
सीवीसी की दुर्गति क्यों : विनीत नारायण
परिचय: विनीत नारायण की खबर की वजह से ही 1996 में देश के दर्जनों केन्द्रीय कैबिनेट मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों व विपक्ष के बड़े नेताओं के खिलाफ जैन हवाला कांड में चार्जशीट दाखिल हुई थी। भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ। 1997 में हवाला कांड को रफा-दफा करने में भारत के मुख्य न्यायाधीश की अनैतिक भूमिका को उजागर किया।
1989 में कालचक्र वीडियो समाचार जारी कर विनीत नारायण ने भारत में स्वतंत्र हिन्दी टीवी पत्रकारिता की स्थापना की। 1986 में दूरदर्शन पर अपने टीवी शो सच की परछांई के माध्यम से उन्होंने देश में पहली बार खोजी टी-वी-पत्रकारिता को एक नई दिशा दी। वर्तमान में विनीत नारायण देश के मशहूर पत्रकारों द्वारा स्थापित 'फाउण्डेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स’ के अध्यक्ष हैं।
केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री व केन्द्रीय गृहमंत्री से प्रतिपक्ष नेता श्रीमती सुषमा स्वराज की नाराजगी के बयान आप तक पहुँच चुके हैं। इस पूरे विवाद की जड़ में है, केन्द्रीय सतर्कता आयोग के गठन की प्रक्रिया व उसके अधिकार का मामला। पत्रकार विनीत नारायण ने 1993 से सन् 2000 तक सर्वोच्च न्यायालय में संघर्ष के बाद देश में नए विचारों की नींव रखी। पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला, संसदीय समिति की दखलअंदाजी और बाद में केंद्र में रही हर सरकार की बदनीयत ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग को पंगु बना दिया है। केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को लेकर विपक्ष आज बहुत उद्वेलित है। उल्लेखनीय है कि 1993 में जैन डायरी हवाला काण्ड को अपनी वीडियो पत्रिका कालचक्र के माध्यम से उजागर करने वाले नारायण की जनहित याचिका पर ही दिसम्बर, 1998 में सर्वोच्च न्यायालय ने जो निर्णय दिया उसके दूरगामी परिणाम हुए। 'विनीत नारायण बनाम भारत सरकार’ के नाम से जाना जाने वाले इस फैसले में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कई निर्देश दिये गये थे। जिनमें सी.वी.सी, सी.बी.आई व डी.आर.आर्ई आदि की नियुक्तियों के तरीके पर भी निर्देश थे।
इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने सी.वी.सी को व्यापक अधिकार देकर सी.बी.आई व आयकर विभाग जैसी एजेंसियों के हर काम पर निगरानी रखने का जिम्मा भी सौंपा था। पर भ्रष्टाचार से लडऩे का और पारर्दिशता का दावा करने वाली हर केन्द्रीय सरकार केन्द्रीय सतर्कता आयोग को पंगु बनाने पर तुली है। तीन सदस्यीय इस आयोग में एक सदस्य भारतीय प्रशासनिक सेवा, दूसरे सदस्य भारतीय पुलिस सेवा व तीसरे सदस्य भारतीय बैंकिंग सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारियों में से चुने जाते हैं। आयोग पर काम का इतना बोझ है कि ये तीन अधिकारी भी मिलकर काम नहीं संभाल पाते। बावजूद इसके पिछले एक वर्ष में सरकार ने सी.वी.सी के सदस्यों के जाने से रिक्त हुए पदों को भरने की परवाह नहीं की। 1 अगस्त, 2010 को जब नारायण ने इस मामले पर सरकार का ध्यान आर्किषत किया, तब जाकर नियुक्ति के लिए बैठक बुलाई गयी और नियुक्तियों में भी अब विवाद हो गया। विनीत नारायण से डायलॉग इंडिया की बातचीत
विपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज को इस बात से नाराजगी है कि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति के समय प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने उनकी सलाह की उपेक्षा की। क्या आपको उनकी यह नाराजगी जायज लगती है?
जहाँ तक उनकी उपेक्षा करने का प्रश्न है, मैं समझता हूँ कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया कि ऐसे फैसले विपक्ष के नेता की सहमति से किये जाने चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो चयन समिति में विपक्ष के नेता को रखने का क्या औचित्य था? अगर बहुमत के आधार पर ही निर्णय करना था, तब तो समिति के बाकी के दो सदस्य प्रधानमंत्री और गृहमंत्री होते हैं, जो कोई भी निर्णय लेने में सक्षम हैं।
क्या इस मुद्दे पर प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज से आपकी कोई बात
हुई?
जी हाँ, इस मीटिंग से आते ही उन्होंने मुझे फोन करके बुलवाया और मुझे मीटिंग की
कार्यवाही का ब्यौरा बताते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की।
आपकी क्या प्रतिक्रिया थी?
जैसा मैंने कहा, मीटिंग की प्रक्रिया के सवाल पर सैद्धान्तिक रूप से मैंने उनसे
सहमति व्यक्त की। पर साथ ही उनको यह भी याद दिलाया कि इस फैसले के आने के बाद जब
शरद पवार की अध्यक्षता में संसदीय समिति बनी, जिसे इस प्रस्तावित विधेयक पर चर्चा
करनी थी तो उस समिति में भाजपा के भी सांसद थे ओर सबने मिलकर सर्वोच्च न्यायालय के
फैसले की पूरी शल्य क्रिया कर दी और उसकी आत्मा को मार दिया। इसलिए आपका दल भी कम
दोषी नहीं है।
आपकी जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने 1998 में
जो फैसला दिया था, उसकी पृष्ठभूमि क्या थी?
जैन हवाला काण्ड के इस मुकदमे की सुनवाई करते हुए जब सर्वोच्च न्यायालय ने देखा
कि सी.बी.आई लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय से निर्देश लेती है और स्वतन्त्र व्यवहार
नहीं कर पाती तो अदालत ने सी.बी.आई. की स्वायत्ता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उसे
केन्द्रीय सतर्कता आयोग के अधीन किये जाने के निर्देश दिए। साथ ही यह भी निर्देश
दिए कि 'कानून की निगाह में सब बराबरÓ के सिद्धांत का पालन करते हुए किसी भी पद पर
बैठे वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत आने पर सी.बी.आई को
सरकार से अनुमति नहीं लेनी होगी। पर विडम्बना देखिए कि संसदीय समिति ने इस धज्जियाँ
उड़ा दीं। नतीजतन कहने को तो सी.बी.आई केन्द्रीय सतर्कता आयोग की निगरानी में कार्य
करती है, पर वास्तव में उसकी स्थिति आज भी पूर्ववत् है। यानि उच्च पदस्थ अधिकारियों
और मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जाँच करने की उसे छूट नहीं है। ऐसा करने से
पहले सी.बी.आई को प्रधानमंत्री कार्यालय से पूर्वानुमति लेनी होती है। विडम्बना यह
है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सी.बी.आई की ऐसी सभी प्रार्थनाओं पर कान बहरे करके बैठा
रहता है और सालों अनुमति प्रदान नहीं करता। नतीजतन उच्च पदस्थ भष्ट अधिकारी न सिर्फ
अपने पद पर बैठे रहते हैं, बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय के अघोषित सुरक्षा कवच अपने
अनैतिक कारनामों को डंके की चोट पर अंजाम देते रहते हैं। ऐसा अब तक के हर
प्रधानमंत्री के कार्यकाल में होता आया है, चाहे वह यूपीए का रहा हो या एनडीए का।
इतना ही नहीं पिछले दिनों इस आयोग से सरकार ने वह अधिकार भी छीन लिया जिसके तहत यह
सीबीआई को केस रजिस्टर करने का निर्देश देता था। ऐसे तमाम प्रमाण हैं जो यह सिद्ध
करते हैं कि केन्द्र में सरकार कोई भी हो, वो उच्च पदासीन व्यक्तियों के विरूद्ध
भ्रष्टाचार की जाँच नहीं होने देना चाहती। इसलिए केन्द्रीय सतर्कता आयोग की लगातार
दुर्गति की जा रही है।
तो जो विधेयक पारित हुआ, उससे आप संतुष्ट नहीं थे?
बिल्कुल नहीं। क्योंकि सीवीसी को वो ताकत दी ही नहीं गयी जिससे वह अपना काम पूरी
स्वतंत्रता से कर पाती। दरअसल इसका मुझे पहले से ही अंदेशा था। इसलिए मैंने जुलाई
और अगस्त, 1997 में अपने मुकदमे के दौरान कई शपथ पत्र दाखिल
कर अदालत का ध्यान मूल मुद्दे की ओर खींचने का प्रयास किया था। मुझे तकलीफ इस बात
की थी कि सर्वोच्च न्यायालय जनहित याचिका की मूल शिकायत से ध्यान हटाकर सीवीसी को
भविष्य में स्वायत्तता देने की बात कर रहा था। तब मेरा असंतोष जाहिर करता एक लेख
देश के अखबारों प्रकाशित हुआ था। 1998 में जब यह निर्णय आया
तो सारे देश के मीडिया ने इसे ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए लीड खबर बनाया। पर मैंने
अपना संतोष जाहिर करता लेख लिखा था।
आप अदालत के फैसले से खुश क्यों नहीं थे और इस लेख में आपने क्या लिखा?
मैंने लिखा था कि, ''इस निर्णय में सीबीआई को स्वायतत्ता देने की जो बात कही गई
है वह एक सदिच्छा से अधिक कुछ नहीं है। देश की राजनीति और संसद के इतिहास की थोड़ी
भी जानकारी रखने वाले लोग जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय तब तक कानून नहीं
बन सकता जब तक संसद इस पर विधेयक पारित न कर दे। ऐसे तमाम उदाहरण है जब सर्वोच्च
न्यायालय के निर्णयों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। अभी हाल ही का उदाहरण है जब
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश, जस्टिस कुलदीप सिंह ने 1800
सरकारी बंगलों के अवैध आवंटन को रद्द करने का फैसला दिया था। सरकारी भ्रष्टाचार के
विरूद्ध इस फैसले को धता बताते हुए भारत के निवृत्तमान राष्ट्रपति डा.शंकर दयाल
शर्मा ने एक अध्यादेश जारी करके ऐसे अवैध काम करने वालों को कानूनी स्वीकृति प्रदान
कर दी। और भी तमाम उदाहरण है। सीबीआई को स्वायतत्ता देने वाले इस फैसले के विरूद्ध
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का बरसना और कानून मंत्री रमाकांत खलप का यह कहना कि
संसद अपने विवेक से फैसला लेगी, काफी प्रमाण है इस बात का कि इस फैसले को तार्किक
परिणाम तक शायद ही ले जाया जाए। बेहतर तो यह होता कि हवाला केस के मूल मुद्दों पर
सर्वोच्च न्यायालय अपना ध्यान बनाए रखता और जब उसमें तार्किक परिणाम तक पहुंचता तब
कहीं सीबीआई को स्वायतत्ता देने की बात करता। अब तो ऐसी बात हुई कि चोर निकल कर भागा
जा रहा हो और हम बजाए चोर को पकडऩे के शोर मचाएं, 'भईया अगली बार ताला मजबूत लगाना।’
इस आदेश के अनुसार केंद्रीय सतर्कता आयोग सीबीआई पर निगरानी रखेगा। जग जाहिर है कि
सरकार के वेतनभोगी अधिकारी इस आयोग में बैठ कर पिछले पचास वर्ष में किसी बड़े
भ्रष्टाचारी को नहीं पकड़ सके तो अब कौन सा तीर मार लेंगे ? इसी आदेश में यह भी है
कि आयोग के सदस्यों का चयन एक समिति करेगी जिसके सदस्य प्रधानमंत्री, गृहमंत्री व
विपक्ष के नेता होंगे। यदि ये तीनों ही हवाला जैसे भ्रष्टाचार के किसी कांड में
लिप्त हों तो इनसे अपने ही खिलाफ ईमानदार जांच करवाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है
? जब संवैधानिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्रता सर्वोच्च न्यायालय तक अपनी देख-रेख में
हवाला कांड की जांच नहीं करवा सका? इसलिए यह निर्णय 'ऐतिहासिकÓ नहीं बल्कि देश की
जनता को गुमराह करने वाला है।”
आप इस मामले में क्या करने की सोच रहे हैं?
मैंने सर्वोच्च न्यायालय के कुछ वरिष्ठ वकीलों से बात की है और मैं संभावना
तलाश रहा हूँ कि पिछले दस वर्षों में सीवीसी की जो दुर्गति की गई है, उसके विरूद्ध
क्या मैं अपने ही केस की पुर्नविचार याचिका दायर कर सकता हूँ?












