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Posted Wed, 02/01/2012 - 23:05 by admin

कामनवेल्थ गेम्स पर कैग की ताजातरीन रिपोर्ट
कॉमनवेल्थ खेलों की अनियमितताओं का भूत शीला सरकार के पीछे पड़ा है। खेल के समय लगे आरोपों की पुष्टि विधानसभा में रखी गयी सीएजी की रिपोर्ट भी करती दिख रही है। रत्ना श्रीवास्तव की एक रिपोर्ट।
कॉमनवेल्थ गेम्स खत्म होने के 15 महीने बाद भी दिल्ली सरकार को कैग रिपोर्ट का डर सता रहा है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कामनवेल्थ गेम्स के लिए दिल्ली में हुए सौंदर्यीकरण और निर्माण कार्यों में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों को गलत बताया है। उनका कहना है कि इसके उलट इन गेम्स में दिल्ली सरकार ने बढ़िया काम करके इस शहर को वर्ल्ड क्लास सिटी में तब्दील कर दिया। गौरतलब है कि कैग ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भी अब तक कम से कम 40 प्रोजेक्ट्स के बिल जमा न करने पर शीला सरकार की खिंचाई की है।
सीएजी ने पाया कि देर से काम होने की सूरत में ठेकेदारों को दंडित नहीं किया गया और सही तरीके से काम न करने पर भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। कैग ने सरकार के इन दावों का भी खंडन किया है कि ज्यादातर मामलों में सभी दस्तावेज और बिल उन्हें सौंप दिये गये हैं। कैग ने अपनी जांच में पाया कि अधिकतर प्रोजेक्ट्स का हर चरण खराब प्लानिंग, देरी, लागत में अनावश्यक वृद्धि का शिकार रहा।
जनवरी के दूसरे पखवाड़े में जब दिल्ली विधानसभा के पटल पर कैग रिपोर्ट रखी गई तो जमकर हंगामा हुआ। रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि ज्यादातर प्रोजेक्ट्स के फाइनल बिल्स अब तक सौंपे नहीं गये हैं। इन खेलों को कराने की लागत में दिसंबर 2010 तक 18,५3२.३1 करोड़ की अनावश्यक बढ़ोतरी की गई। ये लागत 2003 में मेजबानी पाने के समय भारतीय ओलंपिक संघ द्वारा करीब 1200 करोड़ आंकी गई थी। इसमें वे खर्च शामिल नहीं हैं, जो दिल्ली की दूसरी एजेंसियों द्वारा खेल के लिए किये गये। इन एजेंसियों में दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन, एयरपोर्ट अथारिटी आफ इंडिया और दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड जैसी संस्थाएं शामिल थीं। जो 18,५3२.३1 करोड़ रुपये दिल्ली के सौंदर्यीकरण और तमाम निर्माण कार्यों पर खर्च किये गये, उसमें दिल्ली सरकार का हिस्सा 967२ करोड़ रुपये का था। इसका मतलब ये है कि भारतीय ओलंपिक संघ ने शुरू में जो अनुमानित बजट इन खेलों के लिए दिखाया था, वह काफी अवास्तविक था। बाद में अप्रैल 2007 से लेकर सितंबर 2010 के बीच इसमें करीब सात बार संशोधन किये गये।
रिपोर्ट के अनुसार 40 प्रोजेक्ट्स के लिए अंतिम तौर पर भुगतान अगस्त 201१ तक नहीं किया गया। इनमें खेलों के आयोजन स्थल, स्ट्रीटस्केपिंग और आयोजन स्थल के आसपास की सड़कों का सौंदर्यीकरण, सड़कों और फ्लाईओवर्स का निर्माण, कनाट प्लेस की मरम्मत, पानी और बिजली और पार्क-राइड व्यवस्थाएं आदि से संबंधित प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। अक्टूबर 201१ तक विभिन्न एजेंसियां इन पर काम में लगी हुई थीं और ये प्रोजेक्ट्स पूरे नहीं हो पाये थे। एजेंसियों को इन प्रोजेक्ट्स के लिए अक्टूबर 201१ तक 346४.2२ करोड़ का कुल भुगतान भी किया गया। कैग ने निष्कर्ष निकाला है कि गलत तरीके से बनाई गई योजनाओं ने समय-सीमा और अत्यंत जरूरी कामकाज को दबाव में ला दिया। इसका कारण ये था कि न तो सही समय से काम शुरू किये गये और न ही वर्षों के हिसाब से उन्हें बांटने की कोशिश की गई। खेल की तैयारियों के आखिरी साल में जल्दबाजी के चलते कई समस्याएं भी हुईं। सामान कहीं ज्यादा कीमत देकर खरीदे गये और मजदूरी भी अधिक महंगी हो गई, लिहाजा लागत बढ़ी। ये देखा गया कि प्रक्रियाओं और नियमों में अनावश्यक ढील बरती गई, इसमें खरीदारी से लेकर कांट्रैक्ट देने जैसे काम शामिल रहे।
कैग की आडिट रिपोर्ट पर दिल्ली सरकार ने 15 दिसंबर को अपने जवाब दाखिल किये और तकरीबन इस रिपोर्ट के निष्कर्षों को एक सिरे से नकार दिया।

स्ट्रीटस्केपिंग और सौंदर्यीकरण
2004 में दिल्ली सरकार ने सीडब्ल्यूजी-२010 के पहले सौंदर्यीकरण के लिए स्ट्रीटस्केपिंग और सड़कों के सौंदर्यीकरण को लागू करने का निर्णय लिया। लेकिन इसे गलत तरीके से अपनाया और योजनाबद्ध नहीं किया गया। ये परियोजना भारत सरकार के शहरी विकास और नवीनीकरण हेतु फ्लैगशिप योजना जेएनएनयूआरएम कार्यक्रम के अंतर्गत आने वाली दिल्ली शहरी विकास योजना का हिस्सा थी। दिल्ली सरकार ने इस परियोजना के लिए डीयूसी से मंजूरी लेना जरूरी नहीं समझा और दिल्ली के यातायात की बड़ी मात्रा के प्रबंधन पर पड़ने वाले इसके प्रभाव के आकलन और समन्वय के लिए शुरुआती चरणों में ही यातायात पुलिस से इसके विचार विमर्श के संकेत नहीं मिले।
स्ट्रीटस्केपिंग और सौंदर्यीकरण का कार्य 4.8 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर (चार लेन वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को बनाने के लिए एनएचएआई की अनुमानित लागत 9.५ करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर या रेलवे ट्रैक बनाने के लिए भारतीय रेलवे की अनुमानित लागत 4.१ करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर की तुलना में) की अत्यधिक उच्च औसत लागत पर तदर्थ और मनमाने तरीके से दिया और क्रियान्वित किया गया, जिसकी वजह से 101.02 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च हुआ।

स्ट्रीट लाइटिंग
दिल्ली की सड़कों पर प्रकाश व्यवस्था में सुधार की परियोजना दिल्ली सरकार ने जून 2006 में अपनाई, जिसे दो सालों में पूरी दिल्ली में लागू करने की योजना थी। प्रकाश व्यवस्था के मानक नवंबर 2006 में तय किये गये। हालांकि इन मानकों में केवल लैम्प और ल्यूमिनरीज के प्रदर्शन का तकनीकी मानदंड शामिल था। पीडब्ल्यूडी ने विभिन्न श्रेणियों की सड़कों के लिए आयातित और देशी ल्यूमिनरीज दोनों के इस्तेमाल का नियम निर्धारित किया। रिकार्ड से ये भी पता चलता है कि आयातित ल्यूमिनरीज के इस्तेमाल का फैसला विभिन्न चरणों में मुख्यमंत्री की सक्रिय भागेदारी में किया गया। पीडब्ल्यूडी द्वारा आयातित ल्यूमिनरीज के इस्तेमाल के फैसले को एनडीएमसी और एमसीडी ने भी अपनाया।
देशी ल्यूमिनरीज की तुलना में आयातित ल्यूमिनरीज कहीं अधिक लागत पर खरीदी गईं, जिसकी वजह से तीनों एजेंसियों द्वारा 3१.07 करोड़ रुपया अतिरिक्त खर्च किया गया। एनडीएमसी द्वारा डिजाइन आधारित निविदा वापस बुलाने के बाद काम दिये जाने से 6.7६ करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च हुआ, क्योंकि ठेकेदारों को विभिन्न मदों के लिए प्रति इकाई ऊंची कीमत के साथ काम दिया गया। एनडीएमसी ने 18.४45 किलोमीटर का अतिरिक्त काम भी दिया, जो गलत तरीके से वास्तविक अनुबंध से हटकर था। ऐसा मानते हैं कि इसकी वजह से 6.१३ करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ।

सड़कों पर साइनेज
अत्याधुनिक रोड साइनेज हेतु मई 2008 में पीडब्ल्यूडी ने रेट्रो रिफ्लैक्टिव शीट्स के दो प्रमुख निर्माताओं के प्राधिकृत परिवर्तकों के जरिए एक पायलट परियोजना शुरू की। कैग ने पाया कि विभाग ने स्वस्थ प्रतियोगिता सुनिश्चित नहीं की और केवल प्रमुख शीट निर्माताओं 3एम और एवरी-डैनिसन के बीच साइनेज के काम के बंटवारे को ही निश्चित किया। पूरे कार्य के लिए एकल निविदा मंगाने के बजाय, परियोजना के काम को तीन पीडब्ल्यूडी क्षेत्रों में बांट दिया गया और इन तीनों के लिए बाध्यकारी शर्तों के साथ अलग अलग निविदा और क्रियान्वयन प्रक्रिया अपनाई गई। इसके चलते वैध निविदा दाखिल करने वाली केवल दो पार्टियां मिलीं और इस वजह से काम अपने आप ही इन दोनों के बीच बंट गया। इससे करीब 1.40 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च हुआ। साथ ही एनडीएमसी के मुकाबले पीडब्ल्यूडी द्वारा खरीद की कुल लागत भी ज्यादा रही। काम सौंपे जाने के बाद साइनेज के डिजाइनों में काफी बदलाव किया गया, जिससे होने वाले 14.8७ करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च को टाला जा सकता था।

सड़कें और फ्लाईओवर
कामनवेल्थ गेम्स के लिए 25 सड़कों और फ्लाईओवर्स का कार्य हाथ में लिया गया। इनमें कैग ने सात परियोजनाओं को विस्तृत समीक्षा के लिए चुना। इन सभी सात परियोजनाओं में पुलों और फ्लाईओवरों के लिए ठेकेदार के लाभ और ओवरहेड चार्ज (सीपीओएच) के रूप में सीपीडब्ल्यूडी के अनुबद्ध 15 फीसदी की जगह 37.४ फीसदी लाभ को अपनाया गया, जिसके चलते वित्तीय बोली खोलने के बाद विभाग द्वारा आंकी गई उचित लागत में खासी बढ़ोतरी हो गई। ये बढ़ोतरी 35२.४६ करोड़ रुपयों की रही। एक ऊंची सीपीओएच ने संभावित बोलीकर्ताओं के लिए बेसलाइन लागत को बढ़ा दिया। सीपीओएच की दरों ने जहां जरूरत थी, वहां उचित लागत तय करने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई और अनुबंध के तहत काम देने में दरों की जरूरतों के आकलन में ये अहम रहे।
दो काम, जिनकी लागत 6२.6३ करोड़ रुपये थी और वे पीडब्ल्यूडी द्वारा कार्यान्वित किये गये थे, सही तरीके से नहीं किये गये। इनमें नई निविदाएं मंगाने के स्थान पर चल रहे काम में ही डेविएशन दिखाया गया, जिसकी वजह काम में जल्दी बताई गई। लेकिन इसके बाद भी ये काम खेलों के लिए समय पर पूरे नहीं हो पाये। पीडब्ल्यूडी ने दो आर्क फुटओवर ब्रिजों के निर्माण के काम भी प्रदान किये, इनकी लागत 10.35 करोड़ रुपये थी। जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम के पास बन रहे इन पुलों में पहली बार आयातित मैकलाय सस्पेंशन सिस्टम का इस्तेमाल हो रहा था। इनमें से एक फुटओवर ब्रिज गिर गया और इसके बाद दोनों पर ही काम रोक दिया गया। दोनों अब तक अधूरे पड़े हैं।

कनाट प्लेस का पुनरुद्धार
हालांकि कनाट प्लेस के सुधार और उन्नयन की परियोजना अप्रैल 2004 में ही परिकल्पित की गई थी, लेकिन वह बेवजह की देरी से प्रभावित हुई। 76 करोड़ रुपये (मई 2005 में) की मूल आकलन लागत जुलाई 2007 में बढ़कर नौ गुना यानि 67१ करोड़ रुपये हो गई। साथ ही इसमें काम की प्रकृति में खासी बढ़ोतरी हो गई। परियोजना के लिए स्वीकृत डीपीआर फरवरी 2008 में जमा की गई। ऐसे में इस परियोजना के वक्त पर यानि खेल आयोजन तक पूरा होने की उम्मीद रखना अतार्किक होता। एनडीएमसी ने प्रबंधन के लायक पैकेजों को परियोजना में बांटकर काम करने का नजरिया नहीं अपनाया, जिससे पूरे कनाट प्लेस को न्यूनतम बाधित रखने की व्यवस्था हो और वैसी ही परियोजनाएं अपनाई जाएं जो वक्त पर पूरी हो सकें। इसकी जगह परियोजनाओं को ऐसे पैकेजों में बांटा गया जो बिखरी हुई थीं और सारे काम काज एक ही वक्त पर साथ साथ चल रहे थे।

संचार सेवाएं
सितंबर 2008 में सीडब्ल्यूजी-२010 के लिए एक टेट्रा नेटवर्क शुरू करने का फैसला किया गया। दिल्ली सरकार ने 8६ महीने की अवधि के लिए टेट्रा सेवा का अनुबंध 9८.8१ करोड़ रुपयों में सौंपा। इसके तहत न केवल खेल आयोजन की अवधि कवर होती बल्कि इसमें सात साल की स्थायी विरासत अवधि भी जुड़ी हुई थी जो एक गलत फैसला था। दिल्ली पुलिस और दूसरी पब्लिक एजेंसियों की जरूरतों और मौजूदा नेटवर्क के बदले टेट्रा के इस्तेमाल के बारे में भी ठीक से मूल्यांकन नहीं किया गया। क्योंकि दूरसंचार विभाग ने टेट्रा और दूसरे नेटवर्कों के बीच संचार की अनुमति नहीं दी थी। टेट्रा सेट वास्तव में महज मोबाइल फोन से अधिक कुछ नहीं हैं।

सुविधाओं का बुरा हाल
खेल गांव में ट्रेनिंग की उत्कृष्ट सुविधाएं की गई थीं लेकिन अब उनकी सही देखभाल नहीं हो रही है। खेल गांव के साथ बनाये गये ट्रेनिंग स्थल में गंदगी का ढेर इकट्ठा हो चुका है। घास बढ़ रही है। उपकरण खराब हो रहे हैं। समुचित सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। इस खेल गांव में सिंथेटिक एथलेटिक टर्फ बिछाया गया था, गर्म पानी के स्विमिंग पूल और अत्याधुनिक जिम बनाये गये थे, लेकिन इन सभी सुविधाओं का बुरा हाल है।
जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम को फुटबाल की गतिविधियों के लिए पिछले दिनों अखिल भारतीय फुटबाल फेडरेशन को सौंप दिया गया। 96१ करोड़ रुपयों से इसे नया रूप दिया गया था। लेकिन थोड़े दिनों पहले जब इसका मुआयना किया गया, तो स्टेडियम गंदगी से अटा पटा था। बहुत से महंगे उपकरण खराब हो चुके हैं, जगह-जगह छतों में टूट-फूट हो चुकी है, कुर्सियां उखड़ चुकी हैं और महंगे इलैक्ट्रानिक उपकरण धूल चाट रहे हैं। गेम्स के दौरान बहुप्रचारित एयरोस्टेट बैलून, जिसे 70 करोड़ में खरीदा गया था, एकदम खराब हो चुका है।

आयोजन स्थल पर खामियां
डीडीए ने सीरीफोर्ट, यमुना खेल परिसर (वाईएमसी) और साकेत खेल परिसर (एसएससी) पर स्पर्धा स्थलों-प्रशिक्षण केंद्रों का विकास किया। इनमें डिजाइन सलाहकार नियुक्त करने में एक साल की देरी की गई, जिससे मुख्य काम के लिए अनुबंध सौंपने और निष्पादन में देरी का सामना करना पड़ा। कुर्सियों की खरीद में काफी अनियमितता दिखीं, इसी तरह टेबल टेनिस कोर्ट के लिए सिंथेटिक सतह और एक आयोजन स्थल पर मैपल वुड की फर्श बनाने के लिए सौंपे गये अनुबंध में भी गड़बड़ी नजर आई।
शिवाजी स्टेडियम के काम के लिए एक विदेशी ठेकेदार चाइना रेलवे शिसिजु ग्रुप कारपोरेशन (सीआरएसजीसी) की नियुक्ति की गई जबकि एनआईटी की शर्तों में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं थी। शिवाजी स्टेडियम पर काम खेलों तक भी पूरा नहीं किया जा सका और जो हाकी पिच तैयार की गई उसकी दिशा उत्तर दक्षिण न होकर पूर्व पश्चिम कर दी गई।
तालकटोरा इंडोर स्टेडियम के लिए सिम्प्लेक्स प्रोजेक्ट लिमिटेड को एकल निविदा के आधार पर मुख्य ठेकेदार के रूप में नियुक्त किया गया। इसकी गुणवत्ता में भी कमी पाई गई है। बाकी स्टेडियमों में भी ऊंची कीमत के सामान लगाने, त्रुटिपूर्ण कार्य और बेकार के अपव्यय की बात सामने आई है।


गेम्स के बाद का हाल
कामनवेल्थ गेम्स के लिए दिल्ली के सौंदर्यीकरण पर करीब पर 15 हजार करोड़ खर्च किये गये। ये खर्च दिल्ली में फ्लाईओवर, अंडरपास, सड़कों, वृक्षारोपण, ड्रेन्स की मरम्मत और मोटे तौर पर ट्रैफिक की व्यवस्था सुधारने पर किया गया था। लेकिन एक साल बाद ज्यादातर सड़कें फिर टूट-फूट चुकी हैं। अंडरपास में पानी भर जाता है। दिल्ली में लगाये गये गमले और पेड़ गायब हो चुके हैं। ट्रैफिक व्यवस्था फिर पुराने हाल में लौट चुकी है।

ऊर्जा
दिल्ली सरकार ने ऊर्जा उत्पादन के अपने स्रोतों पर निर्भर रहने के लिए बवाना में एक नये पावर प्लांट को लगाने की योजना को अपनी मंजूरी दी। 1500 मेगावाट के बवाना के गैस आधारित पावर प्रोजेक्ट में देरी हो गई और ये खेलों के वक्त तक पूरा नहीं हो पाया। दिल्ली ट्रांस्को लिमिटेड ने पांच 2२0 केवीए सब स्टेशन और सात केबलिंग परियोजनाएं भी हाथ में लीं ताकि खेलों के लिए दिल्ली में समय से बिजली सप्लाई की स्थिति मजबूत हो सके। इनमें से ज्यादातर परियोजनाएं काफी देर से दी गईं और ये खेल से पहले पूरी नहीं की जा सकीं। अनुबंध देने की प्रक्रिया में भी काफी खामियां थीं।

परिवहन सेवाएं
खेलों के दौरान खिलाड़ियों, तकनीकी अधिकारियों और मीडिया कर्मियों को यातायात सुविधा दी गई थी, जिसके लिए डीटीसी की लो फ्लोर बसों का इस्तेमाल किया गया था। बसों को सीडब्ल्यूजी के लिए नया रखने के लिए डीटीसी ने अपने लो फ्लोर बसों के बेड़े में से 16 फीसदी बसों को मार्च से अगस्त 2010 के दौरान नहीं चलाया। इसके अलावा खेल आयोजन की अवधि के दौरान एनडीएमसी इलाके से 78 फीसदी ब्लू लाइन बसों को सड़कों से हटा लिया गया। इससे सार्वजनिक परिवहन सेवाएं बुरी तरह से प्रभावित हुईं। मानक बसों में डेस्टिनेशन बोर्ड और टाइमकीपिंग बूथ निर्माण जैसी आधुनिकीकरण की परियोजनाएं भी तयशुदा वक्त से पहले पूरी नहीं हो पाईं। खेलों से पहले 1500 बस क्यू शेल्टर के निर्माण के लिए डीटीसी और जीएनसटीडी के परिवहन विभाग ने कार्यान्वयन के लिए विभिन्न तरीके अपनाए (इनमें 1050 बीक्यूएस काम सरकारी फंडिंग से या बीओटी के आधार पर डीआईएमटीएस को दिया गया, जो एक गैर सरकारी निकाय है) इतनी बड़ी परियोजना लागू करने में मनमानापन, तदर्थवाद और अस्पष्टता साफ दिखी। अब तक केवल 47२ बीक्यूएस ही पूरे हो पाये हैं। मिलिनियम पार्क के सामने एश पांड में बनी पार्किंग महज अस्थायी ढांचा नहीं थी बल्कि इसमें कई स्थायी ढांचे भी बने थे। इसका इस्तेमाल खेल आयोजन की छोटी अवधि की जरूरतों के बहुत बाद तक किया गया। यह दिल्ली के मास्टर प्लान 202१ और प्रस्तावित जोनल प्लान का साफतौर पर उल्लंघन था।
 

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