
Posted Wed, 02/01/2012 - 22:49 by admin
धुंधली है तस्वीर : सत्तारुढ़ दल के खिलाफ हवा नहीं
रत्ना श्रीवास्तव
पंजाब पुन: परीक्षा के दौर से गुजर रहा है। कांग्रेस हो या अकाली, भ्रष्टाचार के
मुद्दे पर ही सरकारें बदलती रही हैं। पार्टियों के आंतरिक कलह के बीच पुन: एक बार
वही मुद्दा सामने है। किन्तु राज्य के हालात स्पष्ट नहीं हैं और मतदाता असमंजस में
दिख रहा है। एक रिपोर्ट।
1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद से ही वहां हमेशा विधानसभा चुनावों के दौरान
सत्ताधारी दल के खिलाफ हवा बहती है और कोई दूसरी पार्टी सत्ता में आती है, इस हिसाब
से देखें तो कांग्रेस का पलड़ा भारी है लेकिन इस बार तस्वीर बदली बदली सी है, क्योंकि
इस बार हवा सत्तारूढ शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के खिलाफ उतनी
नहीं है। कांग्रेस के लिए इस बार मुकाबला कतई आसान नहीं है। सच बात यही है कि चुनावी
तस्वीर काफी धुंधली सी है और लोगों का अंदाजा है कि इन चुनावों में किसी भी पार्टी
को शायद ही बहुमत हासिल हो।
पंजाब में ११६ सीटों के लिए मतदान होना है। मुख्य तौर पर मुकाबला तीन तरफा है-
चुनावी मैदान में अकाली दल और बीजेपी गठबंधन का मुकाबला कांग्रेस और नई बनी पीपुल्स
पार्टी आफ पंजाब से है। अकाली दल का नेतृत्व मौजूदा मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल
और उनके बेटे सुखबीर सिंह के हाथों में है तो कांग्रेस की कमान पूर्व मुख्यमंत्री
अमरिंदर सिंह संभाले हुुए हैं। पीपुल्स पार्टी की अगुवाई प्रकाश सिंह बादल के भतीजे
मनप्रीत सिंह कर रहे हैं, जो कुछ समय पहले तक बादल के साथ ही थे। पंजाब के इन चुनावों
में जहां परिवारवाद हावी है वहीं काफी संख्या में बागी उम्मीदवार भी मैदान में हैं।
लेकिन आमतौर पर राज्य के चुनाव विश्लेषक इस बार अकाली दल को मजबूत मान रहे हैं।
भाजपा को हो रहे नुकसान की भरपाई अकाली बसपा से आंतरिक गठजोड़ से कर रहे हैं। किन्तु
निर्णायक कारक डेरों का रुख हो सकता है।
कांग्रेस जब पिछली बार वर्ष २००२ में सत्ता में आई थी, तब उसके पास ६२ सीटें थीं।
इस जीत में उसके पक्ष में वोटों का हिस्सा ३६ फीसदी के आसपास था। २००७ में पार्टी
को १८ सीटों पर नुकसान हुआ और यह ४४ सीटों पर सिमट गई, हालांकि हार के बावजूद फीसदी
के आधार पर उसके मतों में इजाफा हुआ था। फिर २००९ में लोकसभा चुनावों के दौरान
कांग्रेस को यहां जोरदार जीत मिली, १३ लोकसभा सीटों में से उसे आठ पर जीत हासिल हुई,
जबकि अकाली चार सीट पा सके और बीजेपी को केवल एक जगह जीत नसीब हुई। लेकिन उसके बाद
से यूपीए की केंद्र सरकार की बदतर होती इमेज का नुकसान भी अब कांग्रेस को इन चुनावों
में हो सकता है। केंद्र सरकार पर भ्रष्टाचार के जबरदस्त आरोपों के साथ अन्ना हजारे
फैक्टर भी यहां उसके खिलाफ जा सकता है। लिहाजा २००९ के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस
को जो बढ़त हासिल हुई थी, वह अब नहीं दिखती।
पंजाब में कांग्रेस के भीतर खासे मतभेद भी हैं और नेतृत्व को लेकर कलह भी। टिकट नहीं
मिलने पर तमाम कांग्रेसी अब बागियों के रूप में चुनाव मैदान में कूद चुके हैं, इसका
नुकसान भी आखिरकार कांग्रेस को ही होना है। अमरिंदर सिंह के भाई मलविंदर सिंह को जब
कांग्रेस पार्टी ने समाना विधानसभा क्षेत्र से टिकट नहीं दिया, तो वह विपक्षी अकाली
दल से जा मिले। इस क्षेत्र से कांग्रेस ने अमरिंदर के बेटे रनिंदर सिंह को टिकट दिया
है। मलविंदर अकाली उम्मीदवार के रूप में इसी सीट के लिए उनके प्रतिद्वन्द्वी के रूप
में खड़े होंगे। जैसे ही मलविंदर ने अकालियों का दामन थामा, उनके सुर भी बदल गए।
उन्होंने अपने भाई और पटियाला से कांग्रेस सांसद अपनी भाभी परनीत कौर पर इल्जाम
लगाया कि उन्होंने सब कुछ परिवार तक ही सीमित रखा है। मलविंदर ने कहा कि परनीत ने
ही पार्टी पर मलविंदर के बजाय अपने बेटे को टिकट देने के लिए जोर डाला।
कांग्रेस का आरोप है कि मौजूदा शासनकाल में राज्य बिखर गया और राजस्व काफी कम हो गया
है। मुफ्त में बांटी जाने वाली बिजली ने पंजाब के राजस्व का बंटाधार कर दिया है।
राज्य पर फिलहाल ६६,००० करोड़ का कर्ज है। अकाली दल इसके जवाब में कहती है कि उसने
ये कदम राज्य में कृषि की बिगड़ती स्थिति और किसानों की खस्ता माली हालत को देखते
हुए उठाया।
राज्य के एक वरिष्ठ पत्रकार आलोक वर्मा कहते हैं कि अकालियों ने चुनाव से पहले कुछ
ही हफ्तों में जिस तरह से अपना अभियान चलाया है, उससे भी कांग्रेस को काफी मुश्किलें
हो रही हैंं। वह साफ कहते हैं कि कांग्रेस शायद ही इस बार यहां सत्ता में लौटे।
सरकारों के रोटेशन का दौर अब खत्म हो चुका है। मुफ्त शराब और नकदी की भी भूमिका
अकालियों के पक्ष में जा सकती है।
सत्तारूढ पार्टी शिरोमणि अकाली दल अगर सत्ता में वापस आ जाये तो ताज्जुब नहीं होना
चाहिए। हाल में बिहार, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात जैसे राज्यों में भी मतदाताओं ने
पुरानी सरकार को फिर जिताकर गद्दी पर बिठाया है, क्योंकि ये सरकारें उनकी अपेक्षाओं
पर खरी उतरीं थीं। वैसा ही कुछ पंजाब में हो सकता है। पंजाब के उप मुख्यमंत्री
सुखबीर सिंह बादल का दावा है कि उनकी पार्टी ने इस बार राज्य में जमकर काम किया है
और इसी वजह से उन्हें सत्ता में वापसी की उम्मीद है।
१९९७ में अकाली दल ने ९२ सीटों पर चुनाव लड़ा था और ७५ सीटें जीती थीं, जबकि २००२
में वह ४१ सीटें ही पा सकी। लेकिन २००७ के चुनावों में अकालियों ने बीजेपी के साथ
मिलकर चुनाव जीता और सरकार बनाई। हालांकि पिछले चुनावों और अब में यह अंतर जरूर आया
है कि जहां अकाली और मजबूत हुए हैं वहीं बीजेपी अपेक्षाकृत कमजोर हुई है। पार्टी के
नेताओं पर खुद भ्रष्टाचार के आरोप हैं, इन्हीं आरोपों के चलते उसे बादल सरकार से भी
अपने कई मंत्री हटाने पड़े थे। वर्ष २००७ में बीजेपी ने २३ सीटों पर जोर आजमाइश की
थी और शानदार प्रदर्शन करते हुए १९ सीटों पर जीत पाई थी, लेकिन इस शानदार प्रदर्शन
को दोहराना इस बार उसके लिए मुश्किल होगा। अकाली भी मान रहे हैं कि बीजेपी को इस
बार राज्य में नकारात्मक वोटों का अनुमान है, जिसका नुकसान अकालियों को भी हो सकता
है।
पंजाब चुनावों की नई सनसनी पीपुल्स पार्टी आफ पंजाब है, जिसकी अगुवाई मुख्यमंत्री
प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत बादल कर रहे हैं, जो करीब दो साल पहले तक उन्हीं
के साथ थे, लेकिन मतभेदों के चलते उन्हें सरकार से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद
से दोनों के रिश्तों में इतनी तल्खी आ चुकी है कि दोनों इस चुनावों में एक दूसरे के
खिलाफ जमकर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। मनप्रीत को खासा समर्थन भी मिल रहा है। वह
कांग्रेस और अकाली दोनों का विरोध करते हैं। उनका व्यक्तित्व, क्षमता और आर्थिक
समझबूझ मतदाताओं को उनसे जोड़ती है। उन्होंने आम तौर पर कांग्रेस और अकाली दल के
बागियों को ही अपनी पार्टी से टिकट दिया है, बेशक संगठन के तौर पर ये पार्टी अभी
उतनी मजबूत नहीं है लेकिन इन विधानसभा चुनावों में वह न केवल प्रमुख दलों के वोट
काटने का काम करेगी बल्कि एक तीसरी ताकत के तौर पर भी उभरेगी। मनप्रीत गिद्दरबाहा
से चुनाव लड़ रहे हैं, जिनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं कांग्रेस के बागी नेता संत
सिंह बंगर, जो हाल ही में अकाली दल में शामिल हुए हैं। वहीं मनप्रीत के पिता और
प्रकाश सिंह बादल के बड़े भाई गुरुदास बादल लांबी से चुनाव लड़ रहे हैं, यह वही चुनावी
क्षेत्र है जहां से बादल सीनियर चुनाव लड़ते हैं।
कुल मिलाकर ये दिखता है कि अंतर्कलह की शिकार राज्य की तीनों प्रमुख पार्टियां
कांग्रेस, बीजेपी और अकाली हैं। इसका प्रतिकूल असर उन्हें मांझा, दोआब और मालवा की
40 सीटों पर झेलना पड़ सकता है। मालवा, जो अकालियों के लिए परंपरागत रूप से सुरक्षित
क्षेत्र माना जाता है, इस बार उनके खिलाफ खड़ा नजर आता है, मांझा में रुझान कांग्रेस
की तरफ झुकने की उम्मीद लगाई जा रही है।
करोड़पतियों का पंजाब
सबसे ज्यादा करोड़पति मंत्री पंजाब में हैं। ये खुलासा नेशनल इलेक्शन वाच ने किया
है। पंजाब में ८३ फीसदी मंत्री एेसे हैं, जिनकी घोषित संपत्ति एक करोड़ या इससे
ज्यादा है। गोवा और उत्तर प्रदेश में ६७ फीसदी और ३७ फीसदी मंत्री करोड़पति क्लब में
शामिल हैं। पंजाब में अमीर मंत्रियों की लिस्ट में सबसे आगे शिरोमणि अकाली दल के
अध्यक्ष सुखबीर बादल हैं। हाल ही में उन्होंने ७६.३६ करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित
की। उनके पिता और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने १$2१ करोड़ रुपए की चल
और ५.५2 करोड़ रुपए की अचल संपत्ति घोषित की। सुखबीर की पत्नी और भटिंडा से सांसद
हरसिमरन कौर बादल की संपत्ति ३.९० करोड़ रुपए है। सुखबीर बादल के साले बिक्रम सिंह
मंजिठा भी करोड़पति क्लब में शामिल हैं। वे मंजिठा से शिरोमणि अकाली दल के प्रत्याशी
हैं। पिछले चुनाव की तुलना में इनकी कुल संपत्ति २ करोड़ रुपए बढ़ी है। बिक्रम सिंह
मंजिठा की कुल घोषित संपत्ति ११.२१ करोड़ रुपए है। पंजाब कांग्रेस के प्रमुख कैप्टन
अमरिंदर सिंह की निजी संपत्ति १.१0 करोड़ रुपए से ज्यादा है।
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