
Posted Tue, 01/17/2012 - 17:44 by admin
17 जनवरी 2012 : भूख और शिक्षा के मामले में भारत का हाल क्या है? हमारे सरकारी
नेता यह कहते नहीं अघाते कि भारत की प्रगति-दर दुनिया की सबसे तेज दरों में है| हम
महाशक्ति बनने जा रहे हैं| हमारी कुल राष्ट्रीय संपदा कुलांचे भर रही है| हमारे देश
में बड़े-बड़े भवनों, सड़कों, हवाई अड्रडों, हवाई जहाजों, कारों और मॉलों का अंबार
लगता चला जा रहा है| लाखों भारतीय गर्मियों की छुट्टी मनाने अब विदेशों में जाते
हैं| जितना पैसा विदेशी बैंकों में भारतीयों का जमा है, किसी अन्य देशवासियों का नहीं
है। यह भारत का स्वर्ण-युग है| ये तथ्य सही हैं लेकिन यह पूरी हकीकत नहीं है| क्या
हम कभी चित्र का दूसरा पहलू भी देखते हैं?
भारत में 23 करोड़ लोग रोज़ भूखे पेट सोते हैं और 80 करोड़ से ज्यादा लोग सिर्फ
20-25 रू. रोज़ पर गुजारा करते हैं? क्या भारत के इतिहास में कभी कोई ऐसा समय हम
जानते हैं, जिसमें इतने लोग (या इसी अनुपात में) भूखे मरते रहे हों या देश में पैदा
होनेवाले लगभग आधे बच्चों को दूध, फल तथा अन्य पौष्टिक आहार उपलब्ध न हो? क्या हमें
किसी गणतंत्र्, राजतंत्र या विदेशी शासन का ऐसा समय याद पड़ता है, जब हजारों किसान
सिर्फ इसलिए आत्महत्या करते हों कि वे कर्ज नहीं चुका पा रहे हों।
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