बिहार में राहुल फैक्टर काम नहीं करने वाला

जनता दल यू अध्यक्ष एवं एनडीए संयोजक शरद यादव से बातचीत

खांटी समाजसेवी नेता और विपक्ष की धुरी माने जाने वाले शरद यादव सितंबर के पहले पखवाड़े में बिहार विधानसभा चुनावों के लिए अपनी पार्टी जनता दल यूनाइटेड की उम्मीदवारों की सूची फाइनल करने में खासे व्यस्त थे। तुगलक रोड स्थित दिल्ली में उनके सरकारी आवास पर बिहार से आये नेताओं की भीड़ वापस लौट चुकी थी। बंगला में आमतौर पर शांति छाई हुई थी। अंदर ड्राइंग रूम में वह बिहार विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों की सूची को लगभग अंतिम रूप देने की तैयारियों में बिजी थे। उनसे बातचीत में जीत को लेकर उनका आत्मविश्वास जहां साफ नजर आया वहीं उन्होंने माना कि असली लड़ाई तो जेडीयू और लालू यादव की आरजेडी के बीच ही है। बीजेपी को लेकर वह आमतौर पर किसी भी टिप्पणी से बचते रहे। अलबत्ता कांग्रेस को इन चुनावों में उन्होंने एक सिरे से खारिज कर दिया। बल्कि वह राहुल गांधी के बिहार दौरों का मजाक अधिक दौड़ाते लगे। उनका साफ कहना था न तो बिहार में राहुल फैक्टर काम करेगा और न ही सर्व प्रचारित जाति फैक्टर। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश सरकार के कामकाज पर उन्होंने बेशक खुलकर तारीफों के पुल नहीं बांधे लेकिन जताते रहे कि नीतीश जी ने विकास का काफी काम किया है और उनकी पार्टी इस बिना पर जीतकर दोबारा सत्ता में आयेगी। शरद यादव से डायलाग इंडिया के संपादक अनुज अग्रवाल की बातचीत

विधानसभा चुनाव को लेकर आप जनता दल यू और बीजेपी के गठबंधन का क्या भविष्य देखते हैं क्या एनडीए फिर से सत्ता में आयेगा?
गठबंधन तो हो चुका है। ये पहले से तय था। रही बात भविष्य की तो हम सत्ता में आएंगे। हमारी जीत तय है।
क्या लगता नहीं कि पार्टी के भीतर और बाहर सरकार के विरोध में काफी स्वर हैं और कुछ लोगों ने चुनाव के करीब आते ही पार्टी भी छोड़ी है?
चुनाव के करीब आने पर ये सब होता ही है। इसमें कोई नई बात नहीं है। हर पार्टी में असंतुष्ट तबका होता है। असंतुष्ट तो हर पार्टी से अलग हो रहे हैं, हमारी पार्टी भी अपवाद नहीं, लेकिन एक दो नेताओं के नाराज होने का मतलब कोई खास नहीं होता।

इन चुनावों को नीतीश बनाम लालू के रूप में देखा जा रहा है और पार्टी व सहयोगी दल हाशिये पर आ गये हैं?
देखिये ऐसा नहीं है इन चुनावों को इस तरह देखने के बजाये ये मानिये कि असली लड़ाई दो मोर्चों के बीच है, एक मोर्चा जेडी यू और बीजेपी का है और उनके मुकाबले में लालू की आरजेडी और पासवान की एलजेपी है। असली लड़ाई जेडीयू और आरजेडी में ही है। लेकिन ये भी कहूंगा कि लालू को लेकर माइंडसेट बनाने की जरूरत नहीं। चुनाव परिणाम सामने आते ही पता चल जायेगा कि कौन कहां है।

लालू - पासवान के यादव, दलित, ठाकुर और मुसलमान वोटों के ध्रुवीकरण का आपके पास क्या जवाब है?
ये आप लोगों की गलतफहमी है कि चुनावों में जाति आधारित ध्रुवीकरण होगा। दूसरा ये कि हमें सभी का समर्थन हासिल है, क्योंकि हमने काम किया है। जाति बड़ा मुद्दा नहीं है बल्कि विकास असली धुरी है, हो सकता है जातिगत समीकरण कुछ भूमिका निभायें लेकिन असली धुरी वाला मुद्दा विकास ही है।

लेकिन कहा तो ये जा रहा है कि कुछ जातियां आपसे नाराज हैं?
ये गलत है। एक दो नेताओं की नाराजगी को जातियों से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।

माना जा रहा है कि बिहार में मुसलमान आपके साथ नहीं है, उसका समर्थन आपके मोर्चे को नहीं मिलने वाला?
मुसलमान हमसे दूर नहीं हैं। और हमसे कोई अछूता भी नहीं। ये कहना कि मुसलमान हमारे साथ नहीं हैं, न केवल गलत है बल्कि पुराना परसेप्शन है। हमने मुसलमानों के लिए बहुत किया है और वो इस बात को नहीं भूलेंगे।

आप कांग्रेस को मुकाबले में क्यों नहीं गिन रहे, वहां तो राहुल गांधी ने काफी दौरे किये हैं और इसमें काफी भीड़ भी जुटी है?
ये केवल मीडिया का प्रोपोगेंडा है। राहुल फैक्टर वहां कोई काम नहीं करने वाला। उन्होंने भानुमति का कुनबा जोड़ा है, इससे ज्यादा उनके दौरों को और कुछ नहीं कहा जा सकता।

आप राहुल को महत्व नहीं दे रहे लेकिन उन्होंने तो दावा किया है कि कांग्रेस बड़े पैमाने पर युवाओं को टिकट देगी, आपकी पार्टी युवाओं को क्यों आगे नहीं बढा रही?
फिर वही बात। दरअसल दिल्ली का मीडिया ही इसे खूब प्रचार दे रहा है। क्या महज नौजवान होने भर से टिकट दे दिया जाना चाहिए। हम तो ये कह रहे हैं कि हम हर वर्ग को टिकट देंगे और हर वाजिब उम्मीदवार को टिकट देंगे। चाहे वो पुरुष हो या फिर महिला। लेकिन हमारी प्राथमिकता सबसे पहले काम करने वाले पार्टी कार्यकर्ता को महत्व देने की है।

तो आप ये मानते हैं कि कांग्रेस बिहार चुनाव में आपके सामने कहीं चुनौती में नहीं हैं?
हमारा मुकाबला कांग्रेस से है ही नहीं। उनका वहां कोई असर नहीं। हम ही बिहार में जीतेंगे।
एेसा क्यों लग रहा है कि बीजेपी इस चुनाव में आपके साथ होने के बावजूद आपसे खिंची भी हुई है, दोनों दलों में कहीं न कहीं किसी स्तर पर तनाव महसूस होता हुआ लग रहा है?
बीजेपी बिहार में हमारा सहयोगी दल है। हमारे बीच कोई मतभेद नहीं। हमें उनसे सहयोग मिलता रहेगा। हल्का फुल्का टकराव तो घटक दलों में होता है, ये स्वाभाविक है, लेकिन ये भी सच है कि अगर पिछले कार्यकाल में बिहार में विकास हुआ है तो इसका फायदा जेडी यू और बीजेपी दोनों को बराबर मिलेगा। हम बीजेपी के साथ हैं।

आपने बिहार के विवादास्पद और आपराधिक चरित्र वाले नेता तस्लीमुद्दीन को अपनी पार्टी में शामिल किया है, कहां एक जमाने में आप उनका प्रबल विरोध करते थे?
तस्लीमुद्दीन खराब नहीं हैं। केवल उन्हें लेकर लोगों का परसेप्शन खराब है। जब हमने उनका विरोध किया था तो उन पर अदालत में मामला चल रहा था, जब ये मामला खत्म हो गया तो फिर विरोध कैसा। तस्लीमुद्दीन अच्छे और असरदार नेता हैं।

क्या आपको ये अजीब नहीं लगता कि जिस नीतीश कुमार को आप मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं, जिनके नाम पर आप विकास को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रहे हैं, वो चुनाव ही नहीं लड़ रहे?
आप लोग लोकतंत्र की विकृत व्याख्या कर रहे हैं। हम तो उन्हें सामने रखकर ही पूरे बिहार में वोट मान रहे हैं। वही पार्टी के मुख्य अभियानकर्ता हैं, सारा चुनाव उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रहा है, इसलिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो विधानसभा का चुनाव लड़कर ही सदन में पहुंचे, ये काम बाद में भी किया जा सकता है।

अब आइये कुछ दूसरे सवालों की ओर चलते हैं कि भूमि सुधार और बटाईदारी कानून के सरकार के प्रस्ताव से उपजी संशय की स्थिति से क्या भूपति वर्ग पार्टी से नहीं छिटक रहा?
इसके लिए जो आयोग बनाया गया था उसका आधार ही गलत था। बिहार में किसी के पास भी ज्यादा जमीनें हैं ही नहीं। सभी के पास कम और छोटी छोटी जमीनें हैं इसलिए ऐसे किसी आयोग की बात बेमानी है और हम भविष्य में ऐसा कुछ करने भी नहीं जा रहे।

देश में समस्याओं का अंबार है। नक्सलवाद, कश्मीर, अयोध्या मसला और अब कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर शर्मिंदगी। क्या कहेंगे कांग्रेस सरकार के राज के बारे में?
कांग्रेस सरकार चारों ओर से फेल साबित हुई है। नक्सलवाद कोई मुद्दा था नहीं, उन्होंने बना दिया। रही बात कामनवेल्थ गेम्स की, तो मैंने बहुत पहले कह दिया था कि ये फेल होगा। खेलों के नाम पर जमकर भ्रष्टाचार हुआ है। आयोजकों ने अपने घर भर लिये हैं। उनके घर जाकर देखिये तो खुद पता लग जायेगा कि इन खेंलों से किस तरह उन्होंने अपना फायदा किया है। सबने खाया है। अब तो इन खेलों के बारे में ये ही कहा जा सकता है कि इज्जत भी गई और पैसा भी गया।

और कश्मीर समस्या के बारे में क्या कहेंगे जो दिन पर दिन गंभीर होती हुई लग रही है?
कश्मीर पर केंद्र सरकार पूरी तरह विफल हुई है। ये साफ साफ मिसगवर्नेंस का मामला है। वहां धारा 370 बेशक चलती रहनी चाहिए लेकिन इसे सही स्प्रिट में लागू किया जाये। वहां बेरोजगारी बहुत ज्यादा है। वहां के लोगों को पूरे देश में रोजगार दिया जाये, जिससे पूरे देश में उनकी सही तरीके से मिक्सिंग हो, वो इस देश में घुले मिलें, जब वो देश के दूसरे कोनों में नौकरी करेंगे तो इस देश को महसूस करने लगेंगे, अगर अपने ही राज्य में सिमटे रहेंगे तो ये फीलिंग कहां से आयेगी। पंजाब समस्या का समाधान इसीलिए आसानी से हो गया कि वहां के लोग पूरे देश में फैले हुए थे और पूरे देश का अंग बन चुके थे। कश्मीरियों के साथ भी ऐसा ही किया जाना चाहिए।

आखिर कश्मीर के मौजूदा हाल में क्या किया जाना चाहिए?
वहां सस्पेंशन एनीमेशन को मौका दिया जाना चाहिए। फिलहाल इस सरकार को बर्खास्त किया जाये और फिर लोकप्रिय सरकार बनाने के लिए कुछ समय का इंतजार किया जाना चाहिए, जब लगे अनुकूल समय आ गया है तब बहुमत साबित करने वाली पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाया जाये।