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Posted Mon, 02/13/2012 - 20:35 by admin

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श्रीमान अध्यक्ष महोदय ,
भारतीय विधि आयोग ,
नई दिल्ली

मान्यवर,
भारतीय दंड संहिता एवं दंड प्रक्रिया संहिता में मौलिक परिवर्तन हेतु
उपरोक्त विषय में नम्र निवेदन है कि सन 1857 में हुई क्रांति ने कानून निर्माण की दिशा में परिवर्तन किया और देश के शासन की बागडोर को ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथ में ले लिया व अब कानून बनाने का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास था| भारत के लिए कानून बनाते समय विद्रोह की उठने वाली आग या स्वतंत्रता के पक्ष में उठने वाले प्रत्येक स्वर को दबाना ही सरकार के समक्ष अहम लक्ष्य रहता था| इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लोर्ड मैकाले ने भारतीय दण्ड संहिता, 1860 तथा कालांतर में दंड प्रक्रिया संहिता,1898 का निर्माण किया जिसमें लोक सेवकों की रक्षा के लिए कई विशेष प्रावधान शामिल किये गए| लोक सेवकों के विरुद्ध अपराध आदि विशेष अध्याय इसी कड़ी का एक भाग हैं| लोक सेवकों पर हमला आदि को अलग से परिभाषित किया गया और इन अधिकांश अपराधों को संज्ञेय घोषित किया गया|
जहाँ एक ओर राज कार्य में बाधा (भा दं सं 353)जैसे अस्पष्ट किन्तु संज्ञेय अपराध इसमें शामिल कर पुलिस सहित समस्त लोक सेवकों की सुरक्षा की सुनिश्चित व्यवस्था की गयी और बाधा पहुंचाने वाले को दो वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया वहीँ इसके ठीक विपरीत राज कार्य में लोक सेवक द्वारा स्वयं बाधा पहुँचाने अर्थात किसी को क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से कानून का उल्लंघन करने पर (भा दं सं 166) मात्र एक वर्ष की सजा वाले असंज्ञेय अपराध का प्रावधान किया गया है| उक्त दोनों प्रावधान लोकतंत्र के मूल दर्शन के विपरीत हैं| इस प्रकार की विसंगतियों की भारतीय कानूनों में भरमार है |यही नहीं इन राजपुरुष-लोक सेवकों के अभियोजन से पूर्व स्वीकृति का प्रावधान जोड़कर उन्हें पूर्ण अभय दान दे दिया गया जो आज लोकतान्त्रिक व्यवस्था में भी बदस्तूर जारी है| आज विकसित लोकतान्त्रिक राष्ट्रों में इस प्रकार के मनमाने कानूनों को कोई स्थान नहीं हैं और वहाँ लोक सेवकों के अधिकारों के बजाय उनके कर्तव्यों पर बल दिया जाता है| हमारी वर्तमान शासन और न्याय व्यवस्था में आज भी राजतन्त्र की बू आती है| स्वतंत्रता से पूर्व देश के लोक सेवक सरकार (स्वामी) के प्रतिनिधि की हैसियत में कार्य करते थे और भारतीय संविधान लागू होने से उनकी सैधांतिक स्थित में तो परिवर्तन आ गया है और वे लोकतंत्र के सेवक बन गए हैं किन्तु उनका आचरण आज भी स्वामी जैसा ही है|
आज निम्न वेबसाइटों पर स्थित न्यूयार्क राज्य (अमेरिका) में विद्यमान दंड कानूनों एवं दंड प्रक्रिया के प्रावधानों का अवलोकन करें तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी कि कालातीत भारतीय दण्ड संहिता, 1860 तथा दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के वर्तमान स्वरुप को लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में कोई स्थान नहीं दिया जा सकता| भारत में आज बहुत से कानूनों में दंड की न्यूनतम सीमाएं तक परिभाषित नहीं हैं अतः भारतीय न्यायालयों को दंड के सम्बन्ध में विस्तृत विवेकाधिकार हैं जोकि भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण हैं| दूसरी ओर अमेरिकी कानून की ओर देखें तो ज्ञात होगा कि गंभीरता की दृष्टि से अपराध की श्रेणियाँ बना रखी हैं और प्रत्येक श्रेणी/उपश्रेणी के लिए अलग अलग अवधि के दंड के प्रावधान कानून में ही हैं जिससे न्यायालयों को प्राप्त विवेकाधिकार का क्षेत्र अत्यंत संकुचित है| लोकतंत्र को मूर्त रूप देने के लिए विद्यमान समयातीत भारतीय कानूनों में मात्र आंशिक संशोधन ही नहीं अपितु आमूलचूल परिवर्तन कर पुनः परिभाषित करने की पुर जोर आवश्यकता है|



अतेव आपसे विनम्र अनुरोध है कि उक्त कानूनों का अवलोकन कर अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए स्वप्रेरणा से भारतीय दण्ड संहिता, 1860 तथा दंड प्रक्रिया संहिता (1973) के पूर्णतः नवीन स्वरुप में निर्माण के लिए रिपोर्ट तैयार कर अपनी अनुशंसा सरकार को प्रेषित करने की अनुकम्पा करें ताकि भारत में वास्तविक अर्थों में लोकतंत्र की स्थापना हो सके|

अग्रिम धन्यवाद सहित,


भवनिष्ठ

मनीराम शर्मा दिनांक: 11.02.2012
जिला –चुरू (राज)
 

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