
Posted Mon, 02/20/2012 - 12:39 by admin
15 फरवरी 2012 : मालदीव में नया राष्ट्रपति बने एक सप्ताह हो गया और अब जैसे-तैसे
नया मंत्रिमंडल भी बन गया है। इन दोनों को भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और चीन ने मान्यता
भी दे दी है यानी महाशक्तियां मानकर चल रही हैं कि मालदीव में तख्ता-पलट नहीं हुआ
है। यह सामान्य-सहज सत्ता परिवर्तन है। यदि यह सत्य होता तो अमेरिका, भारत और
संयुक्तराष्ट्र संघ को अपने विशेष दूत मालदीव भिजवाने की हड़बड़ी क्यों होती?
राष्ट्रमंडल आखिर किस बात की जांच कर रहा है?
उसका प्रतिनिधिमंडल माले क्यों जा रहा है? यदि मालदीव का मामला बिल्कुल आंतरिक था
तो वहीद-सरकार ने राष्ट्रमंडल की अंतरराष्ट्रीय जांच का स्वागत क्यों किया है? किसी
भी देश में आंतरिक सत्ता-परिवर्तन होने पर क्या विदेशी विशेष दूत आनन-फानन दौड़ाए
जाते हैं? और क्या ऐसा भी होता है कि वे सत्ता से हटे लोगों को मनाने-पटाने का काम
भी करते हैं?
मालदीव में यही सब कुछ हो रहा है। यदि लगभग ऐसा ही मामला क्यूबा, ग्वाटेमाला या
डोमिनिकन रिपब्लिक में हो जाता तो क्या गैर-अमेरिकी राष्ट्र अपने दूत वहां भेजते?
अमेरिका की नाक के नीचे कोई बड़ी घटना हो रही हो तो क्या वह किसी दूर देश की
दखलंदाजी बर्दाश्त करता? लेकिन भारत को यह बर्दाश्त करनी पड़ रही है। भारत के विशेष
दूत गणपति की औकात क्या रह गई? माले में अमेरिका के उपमंत्री स्तर के विशेष दूत
राबर्ट ब्लेक ही सारे घटना चक्र के सूत्रधार बने हुए हैं।www.vpvaidik.com
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