
वर्ल्ड कप हॉकी निराशा के साथ दिलासा भी
वल्र्ड
कप हाकी
के बाद
बहुत से
खेल
प्रेमी निराश
होंगे
लेकिन हालत
इतनी
बुरी भी
नहीं। 12
टीमों
वाले वर्ल्ड
कप
में
पिछली बार
हम सबसे
निचली
पायदान पर
थे तो
इस बार
आठवें
नंबर पर
हैं।
यानि तीन
पायदान
की छलांग।
बेशक
उम्मीद खत्म
नहीं
हुई है।
दिक्कत
ये है
कि हॉकी
की
इमारत इतनी
जर्जर
हो चली
है कि
इसे
सामान्य स्थिति
में
पहुंचाने में
काफी
समय लग
सकता
है।
रत्ना
श्रीवास्तव
या द
नहीं आ
रहा कि
पिछले
कितने साल
पहले
हमारे राष्ट्रीय
खेल हॉकी
की
नेशनल चैंपियनशिप
हुई थी।
याद नहीं
आ रहा
कि कितने
साल पहले
अलग - अलग
राज्यों
की हॉकी
टीम को
साथ
खेलते देखा
गया था।
याद नहीं
आ रहा
कि कभी
हमारे
देश में
हॉकी की
इतनी
प्रतिभाएं थीं कि
सेलेक्टर्स
को सोचना
पड़ता
था इतने
खिलाडिय़ों
में से
किसे
चुनें और
किसे
बाहर करें।
बेशक सत्तर के दशक में हमारी हॉकी ढलने लगी थी , वर्ल्ड हॉकी में हम पिछडऩे लगे थे। लेकिन तब भी हॉकी में देशवासियों की आत्मा बसती थी। हॉकी की स्टिक और गेंद की लय ताल देखते ही हमारे मन में अलग ही तरंगें बहती थीं। पर अब लगता है हम बहुत दूर आ गये और वो हॉकी बहुत पीछे छूट चुकी है ... कब इस खेल की एक लडिय़ां बिखरती चली गईं पता नहीं चला। ऐसे में जब वर्ल्ड कप हॉकी पिछले दिनों दिल्ली में हुई तो इसका आना ऐसा लगा मानो हॉकी की घर वापसी हो रही है। हॉकी के लिए लोगों के दिल फिर खिलने लगे। पुराने अच्छे दिनों की यादें फिर ताजा होने लगीं। कोई माने या न माने लेकिन तमाम निराशाओं के बावजूद इस वर्ल्ड कप ने बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालिफाई न करने के घावों को खरोंचों के बाद भी सहलाया तो है।
बारह टीमों वाले वर्ल्ड कप में पिछली बार हम सबसे निचली पायदान पर थे लेकिन इस बार हम आठवें नंबर पर आ गये हैं। तो ये तो कहा ही जा सकता है उम्मीद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दिक्कत ये है कि हॉकी की इमारत इतने सालों में इतनी जर्जर हो चली है कि इसे सामान्य स्थिति में पहुंचाने में भी काफी समय लग सकता है।
बेशक भारत और पाकिस्तान के बीच पहले मुकाबले को देखना सपनों के सच होने जैसा था। उस दिन भारतीय टीम जिस तरह खेली , वैसा मैच हाल के सालों में शायद ही कभी देखने को मिला था। पाकिस्तान के खिलाफ उस दिन हमारी टीम ने कुछ भी गलत नहीं किया। 4- 1 से मैच जीतने के दौरान भारतीय टीम ने कुछ भी ऐसा नहीं किया , जो गलत हो , बेहतर तालमेल , पेनाल्टी कार्नर को गोल तब्दील करना , जबरदस्त आत्मविश्वास। लेकिन ये मैच महज एक रात की बात बनकर रह गया। उसके बाद हम आस्ट्रेलिया से 2- 5 से हारे। इंग्लैंड से जो मैच बराबरी पर खत्म हो सकता था , उसमें हमारी बुरी गत बनी , स्पेन के खिलाफ भी हार ही खाते में आई। इन सारे मुकाबलों में एक बात साफ दिखी कि हम प्रतिद्वंद्वी टीम के बेहतर खेल की बजाये अपनी गलती से ज्यादा हारे। डी में घुसने के बावजूद न जाने कौन सी हड़बड़ाहट और घबराहट टीम के फारवर्डों पर हावी हो जाती थी कि उनकी स्टिक गेंद को सही दिशा ही देना भूल जाती थी। हमें ये सीखना होगा कि लक्ष्य के पास पहुंचकर भटकना ऐसी कमजोरी है , जो कोई भी टीम दोहराना पसंद नहीं करती , लेकिन हमने ये काम बार बार किया। वहीं आस्ट्रेलिया , इंग्लैंड के फारवर्डों में ये खास बात दिखी कि वो एक बार डी में पहुंचने के बाद चूकते नहीं हैं बल्कि उनकी फिनिशिंग भी उतनी ही बेहतर होती है। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जो मैच हमें जीतना चाहिए था , उसे हम बस किसी तरह बराबरी पर खत्म कर पाये। कुल मिलाकर कहना चाहिए कि भारतीय टीम में जितनी क्षमता थी , वो इससे बेहतर पोजिशन की हकदार थी।
कोई
भी टीम
तब
बेहतर बनती
है जब
उसके हर
डिपार्टमेंट
बेहतर प्रदर्शन
करें और
उनके
बीच जबरदस्त
लय भी
हो।
भारतीय टीम
के तीन
मुख्य
विभागों यानि
फारवर्ड
लाइन , मध्य
पंक्ति
और डिफेंस
की कहानी
अलग अलग
रही।
अगर फारवर्डों
का खेल
मिलाजुला
रहा तो
मध्य
पंक्ति ने
सबसे
बेहतर काम
करके
दिखाया। सबसे
फिसड्डी
रही रक्षक
रेखा
यानि डिफेंस
लाइन ,
जो आमतौर
पर
नाकाम रही।
डिफेंस
लाइन के
मुख्य
कर्ताधर्ता संदीप एक
मैच के
बाद पटरी
से उतर
गये , तो
उनके
दोनों डिफेंडर
साथी
भरत चिंकारा
और
धनंजय महादिक
में अभी
मैच्योरिटी
की
जरूरत है।
पेनाल्टी
कार्नर
विशेषज्ञ और
डिफेंडर
दिवाकर राम
की
सेवाएं क्यों
नहीं ली
गईं ,
समझ में
नहीं आता।
फारवर्ड लाइन में सुनील कुमार प्रतियोगिता से पहले ही घायल हो चुके थे। शायद दीपक ठाकुर को विकल्पहीनता की स्थिति में लिया गया और वह कुछ कर भी नहीं कर पाये। 30 साल के प्रभजोत भी ढले हुए दिखे। अलबत्ता कप्तान राजपाल सिंह , स्वर्णजीत , गुरविंदर चांदी ने तेजी दिखाई , लेकिन इन सभी को डी में गेंद को ले जाने के बाद उसे गोल में बदलने की कला भी सीखनी बहुत जरूरी है। तारीफ करनी होगी हाफ लाइन की कि उसने अपना काम सबसे बेहतर तरीके से किया। न केवल गेंद को लगातार फारवर्डों को मुहैया कराया बल्कि पीछे हटकर रक्षण को भी मदद की। इन लाइन पर खेल रहे सरदारा , अर्जुन हलप्पा , गुरबाज , विक्रम पिल्लै और तुषार खांडेकर सभी का खेल बेहतर था। टूर्नामेंट से पहले अनावश्यक विवादों ने जरूर टीम को कुछ नुकसान पहुंचाया। लेकिन मौजूदा टीम में संभावना दीखती है। अलबत्ता कोच ब्रासा को इन्हें खासतौर पर सिखाना होगा कि डी में पहंचकर खाली हाथ नहीं लौटा करते , उस समय अलग किस्म के कलाकौशल की भी जरूरत पड़ती है। कुछ बातें हाकी के पुनरुत्थान के लिए बहुत जरूरी दिख रही हैं। नेशनल प्रतियोगिताओं की किसी भी तरह शुरुआत कराई जाये , इससे हाकी न केवल ग्रासरूट पर फिर से पनप पायेगी बल्कि प्रतिभाएं भी सामने आएंगी। दूसरी जरूरी बात भारतीय हाकी महासंघ यानि हाकी इंडिया का जल्दी से जल्दी चुनाव , जिसमें कर्ताधर्ता की भूमिका में कुछ खिलाडिय़ों का आना भी बेहतर होगा।
कहां
गलती
हुई
* आस्ट्रेलिया, स्पेन और इंग्लैंड के खिलाफ हमारी हार ने हमारी टीम की सारी
कमजोरियों को सबके सामने उजागर कर दिया।
* भारतीय डिफेंस बहुत लचर रहा। संदीप सिंह और महादिक सिंह अपनी डिफेंडर की भूमिका
में खरे नहीं उतर पाये। दबाव में हमारी डिफेंस लाइन कभी भी बेहतर काम करती हुई नहीं
दिखी।
* भारत को पूरे टूर्नामेंट के दौरान 18 पेनाल्टी कार्नर मिले। लेकिन वह चार को ही
गोल में तब्दील कर सका
* खिलाडिय़ों का चयन भी सही नहीं था। दीपक ठाकुर न तो फार्म में थे और न ही फिट।
* आखिरी दो मैचों में भारत की टीम मैन टू मैन मार्किंग करती नहीं दिखी। इससे विरोधी
खिलाडिय़ों को बार बार टीम के सर्किल में घुसने के आसान मौके मिलते रहे।
* भारतीय खिलाड़ी मैदान में बहुत ढेर सारी खाली जगह छोड़कर खेल रहे थे और उनकी
ट्रेपिंग, पासिंग और ड्रिबलिंग में कहीं कोई तालमेल नजर नहीं आ रहा था।
वो
यादगार मैच
भारत और पाकिस्तान के बीच पहले मुकाबले को देखना सपनों के सच होने जैसा था। 4-1
से मैच जीतने के दौरान भारतीय टीम विजेताओं की तरह खेली। बेहतर तालमेल, पेनाल्टी
कार्नर को गोल तब्दील करना, जबरदस्त आत्मविश्वास। कुछ भी गलत नहीं रहा। लेकिन ये
मैच महज एक रात की बात बनकर रह गया।
क्या
होना
चाहिए , जिससे
लौटे सके
गौरव
*
कोई टीम
उतनी ही
बेहतर
होती है ,
जितना
बेहतर उसका
सिस्टम ,
दरअसल अब
हॉकी
इंडिया का
चुनाव
होना चाहिए
और इसे
संचालित
लोग भी
बेहतर
होने चाहिए।
*
भारतीय
हॉकी में
आमूलचूल
बदलाव की
जरूरत
है। ये
नीचे से
ऊपर तक
होना
चाहिए।
*
मौजूदा
कोच बारसा
जिस तरह
अधिकारों
की बातें
करते
हैं , और
ज्यादा
से ज्यादा
व्यक्तिगत
सुविधाओं
की मांग
कर रहे
हैं ,
उससे लगता
नहीं कि
वो सही
तरीके
से भारतीय
हाकी पर
ध्यान
पाएंगे। इसके
अला वा
उन्होंने टीम
में
लगातार गुटबाजी
को
बढ़ावा दिया
है। वह
मौजूदा
भारतीय सिस्टम
से अलग
अपना
सिस्टम विकसित
करना
चाहते हैं
और ये
भी नहीं
चाहते
कि उनकी
जवाबदेही
तय की
जाये।
*
हॉकी को
ग्रास
रूट लेवल
पर ले
जाने की
बहुत
ज्यादा जरूरत
है। एक
लंबे
अर्से से
बंद
नेशनल चैंपियनशिप
को भी
शुरू
कराये जाने
की
जरूरत है ,
जिससे
देशभर में
हॉकी की
नई
प्रतिभाएं सामने आ
सकेंगी।
*
खिलाडिय़ों
के
फिटनेस और
मनोवैज्ञानिक
पक्ष पर
भी खासा
काम किये
जाने की
जरूरत
है
हार के बारे में कोई कुछ भी कहे लेकिन ये तय है कि कोच की रणनीति में कई गंभीर गलतियां देखने को मिलीं। अगर कोई रणनीति बनी भी तो लगा नहीं कि खिलाडिय़ों ने उसका पालन किया है , खिलाडिय़ों को अपनी पोजिशन का अंदाज ही नहीं था , इसमें काफी गड़बड़ी देखने को मिली और परिणाम पूरी तरह नाकामी के रूप में सामने आया
वी
भास्करन , पूर्व
भारतीय
कोच और
कप्तान
पाकिस्तान
के खिलाफ
जीत के
बाद दो
मैचों
के लिए
शिवेंद्र
पर बैन
लगना
हमारे लिए
बहुत बड़ा
आघात रहा।
महत्वपूर्ण
मैचों
में उनके
नहीं
खेलने का
नतीजा
हमने भुगता ,
नतीजतन
हम सेमीफाइनल
में नहीं
पहुंच
पाये
जूड
फेलिक्स , पूर्व
हॉकी
खिलाड़ी
मैं
संदीप को
भी दोषी
ठहराना
चाहूंगा , उन्होंने
विपक्षियों
को बहुत
मौके
दिये। उनकी
ड्रैग
फ्लिक में
कोई
गड़बड़ी नहीं
है ,
लेकिन वो
गेंद को
हमेशा
नीचे रखने
की
कोशिश करते
हैं ,
जिसे गोलकीपर
को रोकना
मुश्किल
नहीं होता।
जफर
इकबाल , पूर्व
हॉकी
कोच
मुख्य
खिलाडिय़ों में
दीपक
अच्छा नहीं
खेल पाये।
वह
अनुभवी फारवर्ड
हैं ,
लेकिन उनके
खेल में
कहीं भी
पहले
वाली बात
देखने
को नहीं
मिली।
वह अपनी
फार्म
को लेकर
लगातार
संघर्ष कर
रहे थे ,
लेकिन
सवाल यही
है कि
इसके
बाद भी
उन्हें
टीम में
क्यों
रखा गया।
अशोक कुमार , पूर्व हॉकी खिलाड़ी












