
Posted Wed, 02/01/2012 - 23:00 by admin
संजय
मणिपुर अशांत है और जनता संज्ञाशून्य हो चुकी है। जनजातियों के झगड़ों में फंसा यह
प्रदेश चुनावों को लेकर निर्विकार सा है। मतदाता जानने लगा है कि सत्ता बदलने से भी
नियति व तकदीर नहीं बदलने वाली। एक भीतरी झलक।
पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में सबसे कम चर्चा जिन राज्यों के चुनावों
की हो रही है वे हैं मणिपुर और गोवा। देश के पूर्वोत्तर हिस्से में बसा मणिपुर कई
मामलों में बेहद अलग है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि जिस राज्य में सबसे ज्यादा
शासन कांग्रेस ने किया है उस राज्य का भारत में विलय १५ अगस्त १९४७ को देश को मिली
आजादी के तकरीबन दो साल बाद १५ अक्टूबर १९४९ को हुआ था। पिछले दस साल से राज्य की
सत्ता कांग्रेस के ओकरम इबोबी सिंह के पास है और वे भाकपा के सहयोग से सरकार चला रहे
हैं। धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील मोर्चा के नाम से यह गठबंधन लगातार तीसरी बार सूबे की
सत्ता में वापसी का सपना पाले हुए है। राज्य विधानसभा में ६० सीटें हैं और यहां जो
भी गठबंधन ३१ के जादुई आंकड़े को हासिल करेगा, सरकार उसी की बनेगी।
जानकारों का कहना है कि २८ जनवरी को हुए चुनावों में कांग्रेस की जीत को लेकर
स्पष्ट दावा नहीं किया जा सकता। कांग्रेस को राज्य में कई तरह के विरोधों का सामना
करना पड़ रहा है। चुनाव प्रचार अभियान के दौरान राज्य के सात विद्रोही संगठनों ने
बाकायदा यह बयान जारी किया कि कांग्रेस किसी तरह का कोई चुनाव प्रचार अभियान राज्य
में न चलाए। इन संगठनों का मानना है कि राज्य की कांग्रेस सरकार जनविरोधी है।
मणिपुर पुलिस के कमांडो दल द्वारा किए गए फर्जी मुठभेेड़ों को लेकर इस राज्य के लोगों
में गुस्सा है। हालांकि, कांग्रेस इन बातों को बेबुनियाद बताती है। कांग्रेस मणिपुर
के लोगों को यह बता रही है कि अशांत समझे जाने वाले राज्य में राजनीतिक स्थिरता लाने
का श्रेय कांग्रेस को ही जाता है और केंद्र में सरकार होने की वजह से वह राज्य के
लिए बहुत कुछ कर सकती है। हालांकि, लोग यह भी बता रहे हैं कि कांग्रेस अपने
उम्मीदवारों पर हुए छिटपुट हमलों की वजह से इस बात को लेकर चिंतित है कि कहीं लोगों
के बीच उसके खिलाफ माहौल तो नहीं बना हुआ है।
मणिपुर की राजनीति को समझने वाले लोगों का मानना है कि भले ही मणिपुर में पिछले दस
साल से एक सरकार हो, लेकिन गवर्नेंस के मामले में यह सरकार बिल्कुल नाकाम रही है।
यही वजह है कि पिछले दस सालों में राज्य में न तो सामुदायिक तनाव घटा है और न ही
चक्का जाम जैसी समस्याओं सेे निजात मिली है। पिछले ही साल देखा गया कि पूर्वोत्तर
के इस राज्य में चार महीने तक नाकेबंदी चली। सदर हिल्स के मसले पर यह नाकेबंदी शुरू
हुई थी। कुकी जनजाति के लोगों ने नागा बहुल सेनापति जिले से काटकर सदर हिल्स के नाम
से एक अलग जिला बनाने की मांग की थी। इसका विरोध नागाओं नेे किया और उन्होंने जवाबी
नाकेबंदी कर दी। इसका नतीजा यह हुआ कि इंफाल और अन्य पहाड़ी जिलों के लोगों को कई
तरह की परशानियों का सामना करना पड़ा। नाकेबंदी से आम लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो
गया और इस वजह से बढ़ी कीमतों ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया। इसके अलावा
मानवाधिकारों के हनन के मामले में भी कांग्रेस के शासनकाल में कमी नहीं आई और
भ्रष्टाचार के नए-नए मामले भी समय-समय पर लोगों के सामने आते रहे। जानकार इन
समस्याओं को नहीं सुलझाने के लिए कांग्रेस और मौजूदा मुख्यमंत्री को जिम्मेदार
ठहराते हैं।
इस राज्य में यह भी कहा जा रहा है कि उम्मीदवारों की हार-जीत तय करने में स्थानीय
मुद्दों की विशेष भूमिका होगी। इन मसलों में गांव की सड़कों की हालत और पेयजल
आपूर्ति में सुधार जैसे विषय प्रमुख हैं। वहीं राज्य की सीमाओं की सुरक्षा से लेकर
लगातार हो रही नाकेबंदी और आर्म्ड फोर्स स्पशल पावर एक्ट यानी एएफएसपीए के मसले पर
भी हर दल अपनी रोटी सेंकने की ताक में लगा रहा है। हालांकि, जानकार यह भी बता रहे
हैं कि एएफएसपीए राज्य में अब तक ऐसा मसला नहीं बन पाया है जिसकी वजह से चुनावी
नतीजों पर कोई असर पड़ सके। इस बीच संयुक्त नागा परिषद ने सियासी पार्टियों की
मुश्किलें बढ़ाने का काम जरूर किया। इसने नागा बहुल इलाकों के लिए वैकल्पिक
प्रशासनिक बंदोबस्त करने की मांग की है।
२०११ की नाकेबंदी खत्म कराने से लेकर अन्य मोर्चों पर कांग्रेस की नाकामी का फायदा
उठाने की कोशिश विपक्ष ने बाकायदा मोर्चा बनाकर की। इस मोर्चे में मणिपुर पीपुल्स
पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और माकपा शामिल हैं। हालांकि, सियासी
जानकारों का कहना है कि विपक्ष इस राज्य में इतना कमजोर है कि वह अपने बूते फायदा
नहीं उठा सकता, लेकिन जिस तरह से विद्रोही संगठनों ने कांग्रेस पर प्रतिबंध लगाया
है और बहिष्कार की अपील की है उसका फायदा विपक्ष को जरूर मिल सकता है। जानकार यह भी
बता रहे हैं कि अगर यहां के नतीजों में तृणमूल कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता मिलती
दिखे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
- admin's blog
- Login to post comments












