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Posted Mon, 02/13/2012 - 20:41 by admin

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रामबहादुर राय
दैनिक भास्कर (नई दिल्ली)11 फरवरी 2012: डॉ. वेदप्रताप वैदिक की पुस्तक-’भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’ जिसके भी हाथ में पड़ेगी उसमें यह एक तरह की उत्सुकता और जिज्ञासा पैदा करेगी| क्योंकि शीर्षक से ऐसा लगता है कि यह पुस्तक एक यात्रा है जो भाजपा से शुरू होती है और मुसलमान पर जाकर खत्म होती है| ऐसा जिसे भी लगे वह गलत नहीं होगा| पाठक को यह पुस्तक ऐसी यात्रा पर ले चलता है जिसमें संसदीय लोकतंत्र की दलीय पेचीदगियां और आबादी के अपने हिसाब की उसे कहीं पगडंडी मिलती है तो कहीं पर राजमार्ग का दर्शन होता है|
इसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है| इसलिए भी यह पुस्तक अपना महत्व पाठकों को समझा पाती है| डॉ. वेदप्रताप वैदिक को इस पुस्तक से ओझल नहीं किया जा सकता लेकिन साथ ही साथ उन्हें केंद्र में रखकर पुस्तक को देखने और पढ़ने से इसका सही आकलन भी नहीं हो सकता| क्या यह जरूरी नहीं है कि पुस्तक के कथ्य, तथ्य और उसके तर्क से निकले निष्कर्षों पर न केवल सोच विचार हो बल्कि जरूरत पड़ने पर मनन और मंथन भी हो| यह तभी हो सकता है जब पुस्तक के संदेश को पकड़ने और पकड़े रहने में किसी तरह का मतिभ्रम न हो| मन स्थिर रहे| बुद्घि अपना काम करे और विवेक से निर्णय हो|
‘भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’ को पढ़ने में यह सावधानी बरतनी चाहिए| यह अपने तरह की अकेली पुस्तक है| इसे दस सालों के लेखों को चुनकर तीन विषयों में बांटा गया है| ये तीनों विषय ही पुस्तक का नामकरण करते हैं, ‘भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’| आजादी के बाद ये विषय उसी तरह स्थाई विवाद के केंद्र में है जैसे कि कुछ राष्ट्रीय समस्याएं हैं| उन समस्याओं को गिनाने से ध्यान दूसरी तरफ जा सकता है| ये विषय जितना अधिक पहले चर्चा में थे उससे कम आज नहीं हैं| फिर यह स्वाभाविक है कि पाठक खोजेगा कि आखिरकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान की संगति कैसे बनाई है और क्यों बनाई है|http://www.vpvaidik.com

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