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Posted Wed, 02/01/2012 - 23:18 by admin

चिदंबरम की तकदीर चौराहे पर खड़ी है। 2जी घोटाला उनके लिए बड़ी आफत की तरह है। चार फरवरी को कोर्ट का फैसला उनके राजनीतिक जीवन का पटाक्षेप भी कर सकता है। अनुज अग्रवाल का विश्लेषण।
जी स्पेक्ट्रम घोटाले में गृह मंत्री पी चिदंबरम को सहआरोपी बनाने की याचिका पर दिल्ली का पटियाला हाउस कोर्ट 4 फरवरी को फैसला सुनाएगा। इस मामले में जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने याचिका दायर की है। उनकी गवाही 21 जनवरी को पूरी हो गई, अब फैसला होगा कि चिदंबरम को गवाही के लिए समन भेजा जाए या नहीं। सुब्रमण्यम स्वामी का आरोप है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व संचार मंत्री ए राजा के साथ तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी दोषी हैं।
स्वामी ने 21 जनवरी को कोर्ट में बहस के दौरान कहा कि उनके पास कई ऐसे दस्तावेज हैं, जिनसे यह साबित होता है कि ए राजा के साथ पी चिदंबरम भी घोटाले में शामिल हैं। उन्होंने साल 2008 में पी चिदंबरम और पूर्व टेलिकॉम मंत्री ए राजा के बीच हुई मुलाकातों के दौरान हुई बातचीत और फैसलों का जिक्र किया। 7 जनवरी को सुब्रमण्यम स्वामी ने दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां अदालत में पेश कर अपनी दलील समाप्त कर दी थी। उन्होंने पहले दो वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों (वित्त मंत्रालय के पूर्व जॉइंट सेक्रेटरी और सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर) की जांच की मांग की थी। लेकिन, 21 जनवरी को उन्होंने कहा कि अब वह ऐसा नहीं करना चाहते क्योंकि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं।
स्वामी ने 21 जनवरी को कोर्ट के सामने सबूत पेश किए। उनका दावा था कि पूर्व टेलिकॉम मंत्री ए राजा ने ही अकेले इतने बड़े स्पेक्ट्रम घोटाले को अंजाम नहीं दिया बल्कि स्पेक्ट्रम लाइसेंस के मूल्यों के निर्धारण के लिए गए फैसले में तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम की सहमति और मिलीभगत थी।
इससे पहले 6 जनवरी को 2जी घोटाले के मामले में गृहमंत्री पी चिदंबरम को आरोपी बनाए जाने के मामले में जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने पटियाला हाउस की विशेष अदालत में दस्तावेज पेश कर दिए थे। इन दस्तावेज के जरिए स्वामी यह साबित करना चाहते हैं कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में ए राजा और पी चिदंबरम के बीच बातचीत हुई थी। स्वामी ने अपनी निजी शिकायत के समर्थन में दस्तावेजों की विभिन्न प्रमाणित प्रतियां पेश कीं। इसके बाद विशेष सीबीआई न्यायाधीश ओ पी सैनी ने कहा था कि आरोपी को समन जारी करने के लिए आवेदन पर 21 जनवरी को जिरह होगी।
इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2जी मामले में आरोपों से बरी करने सम्बंधी पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा द्वारा दायर याचिका पर 20 जनवरी को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को नोटिस जारी किया। उच्च न्यायालय ने नोटिस तब जारी किया, जब बेहुरा ने सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को चुनौती दी। न्यायमूर्ति एम एल मेहता ने कहा, सीबीआई को नोटिस जारी कर 13 मार्च तक जवाब मांगा गया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में अन्य आरोपियों की इसी तरह की कई याचिकाएं उनके पास हैं, जिन पर 12 और 13 मार्च को सुनवाई होगी। बेहुरा के वकील अमन लेखी ने याचिका में कहा है कि उनके खिलाफ कोई वास्तविक आरोप नहीं है।
गौरतलब है कि सीबीआई के विशेष न्यायाधीश ओ पी सैनी ने पिछले वर्ष 22 अक्टूबर को 17 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे। भारतीय दंड संहिता तथा भ्रष्टाचार रोधी अधिनियम के तहत इन सभी पर साजिश रचने, विश्वासघात, धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा तथा पद का दुरुपयोग जैसे आरोप तय किए गए थे। दोषी पाए जाने पर इन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई जा सकती है। इस मामले में 19 लोग और छह कम्पनियों को आरोपी बनाया गया है। बाजार दर से कम कीमत पर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटित किए जाने से सरकार को 1.76 लाख कारोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है। उल्लेखनीय है कि पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए राजा और बेहुरा को छोड़कर इस मामले के अन्य सभी आरोपियों को जमानत पर रिहा किया जा चुका है।

सीबीआई और दस्तावेज करेगी दाखिल
टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले में कई और अहम दस्तावेज जमा होंगे। पटियाला हाउस के विशेष जज ओपी सैनी ने सीबीआई को इस बात की इजाजत दे दी है कि एजेंसी 2जी स्पेक्ट्रम मुकदमे के रिकॉर्ड में और दस्तावेज जमा कर सकती है। सीबीआई जो दस्तावेज जमा करेगी उसमें टेलीकॉम कंपनियों, ट्राई, दूरसंचार मंत्रालय के सबूत शामिल होंगे। ऐसे में माना जा रहा है कि चिदंबरम की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
सीबीआई के वरिष्ठ लोक अभियोजक यूयू ललित ने अदालत को बताया कि जो दस्तावेज जांच एजेंसी जमा करना चाहती है वह मुकदमे के लिए बेहद अहम साबित होंगे। उन्होंने कहा कि पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा तो पहले ही चार-पांच अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने पर अपनी सहमति दे चुके हैं तो फिर आरोपियों की अब आपत्ति गैरवाजिब है। विशेष जज ने इस दलील पर आरोपियों की आपत्तियों को खारिज करते हुए सीबीआई को और दस्तावेज जमा करने की इजाजत दे दी। बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि सीबीआई जब पहले ही ट्राई, दूरसंचार मंत्रालय सहित सभी के दस्तावेज जमा कर चुकी है, तो अब फिर नए दस्तावेज में सीबीआई क्या लाना चाहती है? लेकिन बचाव पक्ष की दलील खारिज कर दी गयी।
इस बीच रिलायंस एडीएजी समूह के एक अधिकारी ने 15 जनवरी को दिल्ली की अदालत में कहा कि उसे यह याद नहीं है कि उसने समूह के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हरि नायर के आदेश पर सीबीआई के समक्ष बयान दिया था कि उसने टाइगर ट्रेडर्स लिमिटेड द्वारा जारी चेक जमा नहीं कराया था। नायर 2जी स्पेक्ट्रम मामले में आरोपी हैं। रिलायंस पावर के उप महाप्रबंधक परेश राठौड़ ने इससे पहले सीबीआई के समक्ष दिए बयान में कहा था कि उन्होंने नायर के आदेश पर स्वान टेलीकाम के निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, अदालत में वह इस बात को याद करने में विफल रहे। राठौड़ ने कहा कि मुझे यह याद नहीं कि मैंने जांच अधिकारी को यह बताया था कि दिनेश मोदी और मैंने स्वान टेलीकाम प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक पद से 22 जनवरी 2007 को हरि नायर के कहने पर इस्तीफा दे दिया था।

गोपालन ने किया प्रणब का बचाव
उधर 2जी स्पेक्ट्रम मामले पर वित्त मंत्रालय की ओर से गत 25 मार्च को प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखे गए पत्र के मामले में आर्थिक मामलों के सचिव आर गोपालन ने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का बचाव किया है। 2जी मामले को देख रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सामने पेश हुए गोपालन ने कहा कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस फाइल को देखा जरूर था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने इसे मंजूर किया था।
गोपालन ने कहा कि 2जी पर भेजे गए पत्र के पीछे सरकार के विभिन्न विभागों का प्रयास था और इसमें केवल प्रणब मुखर्जी की भूमिका नहीं थी। जेपीसी के सदस्यों ने गोपालन से कहा वह प्रणब ने फाइल देखी थी को स्पष्ट करें। कानून मंत्रालय ने हाल ही में जेपीसी को अपने सुझाव में कहा था कि कानून के मुताबिक देखने का मतलब केवल किसी दस्तावेज को देखने से ज्यादा होता है। इसी पत्र के आधार पर विपक्ष ने 2जी घोटाले में पी चिदंबरम को भी आरोपी बनाए जाने की मांग की थी।
वित्त मंत्रालय की ओर से प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गए इस पत्र ने सरकार के अंदर ही घमासान मचा दिया था। 25 मार्च को भेजे गए इस पत्र में कहा गया था कि यदि तत्कालीन वित्त मंत्री (मौजूदा गृह मंत्री) पी चिदंबरम चाहते तो ए राजा और उसके सहयोगियों को 2जी आवंटन में घोटाला करने से रोक सकते थे। पत्र में कहा गया था कि वह 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन बोली के आधार कर करवा कर इस घोटाले को होने से रोक सकते थे। इस पत्र ने विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया था और इसे चिदंबरम और प्रणब मुखर्जी के बीच मतभेद के रूप में देखा गया। जेपीसी में गोपालन को सदस्यों के भारी सवालों की बौछार झेलनी पड़ी, खासतौर पर भाजपा के सदस्यों से। इससे पहले 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सीबीआइ द्वारा अतिरिक्त दस्तावेज अदालत में दाखिल किए जाने पर पूर्व दूरसंचार मंत्री और मामले में मुख्य आरोपी ए राजा और अन्य कई आरोपियों ने आपत्ति जाहिर की। इन दस्तावेजों में ट्राई और दूरसंचार विभाग के बीच हुए संवाद का कुछ ब्योरा भी शामिल है। सीबीआई ने 10 जनवरी को ही ये दस्तावेज अदालत में जमा कराए थे। वहीं, सरकारी गवाह ट्राई के पूर्व अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र के बयान भी दर्ज किए गए।
विशेष जज ओ पी सैनी के समक्ष राजा, पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और अन्य के वकीलों ने कहा कि नृपेंद्र मिश्र से संबंधित दस्तावेजों को दाखिल करने का सीबीआई ने उचित कारण नहीं बताया। राजा के वकील सुशील कुमार ने कहा कि सीबीआई ने गवाह नृपेंद्र के बयान दर्ज करते हुए उन्हें ये दस्तावेज मार्च 2011 में दिखाए थे। लेकिन ये दस्तावेज उन्हें मुहैया नहीं कराए गए। सीबीआई ऐसा करके गलत कर रही है।
वहीं, बेहुरा के वकील ने अदालत में कहा कि इन दस्तावेजों को रिकार्ड में लाने का सीबीआई का अनुरोध कानूनी सिद्धांत के विपरीत है। वकीलों की मांग थी कि पहले सीबीआई द्वारा दाखिल अतिरिक्त दस्तावेजों के मसले पर अदालत फैसला ले, उसके बाद ही मामले में आगे की कार्रवाई को अंजाम दिया जाए।

कृष्णा बने सरकार के सिरदर्द
विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा को झटका देते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने 20 जनवरी को उनके खिलाफ लोकायुक्त पुलिस की जांच को रोकने से इनकार कर दिया। आरोप है कि उन्होंने साल 1999 से 2003 के बीच बतौर मुख्यमंत्री कर्नाटक के वन्य क्षेत्र को डिनोटिफाइड (गैर अधिसूचित) किया था। हालांकि अदालत ने कृष्णा को मामूली राहत देते हुए राज्य सरकार के मालिकाने वाली मैसूर मिनरल्स लिमिटेड (एमएमएल) में बदइंतजामी के आरोपों को खारिज कर दिया, जो कई कंपनियों को लौह अयस्क सप्लाई करने के लिहाज से राज्य की नोडल एजेंसी है। जस्टिस एन. आनंद ने कृष्णा की याचिका पर फैसला सुनाया। कृष्णा ने अपने खिलाफ एक निजी शिकायत पर दिसंबर 2011 में लोकायुक्त की विशेष अदालत में शुरू हुई कार्यवाही को रद्द करने की गुजारिश की थी। अदालत के फैसले के बाद कृष्णा ने कहा कि मेरे वकील फैसले का ब्योरा देखेंगे और उचित फैसला लेंगे। अंतत: इज्जत बचाने की खातिर कृष्णा उच्चतम न्यायालय की शरण में चले गये हैं।
 

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