
Posted Wed, 02/01/2012 - 23:20 by admin
कांग्रेस पार्टी के लिए ममता बनर्जी को साधना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ममता के
तेवरों, नित-नए बयानों, असहयोग, विरोध व मांगों के बीच यूपीए सरकार की स्थिति दयनीय
हो गयी है। डी आलोक की नजर।
राइटर्स बिल्डिंग में खड़े हो कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को
तानाशाह बताने वाले कांग्रेसी मंत्री मनोज चक्रवर्ती की इस्तीफा को हाईकमान ने 20
जनवरी को अंतत: मंजूर कर लिया। हाईकमान ने एक तरह से मनोज चक्रवर्ती के पक्ष में
फैसला लिया। चक्रवर्ती के इस्तीफे पर पार्टी की मुहर लगने के बावजूद कांग्रेस ने
उनकी जगह किसी दूसरे नेता को ममता मंत्रिमंडल में भेजने का संकेत नहीं दिया है। इससे
पता चलता है कि सरकार के साथ प्रदेश कांग्रेस नेताओं की जो खींचतान चल रही है उसमें
हाईकमान प्रदेश नेताओं के पक्ष में है। यह बात दूसरी है कि राजनीतिक कारणों से
कांग्रेस हाई कमान तृणमूल के साथ गठजोड़ तोड़ने के पक्ष नहीं है। पश्चिम बंगाल में एक
कांग्रेसी मंत्री से दो विभाग वापस लिए जाने पर कांग्रेस ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
को गठबंधन धर्म की याद दिलाई है। कांग्रेस ने कहा है कि गठबंधन धर्म इस तरह के
एकतरफा फैसलों की इजाजत नहीं देता। साथ ही कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस के साथ सभी
मुद्दों को बातचीत से सुलझाने की बात कही है।
कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि जहां तक पश्चिम बंगाल का सवाल है
संयम के साथ बातचीत की जरूरत है। सिंघवी ने उम्मीद जताई कि तृणमूल कांग्रेस से जल्द
ही संबंध फिर से अच्छे हो जाएंगे। वहीं तीन में से दो विभाग छिने जाने से नाराज
पश्चिम बंगाल के मंत्री मनोज चक्रवती ने इस्तीफे की धमकी देते हुए ममता बनर्जी पर
तानाशाही से सरकार चलाने का आरोप लगाया था।
ममता बनर्जी और कांग्रेस के रिश्तों में दिनोंदिन कड़वाहट घुलती जा रही है। कांग्रेस
के प्रदर्शनों और बयानों का जवाब देने के लिए टीएमसी कार्यकर्ता भी कोलकाता की सड़कों
पर उतरे। टीएमसी नेताओं ने साफ कहा कि ममता के बिना पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की
कोई हैसियत नहीं है। कांग्रेस चाहे तो गठबंधन से बाहर जा सकती है। हालांकि ममता खुद
इस प्रदर्शन में शामिल नहीं हुईं, लेकिन टीएमसी नेताओं ने केंद्र के नेताओं पर सीधा
निशाना साधा।
गौरतलब है कि टीएमसी और कांग्रेस में कई मुद्दों पर सार्वजनिक भिड़ंत हो चुकी है।
ममता बनर्जी ने तीस्ता जल बंटवारे, पेट्रोल की कीमत, रिटेल में विदेशी निवेश और
पेंशन बिल जैसे मुद्दों पर केंद्र के लिए परेशानी खड़ी की, तो कोलकाता में कांग्रेस
ने अपने कार्यकर्ताओं पर हमले और इंदिरा भवन का नाम बदलने के मुद्दे पर ममता सरकार
के खिलाफ प्रदर्शन किया।
तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच के लगातार बढ़ रही तल्खी से दोनों दलों के बीच
के गठबंधन को टूटने की आशंका बढ़ गयी है। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने
कहा कि कांग्रेस सीपीएम के साथ मिलकर उनकी पार्टी पर हमला करना चाहती है। ममता ने
ये बातें 'इंदिरा भवनÓ का नाम बदले जाने पर कांग्रेस के विरोध की प्रतिक्रिया देते
हुए कही। केंद्र में यूपीए की अहम सहयोगी तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ने यह भी कहा
कि लोकपाल बिल पर आखिरी फैसला लेने से पहले सभी राजनीतिक दलों की राय लेनी चाहिए।
ममता ने साफ कर दिया कि राज्यों में लोकायुक्त के गठन को लेकर अपने रुख पर वह अब भी
कायम हैं कि यह राज्यों पर छोड़ देना चाहिए कि वो किस तरह का लोकायुक्त गठित करना
चाहते हैं।
कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस की युवा शाखा की रैली में पार्टी ने एक बार फिर
आक्रामक रवैया अपनाते हुए साफ कर दिया कि ममता बनर्जी की पार्टी अकेले चल सकती है।
पार्टी के नेताओं ने कहा है कि गठबंधन के दरवाजे खुले हुए हैं और कांग्रेस जब चाहे
गठबंधन तोड़ सकती है। पार्टी की रैली में पहुंचे नेताओं ने कहा कि कांग्रेस को यह
साफ करना चाहिए कि वह किसके साथ गठबंधन करना चाहती है। पार्टी की मुखिया ममता बनर्जी
ने कहा था कि कांग्रेस चाहे तो गठबंधन से बाहर जा सकती है।
ममता ने कहा, हमारा मानना है कि लोकपाल सबकी सहमति से बनाना चाहिए और केंद्र सरकार
को इस बारे में सभी राजनीतिक दलों से बात करनी चाहिए। दोनों पार्टियों के बीच बढ़ती
दूरियों के संकेत पहले से ही मिल रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के कई शीर्ष नेता
सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके हैं कि उनकी पार्टी को पश्चिम बंगाल में सरकार चलाने
के लिए कांग्रेस के सहयोग की जरूरत नहीं है।
वहीं, कांग्रेस भी ममता की सरकार को घेरने में पीछे नहीं है। कांग्रेसी सांसद मौसम
नूर के नेतृत्व में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने कोलकाता में इंदिरा गांधी की
याद में रखे गए 'इंदिरा भवनÓ के नाम को बदलने के ममता के फैसले पर कड़ा ऐतराज जताया
है। ममता इस भवन का नाम मशहूर बंगाली कवि काजी नजरुल के नाम पर 'नजरुल भवनÓ रखना
चाहती हैं। युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने कोलकाता में इसी मुद्दे पर विरोध
प्रदर्शन किया है। कांग्रेस की सांसद मौसम नूर ने पश्चिम बंगाल सरकार के इस फैसले
की कड़ी आलोचना की है। वहीं, टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के अड़ंगे लगाने वाले रवैये
से तंग आ चुकी कांग्रेस ने उनसे पीछा छुड़ाने का मन बना लिया है। संसद में आंकड़ों की
भरपाई के लिए वह इसके बदले समाजवादी पार्टी को अपने पाले में लाने का मंसूबा बना रही
है, जिस पर मुलायम सिंह भी लगभग तैयार हैं। यूपी चुनाव के बाद इस नए राजनीतिक गठजोड़
को अमलीजामा पहनाया जा सकता है।
इन दोनों दलों के बीच हालांकि प्रेम कभी नहीं था, लेकिन सत्तारूढ़ होने के स्वार्थ
ने गठबंधन का मार्ग प्रशस्त किया। केंद्र में चल रहे गठबंधन को राज्य में भी प्रयोग
कर देख लिया गया। पर अब जबकि इस समझौते के रिश्ते में सहनशीलता जवाब देने लगी है और
संदेह का दायरा बढ़ता जा रहा है, ऐसा लग रहा है कि गठबंधन टूट जाएगा और अगर बचा रहा
तब भी गांठ पड़ेगी। ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच खटास बढ़ते देख एनडीए ने मौके का
फायदा उठाते हुए संकेत दे दिए कि वह ममता बनर्जी को शामिल करने तैयार है। इधर सुश्री
बनर्जी ने एकला चलो का नारा बुलंद करते हुए ऐलान कर दिया है कि चाहे सिंगूर हो या
नंदीग्राम वे जीवन भर अकेले ही लड़ते आयी हैं और आगे भी अकेले लड़ने का दम रखती हैं।
आम तौर पर द्वार स्वागत के लिए खोले जाते हैं, लेकिन ममता बनर्जी ने कांग्रेस को
बाहर का रास्ता दिखाने के लिए द्वार खोलने की घोषणा कर दी है। उनकी इस राजनीति का
केंद्र में कांग्रेस ने सीधा जवाब नहीं दिया, बल्कि संकेतों में अभिषेक मनु सिंघवी
ने स्पष्ट कर दिया कि सवा सौ वर्षों पुरानी कांग्रेस कभी किसी राजनीतिक चुनौती से
नहीं डरी है और न डरेगी। जबकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस अध्यक्ष ने साफ कह दिया है
कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस दोनों को सत्ता में आने का जनादेश प्राप्त हुआ है
और जब तक जनता नहीं चाहेगी, तब तक वे वापस नहीं होंगे। कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस
का गठबंधन गांठों का बंधन साबित होने लगा है, जिन्हें ढीला करने की कोशिश फिलहाल
दोनों ओर से नहीं हो रही है। यह राजनीति वक्त की मांग है। उत्तर प्रदेश में
कांग्रेस अपना दम दिखाना चाह रही है। अगर उसकी सीटों में इजाफा हुआ और समाजवादी
पार्टी भी ऐसा ही लाभ अर्जित करती है, तो उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार बनवाने में
सहयोग देकर केंद्र में मुलायम सिंह को अपना साथी बनाने में कांग्रेस को क्या ऐतराज
होगा। ऐसा करने से उसे आए दिन ममता बनर्जी द्वारा दी जाने वाली घुड़कियों से भी
निजात मिल सकती है।
ऐसा लग रहा है कि यूपीए गठबंधन में शामिल कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां अब उसी के
लिए सिरदर्द बन गई हैं। तृणमूल कांग्रेस की नाराजगी झेल रही कांग्रेस की अब
महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से भी तकरार बढ़ती नजर आ रही
है। म्यूनिसिपल कारपोरेशन के चुनावों के दौरान यह स्थिति खुल कर सामने आ गई।
कांग्रेस पार्टी के नेता अजित सावंत ने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को पत्र लिख
कर पूछा है कि क्यों कांग्रेस की कीमत पर एनसीपी को बढ़ने का मौका दिया जा रहा है?
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