
Posted Wed, 02/01/2012 - 23:09 by admin
संजय
ओसामा बिन लादेन की अमरीकी सैन्य बलों द्वारा हत्या के साथ ही पाकिस्तान की
लोकतांत्रिक सरकार और सेना दोनों की ही विश्वसनीयता जनता की नजरों में संदेह के घेरे
में आ गयी है। विश्वास बहाली के बीच सत्ता पर परोक्ष कब्जे की सेना की कोशिशों ने
स्थिति को गंभीर बना दिया है।
पाकिस्तान एक बार फिर ऐसे मोड़ पर है, जहां इससे पहले भी वो कई बार आ चुका है। लेकिन
इस बार स्थितियां थोड़ी अलग हैं। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की लोकतांत्रिक सरकार,
सेना और न्यायपालिका तीनों में सर्वोच्चता साबित करने की होड़ चल रही है। पाकिस्तान
के प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी साफ कर चुके हैं कि वो देश के सुप्रीम कोर्ट नहीं
बल्कि संसद के प्रति जवाबदेह हैं, उनकी इस बात पर विपक्ष भी सहमत दिखा है। गिलानी
द्वारा सेना को निशाने पर लेने और रक्षा सचिव को बर्खास्त किये जाने पर खुद सेना
तिलमिलाई हुई है-उसने दो-टूक लहजे में चेतावनी भी दे डाली। हालांकि फिर प्रधानमंत्री
गिलानी, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और सेना प्रमुख कयानी के बीच मुलाकातों को दौर
भी चला, लेकिन लगता नहीं कि कोई भी ज्यादा झुकनेेे को तैयार है। अलबत्ता पाकिस्तान
की इन तीनों सर्वोच्च संस्थाओं के बीच उभरे गहरे मतभेदों ने देश की राजनीतिक स्थिरता
पर सवाल जरूर उठाये हैं। देश की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर कई सवाल उभरे हैं - क्या
सुप्रीम कोर्ट भ्रष्टाचार के मामले में गिलानी सरकार पर आने वाले समय में और शिकंजा
कसेगा? क्या सेना हमेशा की तरह फिर तख्तापलट कर खुद देश की बागडोर संभालेगी? या
कमजोर और अलोकप्रिय हो चुकी इस सरकार को जाना होगा तथा देश में जल्दी ही नये सिरे
से चुनाव होंगे?
जहां तक पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट की बात है तो राष्ट्रपति जरदारी और प्रधानमंत्री
गिलानी के उसके संबंध कभी अच्छे नहीं रहे। सरकार ने कई बार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों
को ताक पर रख दिया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की जरदारी के प्रति
अरुचि भी जगजाहिर है। वो इसे कई बार जाहिर भी कर चुके हैं। फिलहाल सेना और
न्यायपालिका का पलड़ा भारी है, क्योंकि ये दोनों ही गिलानी सरकार के विरुद्ध खड़े
हैं।
पाकिस्तान की राजनीति में संकट पिछले साल ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अमेरिका
में पाक के पूर्व राजदूत हक्कानी द्वारा वहां की सरकार को भेजे एक मेमो से शुरू हुई,
जिसे अब मेमोगेट कांड के तौर पर चर्चित किया जा रहा है। दरअसल हक्कानी ने इस मेमो
में पाकिस्तान में फौजी तख्तापलट की आशंका जतलाते हुए मदद का संदेश भिजवाया था, माना
जा रहा है कि ये मेमो राष्ट्रपति जरदारी के संकेत पर ही भिजवाया गया था। जब ये बात
सार्वजनिक हुई तो हक्कानी को न केवल राजदूत के पद से इस्तीफा देना पड़ा बल्कि
पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पर लंबी लंबी सफाई देनी पड़ी। बस यहीं से सरकार और सेना
के बीच टकराव का दौर शुरू हो गया।
फौज ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट से जांच का आग्रह किया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस
मामले की जांच के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट कुछ दिनों में पेश होने वाली है। इसमें
किसकी जीत और किसकी हार होगी, यह वक्त बताएगा। किंतु यह नजर आ रहा है कि अपना
वर्चस्व जताने के लिए सेना जिस तरह सुप्रीम कोर्ट की आड़ लेती रहती है, इस बार भी
उसने वही चाल चली है। दूसरा मसला है एनआरओ, अर्थात नेशनल रिकन्सीलिएशन आर्डिनेन्स।
सैन्य शासक जनरल परवेज मुशर्रफ ने 2007 में इस कानून के द्वारा बेनजीर भुट्टो और
उनके पति आसिफ अली जरदारी के पाकिस्तान वापस लौटने का रास्ता साफ कर दिया था, यह
आश्वासन देते हुए कि उनके खिलाफ सभी मामले सैन्य सरकार द्वारा वापस ले लिए जाएंगे।
इसके बाद चुनावी सभा में बेनजीर भुट्टो की हत्या हो गई और आनन-फानन में आसिफ अली
जरदारी राष्ट्रपति बना लिए गए। 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक
घोषित कर दिया और अब वह किसी भी कीमत पर श्री जरदारी के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के
तमाम आरोपों की जांच का रास्ता खोलना चाहता है। प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने
जरदारी के खिलाफ जांच प्रारंभ नहीं करवाई, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अदालत की
अवमानना करने का दोषी ठहराते हुए उन्हें व्यक्तिगत तौर पर अदालत में पेश होने को
कहा। वह पेश भी हुए। इधर पाकिस्तानी संसद ने एक विशेष सत्र बुलाकर लोकतंत्र और
संविधान के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया। इस मामले पर सभी सियासी दल एकमत हैं कि
संसद सर्वोपरि है। पिछले कुछ दिनों से गिलानी लगातार सेना पर खुले तौर पर निशाना
साधते रहे हैं। उन्होंने सार्वजनिक बयानों में सेना और सेना प्रमुख दोनों पर निशाना
साधा है। जिस पर सेना ने भी उन्हें गंभीर चेतावनी दे डाली। सेना ने पिछले दिनों
बयान जारी कर प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के उस इंटरव्यू पर कड़ी प्रतिक्रिया
व्यक्त की थी, जिसमें प्रधानमंत्री ने मेमो विवाद के मामले में सेनाध्यक्ष और
आईएसआई के प्रमुख की आेर से जवाब पेश करने को गैरकानूनी बताया था। लेकिन इस आग में
गिलानी ने तब और घी डाल दिया जब उन्होंने सीधे सीधे सेना को चुनौती देकर केंद्रीय
रक्षा सचिव लेफ्टीनेंट जनरल (रिटायर्ड) नईम खालिद लोधी को बर्खास्त कर डाला।
पाकिस्तान में तख्तापलट होता है या नहीं, इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि
सभी पक्षों के पूरे पत्ते फिलहाल खुले नहीं हैं। लगता नहीं कि सेना भी तख्तापलट के
मूड में है, इसकी वजह जनता की जबरदस्त नाराजगी और असंतोष को न्योता देना होगा बल्कि
अमेरिका की नाराजगी भी मोल लेनी होगी, लिहाजा इसीलिए अब तक सेना ने ऐसा कुछ करने का
संकेत नहीं दिया है। बल्कि माना जा रहा है कि सेना खुद चाहती है कि जल्दी ही नये
सिरे से चुनाव हों और कोई ऐसी सरकार सत्ता में आये, जो उसे भी स्वीकार्य हो। इस तौर
पर पूर्व क्रिकेटर इमरान खान का नाम तेजी से सामने भी आया है। न केवल उनकी
लोकप्रियता पाकिस्तान में बढ़ रही है बल्कि वह सभी वर्गों में स्वीकार्य लगते हैं,
सेना से उनके संबंध अच्छे बताये जाते हैं, साथ ही यूरोप और अमेरिका भी उन्हें
प्रगतिवादी और आधुनिक नजरिये वाला नेता मानते हैं।
भारत के लिए जरूरी है स्थिर पाक
दुनियाभर में तमाम देश हैं, उनकी अपनी व्यवस्थाएं हैं और अपनी सुरक्षा के लिए उनके
पास सेनाएं होती हैं, लेकिन असल पाकिस्तान एक सेना है, जिसके पास देश है।
अफगानिस्तान में अस्सी के दशक में रूसी सेनाओं की वापसी के बाद से पाकिस्तान में
हालात तेजी से बदले हैं और सेना कहीं ज्यादा मजबूती से उभरी है और पाकिस्तान के
तंत्र पर असल में उसका शिकंजा मजबूत होता गया है। कहा जाता है कि पाकिस्तान में
हमेशा से तीन ए फैक्टर खास रोल निभाते रहे हैं, ये तीन ए हैं - अल्लाह, अमेरिका और
आर्मी। इस देश में हर समस्या के आगे पीछे यही तीनों फैक्टर काम करते हैं। आजादी के
बाद से पाकिस्तान में हालात हमेशा से ही अस्थिर और अराजक रहे हैं। जिस राष्ट्रवाद
के सिद्धांत के आधार इसे बनाया गया था, उस पर वो एक दिन भी नहीं चल पाया। यूं भी
भारतीय उपमहाद्वीप में भारत को छोड़कर कहीं भी लोकतंत्र की जड़ें कभी मजबूत नहीं रही
हैं। पाकिस्तान में सेना का राज चलता है। बांग्लादेश में उलटफेर होते रहते हैं।
नेपाल में उथलपुथल का दौर हमारी आंखों के सामने है, वहां सही मायनों में कभी
लोकतंत्र रहा भी नहीं। दक्षिण एशिया के दूसरे देश भी इन झंझावातों से अलग नहीं हैं।
ये हमारी ही विशेषता है कि हमारे यहां लोकतंत्र लगतार मजबूत होता गया है बल्कि इस
पर कायम भी हैं। अपवाद स्वरूप कभी कभी ये जरूर लगा कि हमारा लोकतंत्र कमजोर हो रहा
है, कुछ ताकतें इसे ठेस पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन हर बार इस तरह के
झटकों के बाद हमारा लोकतंत्र और मजबूत ही हुआ है।
लोकतंत्र ही खासियतें लोक हैं, जहां बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों देश की मुख्य
धारा में हों और दोनों देश की तरक्की में बराबरी से कंधा से कंधा मिलाकर चल रहे
हों। भारत में ऐसा ही है। हमारे यहां अल्पसंख्यक न केवल सुरक्षित हैं बल्कि ऊंचे
पदों पर भी हैं-चाहे आप मौजूदा प्रधानमंत्री की बात करें या फिर योजना आयोग के
अध्यक्ष की। हमारे मौजूदा उपराष्ट्रपति, राज्यसभा के उपसभापति अल्पसंख्यक वर्ग से
ही आते हैं। हमारी सेनाओं, ब्यूरोक्रेसी में और राजनीति में अल्पसंख्यक भारी संख्या
में हैं, वो ऊंचे पदों पर हैं, कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं और इस तरह देश की
मुख्यधारा से सक्रिय तौर पर साथ जुड़े हैं। समय के साथ और देश में लगातार हो रहे
विकास के साथ लोकतंत्र का ये पहलू और दमदार हो रहा है।
वहीं पाकिस्तान में आजादी के बाद से ही बिखराव का दौर चल रहा है। इसका नुकसान सबसे
ज्यादा कोई और नहीं बल्कि हम ही झेल रहे हैं। स्थायी पाकिस्तान हमारे लिए ज्यादा
जरूरी है-वहां शांति और स्थिर सरकार की अवधारणा से हम विकास के रास्ते में और
ज्यादा असरदार तरीके से कदम बढ़ा सकते हैं बल्कि खुद पाकिस्तान को भी इसका लाभ पहुंच
सकता है। लेकिन अभी तक वहां के धार्मिक कट्टरवाद और सरकारों ने जनता का दोहन ही
किया है बल्कि अवाम को बेवकूफ ही बनाया है। वहां के राजनीतिक वर्ग को अब अपनी
जवाबदेही के बारे में सोचना होगा। धार्मिक कट्टरवाद से देश का भला नहीं होने वाला।
पाकिस्तान भी अब उस मोड़ पर खड़ा है, जहां ये साफ है कि निजाम नहीं बदला तो अवाम उसे
बदल देगा। वहां लोकतंत्र, उदारवाद और उदार धार्मिकता को आगे बढ़ाने की जरूरत है,
इस्लाम का जो चेहरा पाकिस्तान लोगों के सामने रखने की कोशिश कर रहा है, वो इस्लाम
का असली चेहरा नहीं है। इस्लाम की विशालता कम नहीं है, ये भी सभी पंथों को मान्यता
देता है। दरअसल तालिबान और अलकायदा ने इस्लाम को नुकसान पहुंचाया है। पाक को अपने
शत्रुओं से बचना होगा और इन्हें पहचानना होगा। अलकायदा, तालिबान और कट्टरवाद ही देश
के लिए आस्तीन के सांप साबित हो रहे हैं और पाकिस्तान के लिए भस्मासुर का काम कर
रहे हैं। इसे पाकिस्तान के नेतृत्व और सेना को समझना होगा। ऐसा नहीं है कि
पाकिस्तान में बेहतर, योग्य और दूरदर्शी नेताओं की कमी है। कई नेता ऐसे हैं जो देश
को आगे ले जा सकते हैं, अवाम की सोच को ज्यादा बेहतर कर सकते हैं। अगले दो चार साल
पाकिस्तान के लोकतंत्र के लिए खासे महत्वपूर्ण हैं। इमरान खान जैसे नेता देश को आगे
ले जा सकते हैं। नवाज शरीफ की पार्टी ने भी अपने तौर-तरीकों में बदलाव किया है, अब
वह देश में धार्मिक कट्टरवाद के विरोध के साथ विकास और आर्थिक उदारीकरण की बातें कर
रही है। एमक्यूएम के लंदन स्थित पार्टी चीफ अल्ताफ हुसैन भी उदार धार्मिक नेता हैं,
उनका आंदोलन भी नये तरह के पाकिस्तान की पैरवी करता है।
कुल मिलाकर पाकिस्तान में इस समय दो गुट बन रहे हैं ये वो जो तालिबान और अलकायदा का
समर्थन करते हैं और उसके साथ हैं और दूसरा गुट इसके खिलाफ है। बेशक अभी ये दरारें
साफ नजर नहीं आ रही हों, लेकिन कुछ समय बाद साफ साफ नजर आने लगेंगी। पाकिस्तान के
बुद्धिजीवी, राजनीतिक और आला हुक्मरान के लिए भी ये सोचने का वक्त है, अन्यथा
पाकिस्तान अपने अंतर्विरोधों के कारण ही ध्वस्त हो जायेगा। सेना नहीं बदली तो फिर
पाकिस्तान के टुकड़े टुकड़े होंने से उसे कोई नहीं बचा सकता और तब सेना भी नहीं
बचेगी।
क्या है ये मेमोगेट कांड
बताते हैं कि अक्टूबर 201१ में पाकिस्तान सरकार ने कथित तौर पर अमेरिका को एक मेमो
भेजा था, जिसमें मई महीने में अल-कायदा प्रमुख आेसामा बिन लादेन के मारे जाने के
बाद पाकिस्तानी सेना के जरिए तख्ता पलटने की आशंका जताई गई थी।
मई 201१ में पाकिस्तान के शहर एेबटाबाद में अमेरिकी सेना ने पाकिस्तान को बताए बगैर
एक सैन्य अभियान में आेसामा बिन लादेन को मार दिया था। एेसा कहा जाता है कि उस समय
अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने राष्ट्रपति जरदारी के कहने
पर उस मेमो को तैयार किया था$, उसमें कथित तौर पर जरदारी ने सेना के खिलाफ अमरीकी
मदद के बदले में सेना के शीर्ष नेतृत्व को बदलने और चरमपंथी संगठनों से तमाम
रिश्तों को खत्म करने का यकीन दिलाया था।
उस मेमो को तत्कालीन अमेरिकी सेना प्रमुख माइकल मलेन को सौंपा गया था। मलेन ने इस
तरह के एक मेमो पाने की बात आधिकारिक रूप से स्वीकार भी की थी लेकिन ये कहा था कि
अमेरिका ने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की थी। इस विवाद के कारण हक्कानी को अपने पद से
इस्तीफा देना पड़ा था। वैसे हक्कानी और राष्ट्रपति जरदारी दोनों ही ऐसे मेमो से
इनकार करते हैं लेकिन अगर जांच में जरदारी का नाम आया तो उन्हें अपनी कुर्सी छोड़ने
पर मजबूर किया जा सकता है।
क्या इमरान खान नई ताकत होंगे?
भ्रष्टाचार और कुशासन के आरोपों के बीच घिरी राष्ट्रपति जरदारी और गिलानी की सरकार
शायद ही अपना कार्यकाल पूरा कर पाये। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले
दिनों में सरकार की स्थिति और खराब होगी। जरदारी को इस समय सबसे बड़ी चुनौती दे रहे
हैं परोक्ष रूप से अमरीका द्वारा समर्थित, पूर्व क्रिकेटर इमरान खान।
इमरान खान के नेतृत्व वाली तहरीक-ए-इंसाफ को पाकिस्तान में तीसरी शक्ति के रूप में
पेश किया जा रहा है। लोग उनकी ओर इसलिए खिंचे चले आते हैं क्योंकि वो राजनीति में
नए हैं, उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। कुछ लोग इसलिए उनकी तरफ आकर्षित हो
रहे हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया है कि इमरान को सेना का समर्थन हासिल है।
अगर वो सत्ता में आते हैं तो देश को स्थिरता प्रदान करेंगे, जिसकी फौरी तौर पर बहुत
जरूरत है। अगर चुनाव जल्दी हो जाते हैं तो विश्लेषकों का मानना है कि इमरान खान,
परवेज मुशर्रफ और सिंध की एमक्यूएम और सेना के समर्थन वाले कुछ नेताआें के बीच
गठबंधन हो सकता है। वैसे जो भी पाकिस्तान में सत्ता में आएगा, उसके लिए बहुत बड़ी
चुनौतियां इंतजार कर रहीं हैं, अर्थव्यवस्था की बहुत खराब है, देश के कई इलाकों में
चरमपंथी सक्रिय हैं और दशकों में पहली बार अमेरिका से संबंध इतने खराब हैं।
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