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Posted Wed, 02/01/2012 - 23:31 by admin

- सच्चे गुरु और सही नेता के गुण क्या हैं? मानव इन गुणों को पहचाने कैसे?
सच्चे गुरु और सही नेता वर्णरहित और वर्गरहित होते हैं। सच्चे युगदृष्टा, सच्चे मार्गदर्शक व सच्चे गुरु का न तो कोई वर्ण होता है न ही वर्ग 'न होय वर्ग न होय वर्ण सांचा गुरु सोई न ब्राह्मण न क्षत्रिय न वैश्य न शूद्र कोई भी वर्ण नहीं। न बुद्ध न हिन्दू न सिख न मुसलमान न ईसाई न कोई सम्प्रदाय न कोई संगठन कोई भी वर्ग नहीं।
सच्चा गुरु और सच्चा नेता केवल एक उत्कृष्ट मानव होता है सिर्फ एक आत्मबली आत्मवान होता है। आत्मबली आत्मवान श्रेष्ठ मानव ही गणनायक होता है। जिसका ज्ञान-ध्यान सदा सुपात्र की ओर ही प्रवाहित होता है और उसका कर्म सदा परम उद्देश्य हेतु परम चेतना से संयुक्त हो निर्देशित होकर संचालित होता है और युगचेतना को ही समर्पित होता है।
सच्चा गुरु केवल दो ही गुणों का पुंज होता है-एक है आत्मिकता और दूसरा आत्मीयता। दोनों ही ईश्वरीय शाश्वत परा गुण हैं। आत्मिकता आत्मगुण से परिपूर्ण और आत्मीयता स्वार्थरहित अपनत्व एकत्व स्वत: स्फूर्त स्नेह। ये दोनों शब्द ही ऐसे शब्द हैं जो कभी भी अपना स्वभाव स्वरूप गुण अर्थ तत्व नहीं बदलते। दोनों शब्दों का अर्थ भाव गुण व महत्व सदा एक समान रहता है। इनका सत्य एक ही रहता है जो कभी भी किसी भी स्थिति दशा या दिशा में परिवर्तनशील नहीं है। दिव्यता परिलक्षित होती है इनको धारण किए मानव में।
अरे मानव! चेत, सच्चा गुरु तो तेरे अन्तर में ही है अगर उसे नहीं सुन पाता तो वो तेरी अपनी ही अक्षमता है। पर परमचेतना अत्यंत कृपालु है, अपने ऊपर सत्यता से हर निश्चय से व पूरी आस्था से काम करना शुरू कर तो सही, वो परम चेतना स्वत: ही कोई न कोई गुरुस्वरूप माध्यम भी देगी और सही परिस्थितियाँ भी प्रवाहित करेगी।
- लोक उपासना क्या है? लोकोपासक के धर्म की समृद्घि कहाँ तक है?
आत्मा ही लोक है आत्मा का निरन्तर उत्थान ही उसकी उपासना है। उपासना का अर्थ है भला चाहना आत्मा का भला चाहना है, सत्यमय, प्रेममय और कर्त्तव्यमय जीवन जीना और आत्मा को संतुष्ट रखना अन्तरात्मा में ही परमात्मा, परम-आत्मा मानना परमात्मा को सन्तुष्ट रखना उसको परम हितैषी जान उसी का अनुसरण करना।
लोक उपासना करने वाले का कर्मक्षय नहीं होता उसके कर्म व्यर्थ नहीं जाते इस आत्मा से वह जो जो चाहता है वह व्यर्थ नहीं जाते। उसके कर्म क्षीण नहीं जाते वह अवश्य फलदायी होता है। आत्मज्ञान से मोक्ष मिलता है।
लोकोपासक वो है जो कि धर्म पर चले, यज्ञ होम इत्यादि करे। वह देवों का लोक है देवलोक वही है जहाँ यह कर्म नित्य हो। जहाँ वेदों का पठन पाठन हो वह ऋषियों का लोक है। पितरों को सन्तुष्ट रखे वही पितृलोकोपासना है। अतिथि को घर में रख सेवा कर खाना दें वह मनुष्य लोक है। पशुओं को दाना तिनका दें वह पशु लोकोपचार है। घर में चींटी आदि जीव उन सबका लोक है।
जिस प्रकार मनुष्य स्वयं ठीक ठीक आहार लेकर आरोग्य की कामना करता है वैसे ही सब प्रकार के लोकोपचार अथवा लोकोपासना करने वाले को, सब प्राणी सब जीव आरोग्य चाहते हैं।
यही सत्य है।
- प्रभु प्राप्ति क्या है? प्रभु प्राप्ति के माध्यम कौन-कौन से हैं?
प्रभु, ईश्वर, अल्लाह ख़्ाुदा भगवान कुछ भी कह लो बाहर कुछ भी नहीं है। प्रभु प्राप्ति का अर्थ है आत्मा की सबसे उन्नत अवस्था सर्वोत्कृष्टï अवस्था आन्तरिक उत्कृष्टïता प्राप्त कर लेना यही है भगवान होना। यही सत्य है। सत्य ज्ञान, मानव-शरीर धारी ही ईश्वर का प्रतिरुप है इस सत्य, ध्रुव सत्य का ज्ञान होने से पहले तीन अवस्थाओं से पार होना पड़ता है तब चौथी सम्पूर्ण मानव की अवस्था आती है।
- आत्म विकास की तीन अवस्थाएं-
1. प्रज्ञान ब्रह्म - प्रज्ञा चेतना जागृति
2. अयमात्मा ब्रह्म -ईश्वर साक्षात्कार
3. अहम् ब्रह्मास्मि-आत्मानुभव
4. तत्वमसि- जगतोद्धार विश्व कल्याण
चौथी में उत्कृष्ट आत्मा स्थिर हो जाता है और निर्वाण पाता है। सबसे बड़ा सत्य यही है न इसके बाद कुछ हुआ न होगा यही सत्य अविनाशी है जो कभी नष्ट न होगा । यही है परम सत्य परम वचन।
पूजा अर्चना योग ध्यान जप तप सब साधन हैं प्रभु प्राप्ति के, पर गारंटी नहीं कि इतना सब करने पर भी प्रभु मिलेंगे ही। प्रभु मिलते हैं सत् व्यवहार (मन वचन कर्म से) सत्यमार्गी, सत्य कर्ममार्गी, सत्य प्रेममार्गी को।
'मैं सबमें हूँ'
यही सत्य है
ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम:
प्रणाम मीना ऊँ
 

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