झारखंड : नक्सलवाद और अस्थिरता

ओम प्रकाश भट्ट

देश के 28 वें राज्य की सूची में आने के बाद बिहार से अलग होकर झारखंड की अलग पहचान बनी है। छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड इसके साथी राज्य हैं। तरक्की के पैमाने पर तीनों राज्यों को आंका जाता है, तो झारखंड सबसे पीछे खड़ा दिखता है। झारखंड के बारे में एक प्रचलित उक्ति बहुत चर्चित है। अमीर राज्य में गरीब लोग रहते हैं। अकूत खनिज संपदा, अमूल्य और अतुलनीय प्राकृतिक धरोहर, बड़े-बड़े कल कारखाने तथा मेहनतकश लोगों के होने के बावजूद झारखंड तरक्की के रास्ते में बहुत पीछे चल रहा है। योजना आयोग की एक वरिष्ठ अधिकारी सुधा पिल्लई की बातों को लें तो झारखंड के फिसड्डी होने के पीछे सबसे बड़ी वजह राजनीतिक अस्थिरता रही है। दस साल में आठ मुख्यमंत्री। सुनकर बड़ा अटपटा लगता है। इस बीच दो बार राष्ट्रपति शासन भी लगा। 2009 के जनवरी से 30 दिसंबर 2009 के बीच सबसे लंबे कालखंड तक झारखंड राष्ट्रपति शासन के साए में रहा। अब मुख्यमंत्रियों के नाम उनके क्रमवार कुर्सी में बैठने के हिसाब से गिनिए तो सबसे पहले बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा, शिबू सोरेन, फिर चुनाव के बाद शिबू सोरेन और अभी अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री हैं। ऐसी राजनीतिक अस्थिरता देश के किसी और राज्य में देखने को नहीं मिलती है। अब जो मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल नहीं पूरा कर पाएगा वह राज्य के लिए क्या सोचेगा और क्या भला करेगा। कुर्सी बचाने, अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में ही मुख्यमंत्रियों का समय बीत जाता है। इस दौरान झारखंड ने निर्दलीय मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा के कार्यकाल को माथे पर कलंक के रूप में झेला है। आज भी कोड़ा के भ्रष्टाचार की चर्चा देश-विदेशों तक फैली हुई। झारखंड की नेकनामी से कहीं ज्यादा कोड़ा लूटराज की बदनामी सर्वत्र फैली हुई है।

छोटे राज्यों के गठन के पीछे विकास की अवधारणा विकास को माना गया था। छोटे राज्य विकसित हो सकते हैं। विकास की योजनाएं राज्य के कोने-कोने तक पहुंचायी जा सकती है। लेकिन झारखंड में सबकुछ उलटा-पुलटा ही चला। पहली सरकार राजग की बनी थी। 2000 में बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में बनी सरकार के दौरान विकास की योजनाएं सरजमीं पर उतरने लगी थी। झारखंड की पहचान उस समय 2002-03 में इसकी बेहतर सड़कों के लिए देश भर में बनी थी। आज भी लोग मरांडी के कार्यकाल को याद करते हैं। उस दौरान औद्योगिक विकास के लिए आधारभूत संरचना विकसित करने पर सबसे ज्यादा जोर था। ग्रामीण सड़कों को छोटे-छोटे पुल-पुलियों से जोडऩे की कवायद शुरू हुई थी। मुख्यमंत्री ग्राम सेतु योजना मरांडी सरकार की ही अवधारणा थी। शिक्षा को गुणात्मक ढंग से विकसित करने के लिए तत्कालीन सरकार ने सरकारी स्कूलों में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम लागू किया गया। मरांडी सरकार स्थानीयता की नीति (डोमिसाइल नीति) में उलझ गयी।

झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का दौर 2003 के मार्च में शुरू हुआ। मरांडी को हटाकर अर्जुन मुंडा को भाजपा ने नया मुख्यमंत्री बनाया। 2005 का चुनाव जीतने के बाद फिर मुंडा को ही दुबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। यद्यपि इसके पहले कांग्रेस-झामुमो ने प्रपंच कर शिबू सोरेन को गद्दी पर बिठा दिया था। लेकिन 11 दिनों के बाद शिबू सोरेन को इस्तीफा देना पड़ा। उनके पास बहुमत नहीं था और तत्कालीन राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने बगैर बहुमत की परीक्षा लिए उन्हें मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया था। फिर भाजपा ने रांची से लेकर दिल्ली तक बवाल मचाया। रजी अपने इस फैसले से विवाद में आ गए। अर्जुन मुंडा की दूसरी पारी पूरे तामझाम के साथ शुरू हुई। फिर शुरू हुआ औद्योगिक विकास के नाम पर एमओयू का सिलसिला। मुंडा ने तकरीबन एक लाख 90 हजार करोड़ रुपये के पूंजी निवेश के लिए 97 एमओयू किए। लंदन से एलएन मित्तल आए। लेकिन एक भी एमओयू सरजमीं पर नहीं उतरा। 2006 में मुंडा कैबिनेट के सदस्य मुख्यमंत्री से नाराज हो गए। मधु कोड़ा इसके सूत्रधार थे। सितंबर 2006 को बागी मंत्रियों ने अर्जुन मुंडा का तख्ता पलट कर दिया। कांग्रेस, झामुमो और राजद के सहयोग से मधु कोड़ा पहली निर्दलीय मुख्यमंत्री बन गए। दो साल तक सत्ता में रहने के बावजूद कोड़ा सरकार ने सिवाय भ्रष्टाचार और घोटालों के राज्य को कुछ नहीं दिया। खनिज घोटाला, नियुक्ति घोटाला और मंत्रियों द्वारा अर्जित आय से अधिक संपत्ति के मामलों को निगरानी समेत कई केंद्रीय एजेंसियों ने खुलासा किया। कोड़ा समेत आधा दर्जन पूर्व मंत्रियों पर मुकदमे दर्ज हुए। अभी भी न्यायालय में सभी मामले चल रहे हैं। कोड़ा और उनकी कैबिनेट के तीन साथी कमलेश कुमार सिंह, एनोस एक्का तथा हरिनारायण राय रांची के बिरसा मुंडा जेल में बंद हैं।

कोड़ा को हटाकर शिबू सोरेन 2008 के अगस्त में मुख्यमंत्री बने। लेकिन चार महीने तक सरकार में रहने के बावजूद वह राज्य की तरक्की के लिए कुछ नहीं कर पाए। सांसद रहे शिबू सोरेन को विधायक बनने के लिए उपचुनाव लडऩा था। दिसंबर 08 व जनवरी 09 में हुए तमाड़ विधानसभा उपचुनाव शिबू सोरेन हार गए। उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। वैकल्पिक सरकार नहीं बनने की वजह से 19 जनवरी 09 को राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन लगा। दिसंबर में विधानसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ। भाजपा और झामुमो 18-17 सीटें लेकर पहले नंबर पर रहे। लेकिन फिर खंडित जनादेश के कारण किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला। इस चुनाव में बाबूलाल मरांडी ने अपनी नई पार्टी झारखंड विकास मोर्चा के साथ कांग्रेस के चुनावी गठबंधन का लाभ लिया। उनकी पार्टी 11 सीटें जीती और कांग्रेस नौ से बढ़कर 14 सीटों पर आ गई। लेकिन भाजपा ने झामुमो के साथ मिलकर साझा सरकार बना लिया। शिबू सोरेन तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन चार महीने बाद अप्रैल में लोकसभा में यूपीए के पक्ष में वोट देकर शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। फिर राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। पहली जून से 1१सितंबर तक राष्ट्रपति शासन रहा। फिर भाजपा ने झामुमो और छोटे दलों को लेकर अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में नई सरकार बनायी।

दस साल में झारखंड राजनीति अस्थिरता के भंवर में झुलता रहा। नतीजतन यहां विकास के काम ठप रहे। भ्रष्टाचार बढ़ा। नक्सलवाद ने पूरे राज्य में पैर पसार लिए। 24 में से 23 जिला नक्सल प्रभावित घोषित हो चुका है। सड़कों की हालत जर्जर है। एक मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए कोई नया प्लांट नहीं लगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में कहीं कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। नक्सल की वजह से कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर हो चुकी है। औद्योगिक विकास की कहीं कोई चर्चा नहीं है। न उद्योग नीति है, न विस्थापन-पुनर्वास नीति। मुंडा के नेतृत्व में बनी नई सरकार में भी बहुत खिचखिच है। एक महीने बाद कैबिनेट का विस्तार हो पाया। साझे दलों में अंतद्र्वंद्व की वजह से सरकार बहुत सेहतमंद नहीं कही जा सकती है। ठ्ठ

विकास हुआ ही कहां है- मरांडी

बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे हैं। सूबे की सियासत में इनकी अलग पहचान है। भाजपा छोड़कर 2006 में नई राजनीतिक पार्टी झारखंड विकास मोर्चा के गठन के बहुत दिनों तक राजनीतिक प्रेक्षक उन्हें मुख्यधारा से दरकिनार कर चुके थे। लेकिन 2009 के विधानसभा चुनाव में मरांडी जब 25 विधानसभा सीटों पर लड़कर 1१ सीटें जीतकर आए तो लोगों का नजरिया उनके प्रति बदल गया। वैसे मरांडी अपने सवा दो साल के मुख्यमंत्रित्व के कार्यकाल में किए गए कार्यों के लिए सबसे अधिक याद किए जाते हैं। झारखंड के दस साल पर उनसे हुई बातचीत के अंश :

झारखंड को दस साल में आप कहां पाते हैं ?
झारखंड वहीं है, जहां मैंने इसे छोड़ा था। हां, इस बीच बड़े-बड़े घपले, घोटाले और अनियमितता इसके खाते में जरूर जुड़ गए। विकास के नाम पर और कुछ नहीं हुआ। नेता और दल अपने स्वार्थ के लिए सरकार बनाने की जुगत में लगे रहे। आज भी यह सिलसिला जारी है।

इस परिस्थिति के लिए आप किसे दोषी मानते हैं ?
देश की सबसे बड़ी पार्टियां इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेवार हैं। भाजपा ने झारखंड में राजनीतिक स्वार्थ का एक बड़ा केंद्र बना दिया। राज्य से कहीं ज्यादा इसके नेताओं को अपने स्वार्थ की चिंता रही। वहीं कांग्रेस मूकदर्शक और गलत लोगों को प्रश्रय देकर ऐसी स्थिति पैदा की। झारखंड की तरक्की से इन दोनों दलों को कोई मतलब नहीं रहा।

आप भी तो इन्हीं दलों से जुड़े हुए रहे और अभी भी कांग्रेस से जुड़े हैं?
मैंने दल के अंदर रहकर सिर्फ झारखंड की तरक्की की बात कही। नेताओं का स्वार्थ सिद्ध करता रहता तो मैं सत्ता से कभी बाहर नहीं रहता। जहां तक कांग्रेस की बात है, मेरा कांग्रेस के साथ चुनाव रिश्ते हैं। झारखंड की तरक्की के सवाल पर ऐसे किसी भी रिश्ते को कुर्बानी देने को सदैव तैयार रहूंगा।

झारखंड कैसे आगे बढ़े, क्या है आपकी योजना?
झारखंड की तरक्की यहीं के लोगों के बूते होगी। विकास की बातें सिर्फ सरकारी दफ्तरों में सिमटी नहीं रहनी चाहिए। गांव-गांव तक इन्हें पहुंचाना होगा। बुनियादी सवालों को विकास के साथ जोडऩा होगा। भ्रष्टाचार से किसी भी हाल में समझौता नहीं करना होगा। जनता राज्य में किसी दल को स्थायी सरकार बनाने का जनादेश देगी, स्थितियां बदल जाएगी। मेरे पास झारखंड की तरक्की की कई योजनाएं हैं, समय पर इसे लोगों के सामने रखूंगा।