झारखंड में सियासत की बदलती तसवीर

झारखंड अपने गठन के बाद से ही अस्थिरता का शिकार रहा है। और ये हाल अब भी कायम है। अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में बीजेपी-जेएमएम के गठबंधन वाली सरकार बनने के बाद भी हालात कोई बेहतर नहीं लगते। सवाल ये ही है कि ये सरकार कब तक चलेगी। ओम प्रकाश भट्ट की रिपोर्ट

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झारखंड की राजनीतिक तसवीर बदलने का नाम नहीं ले रही है। अस्थिर राजनीति का दौर खत्म ही नहीं हो रहा है। 2009 के विधानसभा चुनाव के बाद एक बार ऐसा प्रतीत हुआ कि सूबे की राजनीतिक अस्थिरता खत्म हो गई। भाजपा और झामुमो के नए राजनीतिक गठबंधन की सरकार अब चल निकलेगी। विचार और सिद्धांत में मतभिन्नता के बावजूद नया गठबंधन आकार ले चुका था। किंतु ऐन वक्त पर शिबू सोरेन ने लोकसभा में यूपीए के पक्ष में वोट डालकर भाजपा के साथ कुछ दिनों के लिए ही सही, संबंध कटु कर लिया। इसका नतीजा राज्य को भुगतना पड़ा। शिबू सोरेन सरकार समय से पहले ही गिरा दी गई। 30 मई को भाजपा ने शिबू सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। एक जून को राष्ट्रपति शासन लगा।

झारखंड की गठबंधन सरकार के भविष्य को लेकर कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। कब किस दल का मिजाज बदल जाए और कब सरकार से हाथ खींच ले, कहना कठिन है

फिर तीन महीने के बाद नई सरकार की कवायद शुरू हुई। भाजपा के नेतृत्व में नई सरकार ने आकार लिया है। मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुन मुंडा की ताजपोशी हुई। 2006 के बाद अर्जुन मुंडा ने तीसरी बार सूबे की कमान संभाली है। ऐसे वक्त उन्होंने कमान संभाली है जब पूरा राज्य कई गंभीर संकटों से जूझ रहा है। सूखे की समस्या मुंह बाए खड़ी है। नक्सली समस्या और गहराती जा रही है। पंचायत चुनाव कराने की चुनौती सामने है। विकास योजनाओं की गति मंद पड़ चुकी है। कई घोटालों की जांच चल रही है। ऐसे में मुंडा को राज्य संभालना और आगे ले जाना कम बड़ी चुनौती नहीं है।
गठबंधन की सरकार चलाना बहुत कठिन काम है। सत्ता संतुलन बनाए रखने के लिए घटक दलों को साथ लेकर चलने का अनुभव अर्जुन मुंडा को रहा है। 2003 से 2005 और 2005 से 2006 के सितंबर महीने तक गठबंधन सरकार चला चुके मुंडा पूर्व के अनुभव का लाभ जरूर लेंगे। लेकिन इसके पहले झामुमो को सरकार में साथ लेकर चलने का उन्हें कोई अनुभव नहीं रहा। सरकार के लिए सत्ता संतुलन बनाने में झामुमो को कभी भी भरोसेमंद साथी के रूप में नहीं माना जाता है। झामुमो कभी भी किसी भी वक्त हाथ खींच सकता है। वैसे भी कैबिनेट बंटवारे को लेकर झामुमो के अंदर जितनी खिचखिच हुई है, उससे दल के अंदर असंतोष बरकरार है।

झारखंड में भाजपा की सरकार बनने से भाजपा के कई नेता इत्मीनान में हैं। हालांकि केंद्रीय नेता इस मुद्दे पर बंटे हुए दिखे, लेकिन बिहार में हो रहे विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा को झारखंड से खासी मदद मिलेगी। चुनाव में प्रचार के लिए नेता-कार्यकर्ता उपलब्ध रहेंगे। फंड की भी व्यवस्था हो जाएगी, जिसकी जरूरत चुनाव के वक्त होती है।
झारखंड की गठबंधन सरकार के भविष्य को लेकर कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। कब किस दल का मिजाज बदल जाए और कब सरकार से हाथ खींच ले, कहना कठिन है। 15 नवंबर को झारखंड के दस साल हो जाएंगे। इन दस सालों में आठ मुख्यमंत्री बन चुके हैं। दो बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है। सरकार जितना दिन चल जाए, वही इसकी मियाद होगी। झारखंड की तीसरी विधानसभा का गठन 30 दिसंबर 2009 को हुआ है। इस लिहाज से 2014 दिसंबर तक विधानसभा का कार्यकाल होता है। देखना यह है कि यह विधानसभा अपना कार्यकाल पूरा कर पाती है या नहीं।

सामूहिक सोच से आगे बढेंगे- अर्जुन मुंडा

झारखंड के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री से डायलॉग इंडिया की बातचीत

झामुमो के साथ फिर कैसे सरकार बन गई?
झामुमो के साथ संबंध खराब होने की बात तो कभी नहीं रही। जहां तक लोकसभा में शिबू सोरेन के यूपीए के पक्ष में वोट डालने का मामला है वह निहायत ही नीतिगत और सैद्धांतिक मसला था। इसलिए हमारी पार्टी ने सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला लिया था। लेकिन बाद में शिबू सोरेन ने गलती स्वीकारी और फिर संबंध यथावत हो गए। हमें भविष्य की चिंता है। पिछले कई वर्षों से योजनाएं शुरू नहीं हुईं। सरकारों की अस्थिरता से विकास पर ब्रेक लगा हुआ है।

राज्य की मौजूदा स्थिति से कैसे निपटेंगे?
राज्य की मौजूदा स्थिति भयावह है। सिंचाई और पीने के पानी तक की किल्लत है। नदी, नाले, पानी के अन्य स्रोत सूख गये हैं। पठारी क्षेत्र की स्थिति भी खराब है। इस स्थिति से निपटने के लिए ज्यादा काम करेंगे।

आपकी सरकार की प्राथमिकताएं क्या होंगी?
आधारभूत संरचना, बिजली, पानी, सड़क, सुखाड़ से निपटना और नक्सलवाद रोकना। इसके अलावा पंचायत चुनाव कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। हम हर हाल में चाहेंगे कि पंचायत चुनाव समय पर करा लिए जाएं। गांव में त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था काम करे।

नक्सलवाद का सामना कैसे करेंगे?
नक्सलवाद से निपटने की योजना सबके साथ मिल बैठकर निकाला जाएगा। विकास की गति तेज की जाएगी। गांव में रोजगार नहीं हैं। लोग भटकेंगे ही। रोजगार का सृजन, विकास योजनाएं और पंचायत चुनाव समय पर हो जाएगा तो नक्सलवाद की समस्या दूर हो जाएगी।

सुखाड़ की समस्या भी विकराल है?
हम रोजगार के अवसर बढ़ाकर इस पलायन को रोकेंगे। किसानों के साथ मिलकर सुखाड़ की समस्या को किसानों के साथ मिलकर दूर करेंगे। हर तरह की सुखाड़ राहत चलाएंगे। लोगों को भूख से मरने नहीं देंगे। सरकार योजनाएं लागू कर रही है।

पारा शिक्षकों की समस्या कैसे दूर होगी?
इस मुद्दे पर सरकार गंभीर है। कैबिनेट का गठन हो जाएगा तो सब मिलकर इसे मंत्रिपरिषद में लाएंगे। न्यायोचित फैसला लेंगे।

सरकार के स्थायित्व को लेकर लोगों में संशय है?
स्थायी सरकार यहां के लिए यक्ष प्रश्न बना हुआ है। मगर मैं दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ काम करने में विश्वास रखता हूं। हम जनता को आगे रखकर फैसले करेंगे। जिस गली-मुहल्ले से निकले हैं उसको ध्यान में रखकर काम करेंगे। एक टिकाऊ सरकार प्रदेश के विकास के लिए बनानी ही होगी। हमें ध्यान रखना होगा कि जनता हमें कितने दिनों के लिए चुनती है। राज्यपाल शासन लोकतंत्र का विकल्प नहीं हो सकता। राजनीतिक कार्यकर्ताओं को इस बात को ध्यान में रखकर कार्य करना होगा। हमें यह भी सोचना होगा कि आपातकाल का प्रतिवाद क्यों हुआ?

साथी दलों के साथ कैसे समन्वय बनाएंगे?
सरकार बनाने के लिए सभी दलों का दिल मिला है। राज्य की बेहतरी के लिए हर दल के अंदर पीड़ा है। कोई विधायक जल्दी चुनाव नहीं, क्षेत्र का विकास चाहता है। इसलिए सरकार और दलों के अंदर सामूहिक सोच से ही सब आगे बढ़ेंगे।