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Posted Wed, 02/01/2012 - 22:34 by admin

मुकेश श्रीवास्तव / मृत्युंजय दीक्षित
उ.प्र. की राजनीति में मुस्लिम समुदाय एक वोट बैंक की तरह माना जाता है। इसका सबसे अधिक फायदा कांग्रेस ने उठाया है। अपनी पुनर्वापसी की कोशिश में कांग्रेस द्वारा फेंके गये मुस्लिम कार्ड के महत्व व परिणामों का विश्लेषण।
उत्तर प्रदेश सहित पंजाब उत्तराखंड मणिपुर व गोवा में सभी राजनैतिक दलों में चुनावी गतिविधियां चरम पर हैं। ये चुनाव कांग्रेस व भाजपा सहित बसपा व अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अगले लोकसभा चुनावों में केन्द्रीय सत्ता की कुंजी किस दल के पास होगी, इसकी तस्वीर इन चुनावों से एक हद तक साफ हो जायेगी। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी के राजनैतिक जीवन के लिए भी खासे महत्वपूर्ण हंै क्योंकि यहीं से यह तय होगा कि उनके प्रधानमंत्री बनने का मार्ग किस तरह प्रशस्त होता है। स्वयं राहुल गांधी भी इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं और उन्होंने उत्तर प्रदेश को एक मिशन व चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया है। उसी मिशन के तहत वे उत्तर प्रदेश में चुनावी अभियान में निकले भी हैं।
अगर राहुल गांधी के प्रयासों से उप्र में कांग्रेस बढ़त प्राप्त करने मेंं थोड़ी भी सफलता प्राप्त करती है तो उनका राजनैतिक भविष्य चमकदार हो जाएगा, अन्यथा फिर लंबा इंतजार करना होगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से देश की राजनीति में प्रमुख भूमिका में रहने व अधिकांश समय सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस पार्टी ने अपने युवराज राहुल गांधी के सपनों को पूरा करने के लिए मिशन-२०१२ के तहत अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इसीलिए केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के ठीक पहले सियासी लाभ कमाने की दृष्टि से अन्य पिछड़ों के २७ प्रतिशत आरक्षण में से साढ़े चार प्रतिशत कोटा मुस्लिम अल्पसंख्यकों को देने का निर्णय लिया गया है। यह निर्णय एक जनवरी २०१२ से लागू हो जाएगा। यह आरक्षण अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों के अलावा केंद्रीय शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश में भी सहायता करेगा। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम १९९२ के अन्तर्गत मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध व पारसी समुदायों को अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा दिया गया है।
कांग्रेस के लिए यह निर्णय राजनैतिक मजबूरी तो है ही, साथ ही यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि कांग्रेस अपने मुस्लिम वोट बैंक को प्राप्त करने के लिए भारतीय संविधान की मूल आत्मा के साथ छेड़छाड़ करने पर उतारू हो गई है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या कांग्रेस का यह निर्णय राहुल गांधी के भविष्य को सुधार पाएगा? नि:संदेह केंद्र सरकार की गिरती साख व बिखरते संसदीय प्रबंधन के बीच कांग्रेस सरकार का यह निर्णय अदूरदर्शितापूर्ण ही नहीं अपितु असंवैधानिक भी है और यह मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय में खारिज भी हो सकता है। वैसे भी यह कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है कि वह देश को अपनी सुविधा के हिसाब से नियंत्रित व व्यवस्थित करती रही है। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब देश के समक्ष एफडीआई, लोकपाल व अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों पर सदन में चर्चा होनी थी। कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक के तुष्टीकरण का सर्वाधिक घिनौना खेल उस समय खेला जब सदन में लोकपाल बिल पर चर्चा प्रारम्भ होने जा रही थी। उसके इस खेल के सहयोगी बने सपा, राजद और लोजपा। सपा नेता मुलायम सिंह और राजद नेता लालू यादव ने लोकपाल बिल लोकसभा में तब तक प्रस्तुत नहीं होने दिया, जब तक सरकार ने उसमें अल्पसंख्यक आरक्षण का प्रावधान नहीं कर दिया। एक प्रकार से सपा, बसपा, लालू प्रसाद व रामविलास पासवान सरीखे नेता भी कांग्रेस को मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल खेलने के लिए प्रेरित करते रहे हैं।
कांग्रेस के लिए यही क्षेत्रीय दल भारी परेशानी का सबब बन चुके हैं। रही बात उप्र विधानसभा चुनावों की तो वहां पर कांग्रेस, सपा, बसपा ही नहीं अपितु पीस पार्टी जैसे अन्य छोटे दल व गठबंधनों की निगाह भी मुस्लिम वोटों पर ही गड़ी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश भर में जितने भी चुनाव हुए हैं उनमें अल्पसंख्यक मतों का रुझान प्राय: कांग्रेस की ओर रहता आ रहा है। लेकिन अब परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। मुस्लिम मतों में भी बिखराव आ चुका है। कांग्रेस ने इस बिखराव को कम करने और मुस्लिमों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ही आरक्षण रूपी यह घटिया चाल चली है। वर्तमान में मुस्लिम आरक्षण पूरी तरह असंवैधानिक है क्योंकि भारतीय संविधान में धार्मिक आधार पर किसी धर्म विशेष को आरक्षण नहीं दिया जा सकता। देश के संविधान में केवल अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के ही आरक्षण की व्यवस्था है। चुनावों से पूर्व कोटा मेंं कोटा तय करने से कांगेस को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।
मुस्लिम आरक्षण की घोषणा होते ही कई पिछड़ा वर्ग संगठनों ने इस निर्णय पर आपत्ति जताई है। अत: मुस्लिम आरक्षण कार्ड खेलने के चक्कर में वह पिछड़े वर्ग के वोटों से हाथ धो सकती है। साथ ही यह भी आवश्यक नहीं कि इस घोषणा से प्रदेश का मुस्लिम समाज शत-प्रतिशत कांग्रेस की ओर घूम जाएगा। आइए जरा नजर डालें कि कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण का मास्टर स्ट्रोक क्यों चला है? उप्र में १००-१२५ विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मत प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालते हैं। केंद्र सरकार ने यह निर्णय नौ राज्यों- आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, केरल और सिक्किम के आरक्षण कानूनों को आधार मानकर यह निर्णय लिया है। इन राज्यों की सरकारों ने आरक्षण कोटे में एक और आरक्षण कोटा अल्पसंख्यकों के लिये निर्धारित किया है वह भी कार्यकारी आदेश के जरिये। केवल बिहार व महाराष्ट्र की विधानसभा ने ही इस सम्बन्ध में प्रस्ताव पारित करके नियम बनाया है। उक्त मुस्लिम आरक्षण पर सभी दलों ने अपने-अपने सियासी फायदे वाले बयान दिये हैं।
यह चिंताजनक है कि देश जब तुष्टिकरण की राजनीति के दुष्प्रभाव से मुक्त हो रहा था तब कांग्रेस ने तुष्टिकरण की यह बेहद खतरनाक चाल चली है। महंगाई, घोटाले व बिगड़ती आर्थिक स्थिति सरकार की गिरती साख के बीच कांग्रेस ने इस तरह लोगों को दिग्भ्रमित किया है। वैसे भी यूपीए के दूसरे कार्यकाल में जितने भी काम हो रहे हैं, वे सभी किसी न किसी तरह से असंवैधानिक व देश की संसदीय गरिमा तथा परम्पराओं को तहस-नहस करने वाले दिखाई दे रहे हैं। लगता ही नहीं है कि सरकार संविधान के हिसाब से चलाई जा रही है अपितु कुछ लालची राजनीतिज्ञों एवं एक परिवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु देश के संविधान की मूल आत्मा के साथ ही खिलवाड़ किया जा रहा है।
मुस्लिम आरक्षण की घोषणा होने के बाद ही भाजपा ने अपने परम्परागत अंदाज मेेंं मुस्लिम आरक्षण का कड़ा विरोध किया है। भाजपा का मत है कि कांग्रेस मुसलमानोंं को लगातार गुमराह कर रही है। मुस्लिम आरक्षण का खेल खेलकर वह देश विभाजन का एक और आधार तैयार कर रही है। उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाजपा की फायर ब्रांड नेता उमा भारती का कहना है कि धार्मिक देश मे धर्म के आधार पर आरक्षण होता हैै। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है यहां पर धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। अत: कांग्रेस पार्टी अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए युवराज राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए सभी प्रकार के कार्य करने में जुट गई है। कांग्रेस व उसके सहयोगियों के इस खेल को देश का जनमानस समझ तो रहा है लेकिन यह बेहद दुर्भाग्य की बात है कि वह इन प्रयासों के विरुद्ध एकजुट नहीं हो पा रहा है।
आज देश का बहुसंख्यक समाज जातिवाद व क्षेत्रवाद की राजनीति के फेर में फंस गया है। बहुसंख्यक समाज यदि इस प्रकार के राजनैतिक हथकण्डों के दावानल को समाप्त करने के लिए एकजुट हो जाए तो कोई भी सरकार मुस्लिम आरक्षण जैसे देश की समरसता के लिये घातक निर्णय लेने का दुस्साहस नहीं कर सकती।
उप्र में मुस्लिम तुष्टिकरण में माहिर सपा का कहना है कि ४.५ प्रतिशत आरक्षण की घोषणा कांग्रेस का छलावा मात्र है। सपा का मत हैै कि इस बार के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम आरक्षण के लालच में प्रदेश का मुसलमान फिलहाल कांग्रेस का साथ देने वाला नहीं है। मुस्लिम वोट बैंक प्राप्त करने के चक्कर में सभी पार्टियां अपने उम्मीदवार घोषित करते समय मुस्लिम उम्मीदवारों पर कृपादृष्टि बना रही हैं। सभी पार्टियां इस बात का विशेष ध्यान रख रही हैं कि मुस्लिम मतदाता इनसे नाराज न हो जायें। चुनाव प्रचार में मुस्लिम समाज के विकास के लिए विशेष बातें कही जा रही हैं कि येन केन प्रकारेण यह समाज इनकी ही पार्टी को वोट दे दे। पीस पार्टी कह रही है मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाया जाए, तो सपा में एक खेेमा प्रचार करता है कि मुस्लिम मुख्यमंत्री के रूप में आजम खान को प्रस्तुत किया जाये।
अब यह परम आवश्यक प्रतीत हो रहा है कि आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय की पूर्णपीठ नये सिरे से विचार करे। यदि अब ऐसा नहीं किया गया तो यह देश के लिए बेहद खतरनाक होने वाला है। भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ तो समाज सेवी अन्ना हजारे ने जन जागरुकता पैदा की है लेकिन क्या कोई इस विकराल व खतरनाक हो चुकी आरक्षण प्रक्रिया के खिलाफ उठने का साहस दिखा सकेगा? नहीं, क्योंकि भारत की जो वर्तमान सामाजिक परिस्थितियां हैं उनमें अभी भी कई वर्गोंं को आरक्षण की जरूरत है। लेकिन मात्र सत्ता हासिल करने के लिये जाति-धर्म आधारित आरक्षण के खेल ने हमारी सामाजिक सद्भावना को न केवल तहस-नहस किया है अपितु उससे बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा है। आवश्यकता है कि जनता राजनीतिज्ञों के इस दुष्चक्र को समझे और निर्णय ले। असंवैधानिक आरक्षण तो असंवैधानिक ही है। पंथ आधारित आरक्षण का विरोध तो संविधान सभा की बैठकों में डा. अंबेडकर ने भी किया था। फिर भी यह देखना दिलचस्प हो गया है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम वोट बैंक किसके हाथ लगता है।
 

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