (कुछ शहरों को छोड़ कर) अव्यवस्था, कुशासन व खराब आधारभूत ढांचे का
शिकार हैं। बेरोजगारी, अशिक्षा व अंधविश्वास, जाति, धर्म, भाषा व क्षेत्रों के आधार
पर बँटा समाज एक कड़वा सच है। आधी जनता कुपोषित है और नारी, पुरुष की अधिनायकवादी
मानसिकता का शिकार, गुलामों सी जिंदगी जी रही है। जनता का बौद्धिक विकास निम्न स्तर
का है और स्कूल व अस्पताल नेता-अफसर गठजोड़ की खुली लूट का जीता जागता उदाहरण हैं।
यह गठजोड़ विकास की राह में आगे बढ़ने को इच्छुक समाज को भ्रष्ट बनने के लिए प्रेरित
करता है। फिर अपने जाल में उसे फंसा कर भ्रष्ट बना देता है और यह स्थापित करने की
कोशिश करता है कि जनता ही भ्रष्ट है, हम क्या कर सकते हैं? कौन पहल करेगा इसे बदलने
की?
राज्यों में मुख्यमंत्री तानाशाह के रूप में राज कर रहे हैं। ये लोग प्रदेश के
बदहाल ढांचे को सुधारने की जगह नये प्रोजेक्टों, मोटे कमीशन, खनिज, जमीन व अन्य
संसाधनों को खुली लूट में संलग्न एक संगठित गिरोह के मुखिया जैसे लगते हैं। लाचार व
बिकी हुई नौकरशाही व मीडिया उनकी इन्हीं कारगुजारियों को विकास की नई दिशा,
रचनात्मक बदलाव व दूरगामी नीति, सोशल इंजीनियरिंग, आधारभूत विकास, सस्टेनेबल
डेवलपमेंट आदि-आदि नामों से सुशोभित कर जनता को भरमाता रहता है। कोई है इस नियति से
जनता को निकालने वाला?
राज्यों में किसी भी दल की सरकार या गठबंधन हो, सबका केन्द्र में सत्तारूढ़ दलों से
एक गोपनीय समझौता होता है और इसके तहत बड़े सौदों, प्रोजेक्ट, ठेके, योजनाओं आदि में
हित व कमीशन साझा किये जाते हैं। यहाँ पर बंदरबांट व खेल लाखों करोड़ों में पहुँच
जाते हंै और फिर एक बड़ी नामावली सामने आती है जैसे कालाधन, मनी-लाडरिंग, स्विस
बैंक, हवाला, संदिग्ध सौदे, सट्टा, शेयर बाजार, मैच फिक्सिंग के खेल, मुद्रा बाजार,
शेयर, सोने व जमीन के दामों में उतार-चढ़ाव और पैसे से पैसा कमाने के खेल में
आतंकवादी गतिविधियों, ड्रग्स, पोर्नाेग्राफी, स्मग्लिंग, हथियारों व रक्षा सौदे,
दूसरे देशों में अस्थिरता पैदा करना, सरकारें बनाना-गिराना, अन्तरराष्ट्रीय महत्व
की वस्तुओं के दाम बढ़ाने गिराने का खेल चल निकलता है। कौन दिलायेगा मुक्ति?
सच तो यही है कि भारत में लोकतंत्र का व्यावहारिक अर्थ सुशासन व कानून का शासन नहीं
है। यह दबंगों के संगठित गिरोहों की आपसी लड़ाई को नियंत्रित करने का उपकरण मात्र है
ताकि सब बारी-बारी से लूट सकें। अगर हम मुक्तिदूत के इंतजार में बैठे हैं तो कृपया
इस दिवास्वप्न से बाहर निकल आयें।
अनुज अग्रवाल
संपादक
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