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Posted Mon, 02/13/2012 - 19:58 by admin

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नया इंडिया, 9 फरवरी 2012: मालदीप में जो कुछ हुआ, इसे क्या कहा जाए? सत्ता-परिवर्तन या तख्ता-पलट? कोई खुन-खराबा नहीं हुआ, कोई गिरफ्तार नहीं हुआ, कोई सरकार ठप नहीं हुई| फिर भी इसे खुद राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने तख्ता-पलट कहा है| क्यों कहा है? इसीलिए कि उन्होंने अपना इस्तीफा स्वेच्छा से नहीं दिया है| खुशी-खुशी नहीं दिया है| उनकी पुलिस ने उनका हुक्म मानने से मना कर दिया था और राजधानी माले टीवी स्टेशन पर कब्जा कर लिया था| यदि वे टिके रहना चाहते तो पुलिस के विरूद्घ वे अपनी फौज को भिड़ा सकते थे| वे अपने अनुयायियों को भी मैदान में उतार सकते थे लेकिन उन्होंने बहुत समझदारी और दूरंदेशी से काम किया| उन्हें पता चल गया था कि अगर वे सत्ता में टिके रहेंगे तो मालदीव में खून की नदियाँ बहेंगी और बाहरी हस्तक्षेप हुए बिना भी नहीं रहेगा| ये दोनों बातें स्वंय नशीद और मालदीव के लिए भी हितकारी नहीं होती| अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से मिलनेवाली मदद भी बंद हो जाती| दम तोड़ती अर्थ-व्यवस्था का प्राणवायु निषेध हो जाता और जैसे म्यांमार पर लगे थे, वैसे ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी मालदीप पर लग जाते|
नशीद ने इस्तीफा देकर यह सिद्घ किया है कि वे सचमुच गहरे लोकतंत्रप्रेमी हैं| भारत से उनके संबंध इतने घनिष्ठ थे कि वे अपनी पुलिस और विरोधियों को सीधा करने के लिए वे सैन्य-सहायता मांग सकते थे लेकिन इस्तीफा देकर उन्होंने भारत को भी पसोपेश से बचा लिया| 1988 में भारत ने राष्ट्रपति मामून गय्यूम को छुड़ाने के लिए जो फौजी मदद अचानक भेजी थी, उसका संदर्भ बिल्कुल ही अलग था| सिंगापुर के कुछ गिरोहों ने मिलकर गय्यूम को बंधक बना लिया था| हमारे तत्कालीन रक्षा मंत्री श्री कृष्णाचंद्र पंत उस समय चीन-प्रवास पर थे| मैंने (पीटीआई-भाषा संपादक) उन्हें फोन पर सारी स्थिति से अवगत करवाया और श्रीलंका स्थित अमेरिकी राजदूत को भी सहमत किया ताकि हम सफल फौजी कार्रवाई निर्देशन कर सकें| कुछ ही घंटों में गय्यूम मुक्त हो गए लेकिन ऐसी ही कोई कार्रवाई भारत अभी करता तो वह बहुत बदनाम हो जाता| हमारे विदेश मंत्रालय ने ठिक ही कहा है यह मालदीव का आंतरीक मामला है| यह कहने का अर्थ यह नहीं है कि माले स्थित भारतीय दूतावास हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा| उसने नशीद और विरोधियों से सतत संपर्क बनाए रखा है| http://www.vpvaidik.com

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