
Posted Wed, 02/01/2012 - 22:06 by admin
जिस रणनीति, नेतृत्व व वादों के साथ उ.प्र. के राजनीतिक दल अपनी ताल ठोंक रहे
हैं इसका विश्लेषण समय की मांग है। उत्तर प्रदेश के प्रमुख दलों की वास्तविक स्थिति
का आकलन करती व उनकी दशा-दिशा को उजागर करती सुरेंद्र अग्निहोत्री की रिपोर्ट।
उत्तर प्रदेश में जनतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव चुनाव चल रहा है। चुनाव को जीतने के
लिये सारे रंग और ढंग के साथ जनता के आँगन में राजनैतिक दल उतर आए हंै। सत्ता के
बीमार डाक्टर सरकार बनाने के लिये वोट पाने की खातिर प्रपंच कर रहे हैं। जप-तप,
तंत्र-मंत्र, कर्म-काण्ड, प्रार्थना-पूजा, दान-महादान जैसे साधनों के बलबूते अपना
यह लोक ही नहीं परलोक सुधारने की मिथकीय परम्परा की तरह सत्ता के फल को प्राप्त करने
के लिऐ सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी ने सभी तरह के तरीके अपनाये हैं, लेकिन वोटर रूपी
मरीज झांसे में आने को तैयार नहीं दिख रहे हंै जिसके कारण प्रदेश में पंचकोणीय
मुकाबले के समीकरण सामने आ रहे हैं। इस महामुकाबले में परिणामों का आकलन करना इतना
कठिन है कि थोड़े से वोटों के यहां से वहां खिसक जाने से सारे समीकरण ध्वस्त हो जाते
हंै। २२ वर्षो से बनवास भोग रही कांग्रेस तीस लाख बुनकरों, बुन्देलखण्ड पैकेज तथा
विकास के मुद्दे के साथ मुस्लिम आरक्षण की छौंक लगाकर अपनी वापसी दर्ज कराना चाहती
और इसके चलते एंग्री यंग मैन राहुल गांधी अपने जीवन की सबसे कड़ी परीक्षा से गुजर रहे
हंै। यूपी का भविष्य ही दिल्ली की गद्दी की दावेदारी तय करेगा। इसलिए राहुल गांधी
किसी भी हालत में यूपी विजय के लिये हर टोटके अजमाने से गुरेज नहीं कर रहे हंै। वही
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के युवराज अखिलेश यादव, राष्ट्रीय लोकदल के जयन्त चौधरी,
राष्ट्रीय जनक्रान्ति पार्टी के राजबीर सिंह तथा अपना दल की अनुराधा पटेल के सामने
अपनी राजनैतिक विरासत की कड़ी परीक्षा में खरा उतरने की चुनौती है। भारतीय जनता
पार्टी मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को चुनावी समर मेंं उतारने के
साथ यूपी को एक नया चेहरा देने की कवायद में लगी है। भाजपा का मानना है कि अगड़े वोटों
के साथ पिछड़े वोटों को मिलाकर चुनावी जंग में जीत के रंग भरे जा सकते हंै।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभिन्न नेताओं के बयान दर्शा रहे हंै कि भारतीय जनता
पार्टी और बीएसपी मेंं आपसी ट्यूनिंग बन सकती है। जहाँ भाजपा कमजोर होगी वहाँ बसपा
को संघ का समर्थन मिल जाये तो आश्चर्य नहीं होगा। दागी और दलित के मुद्दे के साथ
पिछड़ों के आरक्षण पर सवार होकर भाजपा की उड़ान कितनी मंजिल तक पहुँचती है, यह कहना
भले ही कठिन हो लेकिन एड़ी-चोटी का जोर लगा रही भाजपा जानती है कि चुनाव के बाद भाजपा
और बसपा की एक बार फिर खिचड़ी पक सकती है। दिल्ली में दावेदारी के लिये भाजपा का साथ
जहाँ एनडीए के लिये लाभदायक साबित हो सकता है, वहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
नितिन गडकरी ने अगले प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी के नाम का एलान करके बड़े
दूर की गोटी फेंकी है। मुस्लिम समाज किसी भी हालत में दिल्ली की गद्दी पर नरेन्द्र
मोदी को नहीं देखना चाहेगा और यह समाज भली भांति जानता है कि दिल्ली की गद्दी से
मोदी को रोकने का दमखम कांग्रेस के पास ही है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता यदि
सपा और बसपा की तरफ निगाहें करते हंै तो दिल्ली में मोदी को रोकने वाली कांग्रेस
कमजोर ही होगी। इस विचित्र बयान ने जहाँ उच्च जातियों के हिन्दुओं को भाजपा से जोड़ा
है वहीं मुस्लिम समाज को असमंजस में डाल दिया है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम
मतदाता समाजवादी पार्टी की तरफ गोलबंद दिख रहा है। उसकी दूसरी वरीयता बसपा है और
कांग्रेस तीसरे नंबर पर आती है। उस पर भी 18 दलों का इत्तेहाद मोर्चा मुस्लिम मतों
का बड़ा दावेदार है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में १२.५८ करोड़ मतदाता भाग
लेंगे। प्रदेश में मुख्य मतदेय स्थलों की संख्या १ लाख २८ हजार ११२ एवं मतदान
केन्द्रों की संख्या ८७,३१३ है। कई स्थानों पर मतदेय स्थलों की संख्या बढ़ जाने के
कारण वहां सहायक मतदेय स्थल बनाये जाएंगे। प्रदेश में १८-१९ साल के युवा मतदाताओं
की संख्या ५२-५३ लाख है। ये पहली बार वोट डालेंगे।
यूपी में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के साथ बीते छह सालों में
जमकर खेल हुआ। मुलायम से लेकर मायावती तक के कार्यकाल के दौैरान केेंद्र ने सूबे को
८६५७ करोड़ रुपये दिए, लेकिन अफसरों व चिकित्सकों ने पांच हजार करोड़ की बंदरबांट कर
ली। इसका राजफाश सीएजी की रिपोर्ट में हुआ। इसी बात को चुनावी जंग का हथियार बनाने
के लिए आतुर कांग्रेस और भाजपा को दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए सपा ने भी अपना दांव
चला है। अंग्रेजी और कंप्यूटर शिक्षा का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी ने प्रदेश
अध्यक्ष अखिलेश यादव की पहल के कारण अब न केवल इनके समर्थन में खड़ी हो गई है, बल्कि
पार्टी ने तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता की तर्ज पर छात्रों को मुफ्त लैपटाप
और टैबलेट देने का ऐलान कर युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश भी की है। चुनाव के २४
पेज के घोषणा पत्र में महिलाओं, युवाओं, किसानों, छात्रों, गरीबों, मुसलमानों और
रिक्शा चालकों तक की जरूरतों के साथ साथ प्रदेश में स्वच्छ शासन और बेहतर कानून
व्यवस्था का वादा किया गया है। सपा ने कहा है कि प्रदेश में सरकारी सेवाओं में भर्ती
की आयु सीमा ३५ वर्ष होगी और ३५ वर्ष की उम्र के बाद भी नौकरी न मिलने पर बेरोजगार
नौजवानों को १२ हजार रुपये सालाना बेरोजगारी भत्ता दिया जायेगा। घोषणा पत्र में
मायावती सरकार के पांच साल के भ्रष्टाचार की निश्चित समय सीमा में जांच कराने के
लिए एक आयोग के गठन के साथ ही लोकायुक्त संस्था को बहुसदस्यीय करने की बात कही गयी
है। पार्टी ने मुसलमानों को जनसंख्या के आधार पर आरक्षण देने और आतंकवाद के खिलाफ
कार्रवाई की आड़ में जेलों में बंद यूपी के बेकसूर मुस्लिम युवकों को रिहा कराने के
साथ उन्हें मुआवजे के साथ इंसाफ देने का भरोसा भी दिलाया है। प्रदेश में २००६ के
विधानसभा नतीजों पर नजर डाली जाये तो सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी २०६ सीटों पर,
समाजवादी पार्टी ९७ सीटों पर, भारतीय जनता पार्टी ५१ सीटों पर, कांग्रेस २२ सीटों
पर तथा अन्य दल २७ सीटों पर विजयी हुए थे।
२२ वर्षों बाद पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बहुजन समाज पार्टी के सामने इस बार
सहयोगी दलों के नाम पर अपना एजेण्डा पूरा न कर पाने का बहाना नहीं है। इसलिए ३०.४३
प्रतिशत मत हासिल करके सबसे मजबूत दल के रूप में अपना दबदबा बनाये रखने वाली बहुजन
समाज पार्टी ने अपने चुनावों की तैयारियां सत्ता मिलते ही शुरू कर दी थी। तब से
लगातार सोशल इंजीनियरिंग के तहत बनी भाईचारा समितियों, सक्रिय समर्पित कैडर, २०
प्रतिशत दलित वोट बैंक के साथ सरकार की नई-नई नीतियों उपलब्धियों को सरकारी तंत्र
के सहारे गाँव-गाँव मेंं पहुंचाने की मुहिम में करोड़ों रुपया झोंकने के बाद सबसे आगे
दिख रही है। फिर भी बसपा मेंं हालात अच्छे नहीं दिखने के पीछे नम्बर दो के नेता
बाबू सिंह कुशवाहा की विदाई से लेकर भ्रष्टाचार के आरोप मेंं दो दर्जन मंत्रियों के
पद गंवाने के साथ साथ एक दर्जन से अधिक मंत्री लोकायुक्त की जांच के घेरे मेंं होने
तथा ११० से अधिक विधायकों तथा आधा दर्जन मंत्रियों का टिकट काटे जाने के कारण मचा
घमासान चिन्ता का सबब बन सकता है। ब्राह्म्ïाण चेहरे के नाम पर सतीश मिश्रा एवं
उनके कुनबे को ही सारी मलाई मिलने के कारण ब्राह्म्ïाण समाज की नाराजगी, दबंग
क्षत्रियों को जब तक बसपा में रहे तब तक संत और बसपा छोड़ते ही शैतान मानने की
प्रक्रिया के कारण क्षत्रिय समाज का असंतोष तथा पाँच साल में उपजी सत्तारूढ़़ दल के
प्रति स्वाभाविक नाराजगी के साथ कांग्रेस द्वारा खेले गये मुस्लिम आरक्षण के दांव
से बचना होगा। बसपाई सेना मेंं मुख्य सेनापति मायावती के बाद मात्र सतीश चन्द्र
मिश्रा, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्या ही स्टार प्रचारक शेष बचे हैं
जिसके कारण स्टार प्रचारकों का टोटा दिख रहा है।
विपक्ष द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपों मेंं माया सरकार को बुरी तरह घेरने के कारण
चुनावी परिणामों पर प्रभाव पड़ने की बात कही जा रही है। एक सर्वेक्षण एजेंसी द्वारा
किये गये सर्वेक्षण में ९ प्रतिशत वोटों के खिसक जाने की बात सामने आने से बसपा के
लिये खतरे की घंटी बजती नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के
सर्वेक्षण में जो तस्वीर उभर कर आयी है, उसमें बसपा सिमटती नजर आ रही है। लेकिन
राजनैतिक दांव पेंच के जाल में उलझे मतदाताओं के वोट आखिर किसके पाले में अधिक पड़ते
हैं, कहना इतना आसान नहीं है। हाालांकि बसपा प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या
का दावा है कि उनकी पार्टी को २५० सीटें मिलेंगी ।
लोकसभा चुनाव में प्रदेश की दूसरे नम्बर की पार्टी बनकर उभरी कांग्रेस उत्तर प्रदेश
मेंं बाईस वर्षों का अपना वनवास समाप्त करने के लिये पूरे दमखम के साथ चुनावी जंग
में उतर गयी है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने विगत तीन वर्षों में यूपी को
चुनावी जीत के लिये मथ डाला है। गाँव-गाँव और पाँव-पाँव के नारे के साथ हर गरीब के
आँगन में दस्तक देकर राहुल ने बसपा और सपा को उसके ही गढ़ में जबरदस्त तरीके से घेरा
है। कांग्रेस ने प्रदेश में लोकसभा चुनाव के परिणाम आते ही अपनी चुनावी रणनीति तय
कर दी थी। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में बेनीप्रसाद वर्मा, श्रीप्रकाश जायसवाल, सलमान
खुर्शीद, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, प्रदीप जैन आदित्य की ताजपोशी के साथ दलित
नेता पीएल पूनिया को अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग का चेयरमैन बनाकर अपने
क्षत्रपों की सेना तैयार की। प्रदेश को दस जोन मेंं बाँटकर अन्य राज्यों के प्रभारी
तैनात करके लगातार मानीटरिंग के साथ राहुल गांधी के सम्पर्क मेंं नेतृत्व में
सम्पर्क अभियान, केन्द्रीय मंत्रियों और सांसदों के द्वारा जन जागरण अभियान,
किसानों, मजदूरों तथा बुनकरों के लिये मनरेगा, बुनकर पैकेज, बुन्देलखण्ड पैकेज,
मुस्लिमों के लिये आरक्षण तथा भोजन के कानूनी अधिकार के बिल के साथ-साथ प्रदेश में
चल रही केन्द्र की १६ जनकल्याणकारी योजनाओं पर निरन्तर नजर रखने के साथ परम्परागत
मुस्लिम, दलित, ब्राह्म्ïाणों के वोटों की वापसी के लिये सम्मेलनों तथा पश्चिमी
उत्तर प्रदेश मेंं रालोद से चुनावी गठबंधन का दाँव खेला है। कांग्रेस की रणनीति सपा
को हर हाल में नुकसान पहुंचाने की है, जहां वह कम वोटों के अंतर से सपा की हार का
कारण बन सकती है।
कांग्रेस ने प्रत्याशियों के चयन में समाजवादी पार्टी से जुड़े पुराने
नेताओं-कार्यकर्ताओं को तवज्जो देते हुए अपनी रणनीति के तहत मुलायम सिंह यादव के गढ़
इटावा, मैनपुरी, औरैया, फर्रुखाबाद और कन्नौज जैसे जिलों में यादव बिरादरी के
नेताओं को प्रत्याशी बनाकर भी अपने मिशन को आगे बढ़ाया है। प्रदेश की ८५ सुरक्षित
सीटों के सापेक्ष कांग्रेस ८७ दलित नेताओं को टिकट दे चुकी है। दो सामान्य सीटों पर
अनुसूचित वर्ग के कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ाया जा रहा है। इसी तरह पिछड़े वर्ग के
कोटे की भरपाई के लिए कांग्रेस ने सात नए उम्मीदवार उतारते हुए कुल संख्या को बढ़ाकर
९४ कर दिया। लेकिन ब्राह्म्ïाण समाज की बनिस्पत ठाकुरों को अधिक तरजीह मिली है।
प्रदेश की चुनावी सभाओं में मुख्यमंत्री मायावती के साथ ही मुलायम की पिछली सरकार
की गलतियों को गिनाना भी कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की रणनीति का ही हिस्सा है।
इन सीटों पर उन्हीं सवालों को प्रमुखता से उठाया जाएगा जिन पर सपा के लिए जवाब देना
भारी पड़े। कांग्रेस पार्टी किसी और के समर्थन से ज्यादा, दूसरे के ही सहयोग से सही
अपनी सरकार बनाने को ज्यादा तवज्जो देगी। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में चुनाव बाद
दूसरे दलों के साथ मिलकर सरकार नहीं बना पाती तो राष्ट्रपति शासन और फिर नये चुनाव
का विकल्प अपना सकती है। मुलायम सिंह के सबसे ताकतवर साथी रहे बेनी प्रसाद वर्मा,
रसीद मसूद, राजबब्बर तथा मायावती के साथी पीएल पूनिया कांग्रेस के प्रमुख योद्धा
बनकर उभरे हैं। इनके साथ ही कांग्रेस के स्टार प्रचारकों मेंं डा. रीता बहुगुणा
जोशी, प्रमोद तिवारी, सलमान खुर्शीद, सलीम शेरवानी की मौजूदगी के बीच प्रियंका
गांधी भी राहुल की मुहिम को गति देने के लिए प्रचार की कमान संभाल रही हैं। अन्य
दलों से आगे आने के लिए कांग्रेस को सबसे कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है।
प्रदेश की नम्बर दो पार्टी का तगमा हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी के लिये उत्तर
प्रदेश मेंं सब कुछ अब ठीक ठाक नजर नहीं आ रहा है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव
ने पहली बार विधानसभा चुनाव तैयारियां काफी पहले से शुरू कर दी थीं। जन आन्दोलनों
के साथ टिकटों की घोषणा पहले करकें बाजी मारने की जो चाल उन्होंने चली वह उल्टी
पड़ती नजर आ रही है। इसकी बानगी घोषित उम्मीदवारों के नाम बार-बार बदले जाने के रूप
में देखी जा सकती है। प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी में भितरघातियों पर नजर
रखने के लिए जासूसों की सेवा लेकर जता दिया है कि पार्टी का हित सबसे पहले है।
टिकटों को लेकर समाजवादी पार्टी में पारिवारिक कलह अब पार्टी सांसद बाल कुमार पटेल
(मिर्जापुर) और आरके सिंह पटेल (बांदा) के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गयी हैं।
सांसदों के बीच चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र की सीट पर रस्साकसी चल रही है। सपा ने
पहले बालकुमार के भतीजे वीर सिंह पटेल को टिकट दे दिया था, लेकिन बाद में उनकी जगह
आरके सिंह के बेटे सुनील सिंह पटेल को प्रत्याशी बना दिया। वीर सिंह पटेल ने
समर्थकों के साथ सपा मुख्यालय पहुंचकर शक्ति प्रदर्शन भी किया, लेकिन फिलहाल पार्टी
के बड़े नेता इस विवाद पर मौन हैं। बांदा-चित्रकूट क्षेत्र में बालकुमार व आरके सिंह
पटेल के बीच में पहले से ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता चली आ रही है। इस बार
विधानसभा चुनाव के लिए चित्रकूट से बालकुमार ने भतीजे वीर सिंह पटेल (ददुआ के
पुत्र) को आगे किया था। वीर सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुके हैं। प्रतापगढ़ के
पट्टी क्षेत्र से बालकुमार ने बेटे राम सिंह के लिए टिकट की मांग की थी। सपा ने
दोनों का टिकट फाइनल भी कर दिया था। एक हफ्ते पहले सपा ने चित्रकूट का टिकट संशोधित
करते हुए सुनील को प्रत्याशी बना दिया और वीर सिंह को पट्टी का टिकट पकड़ा दिया गया।
बालकुमार खेमे ने सपा के इस फैसले को व्यक्तिगत हमले के रूप में लेते हुए विरोध
प्रदर्शन शुरू कर दिया। चित्रकूट में कई बार आरके सिंह पटेल का पुतला फूंका जा चुका
है। टिकटों के बंटवारे की महाभारत ने समाजवादी पार्टी के कई क्षत्रपों को सपा से
नाता तोड़ने को विवश कर दिया। सर्वाधिक विद्रोह की स्थिति इटावा, एटा, मैनपुरी तथा
सुल्तानपुर में देखने को मिली है। सपा सुप्रीमो ने २०१२ की चुनावी जंग जीतने के
लिये कमान अपने बेटे अखिलेश सिंह यादव के हाथों में सौंप कर उत्तराधिकारी की घोषणा
कर दी है। आन्दोलनों और क्रांतिरथ के पहँुचने पर जुटी भीड़ अगर वोटों में तब्दील हो
जाती है तो समाजवादी पार्टी का प्रदेश की सत्ता में लौटने का सपना पूरा होने में
देर नही लगेगी।
सपा जातिगत समीकरणों के बल पर २०१२ के चुनाव जीतने की जोर आजमाइश में नाराज आजम खाँ
को पार्टी में वापस लाकर छिटकते मुस्लिम आधार को जोड़ने की कोशिश कर रही है। लेकिन
आजम के आने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे ताकतवर मुस्लिम नेता रसीद मसूद के
विद्रोह और पूर्वी उत्तर प्रदेश में पीस पार्टी तथा मुस्लिम उलेमा काउंसिल ने खतरे
की घंटी बजा दी है।
सपा के पास अपने क्षत्रपों के रूप में स्टार प्रचारकों में शिवपाल सिंह यादव तथा
राजा भईया के अलावा और किसी कद्दावर नेता का न होना परेशानी का सबब है। इस बार
मुलायम सिंह के साथी रहे बेनी प्रसाद वर्मा, राजबब्बर, अमर सिंह और रसीद मसूद उनके
साथ नहीं हंै। छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र भी इस दुनिया से विदा हो चुके हैं। इसलिए
इस संकट काल में अकेले अपने दम पर चुनावी रण की वैतरणी पार करने की चुनौती पहाड़ की
तरह उनके सामने खड़ी है। देखना है कि सपा इस चुनौती का कैसे मुकाबला करती है। मुलायम
सिंह यादव ने दावा किया है कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनना तय है। बसपा को लेकर
जनता में गुस्सा है। यह चुनाव न सिर्फ समाजवादी पार्टी की राज्य में सरकार बनाने के
लिहाज से महत्वपूर्ण है बल्कि २०१४ में होने वाले लोकसभा के चुनाव में समाजवादी
पार्टी की महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका भी तय करेगा। सर्वेक्षणों में समाजवादी
पार्टी अपने दम पर सत्ता हासिल करती नजर नहीं आ रही है। लेकिन समाजवादी पार्टी के
प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह यादव का दावा है कि समाजवादी पार्टी दो सौ से अधिक
सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगी ताकि माया के आतंक और शोषण से मुक्ति मिल
सके। संगठन के तौर पर सपा की मजबूती पर संदेह नहीं किया जा सकता है लेकिन पंचकोणीय
मुकाबले में जनता किसे सिंहासन पर बिठाती है यह तो वक्त ही तय करेगा।
मध्य प्रदेश से आ कर उत्तर प्रदेश की कमान सम्भालने वाली उमा भारती के सहारे नैय्या
पार लगाने की कवायद कर रही भारतीय जनता पार्टी में गुटबाजी के कारण विश्वसनीयता का
सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। ५१ सीटें लेकर तीसरे पायदान पर रहने वाली भाजपा अपना यही
स्थान बनाए रखने के लिए कांग्रेस पार्टी के साथ संघर्ष कर रही है। जनस्वाभिमान
यात्राएं निकालकर कलराज मिश्र और राजनाथ सिंह के सहारे क्षत्रिय तथा ब्राह्म्ïाण
मतों के साथ अल्पसंख्यक आरक्षण के कारण पिछड़ों के हकों पर डाका बता कर मुकाबले को
तैयार भाजपा में चिन्तन और मंथन के दौर ही चल रहे हैं। मुद्दे और झण्डे गायब हंै।
भाजपा कभी राम मन्दिर का राग अलापती है तो कभी छोड़ती है। कभी गंगा का नारा देती है
तो कभी अन्ना के साथ खड़ी होती है, तो कभी अन्ना से किनारा करती है। कभी यह माया के
सौ घोटालों की पुस्तिका पेश करती है तो कभी लगता है कि माया को कम सीटें मिलीं तो
भाजपा सहारा देगी। इन द्वंद्वों के चलते भाजपा की स्थिति उत्तर प्रदेश में विचित्र
सी हो गयी है। इन हालातों में २०१२ के चुनाव में भाजपा जब तक अपनी नीति और रीति साफ
नहीं रखेगी, तब तक रण विजय का सपना सार्थक होना कठिन ही है। भाजपा के सामने
कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण का एक ऐसा मुद्दा फेंक दिया है जिसको लपक कर भाजपा
चुनावी वैतरणी पार कर सकती है। क्षत्रपों के नाम पर भाजपाई सेना मेंं कलराज मिश्र,
विनय कटियार, ओम प्रकाश सिंह, मुख्तार अब्बास नकवी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह,
उमा भारती जैसे अनेकों तेजतर्रार चेहरे हैं जो भीड़ जुटाने के साथ-साथ अपनी वाणी से
जनमत को प्रभावित कर सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता उमा भारती कहती
हैं कि उत्तर प्रदेश का चुनाव विकास और सुशासन पर लड़ा जाना चाहिए। विकास की बात हो,
विकास पर राजनीति हो, जो उत्तर प्रदेश की जनता के लिए सबसे अहम है। मुद्दाविहीन
चुनाव, विकास के मुद्दों पर हो, भाजपा हर हाल में इसी कोशिश में लगी है। सरकार की
नाक के नीचे हुए घोटाले की अनदेखी में बसपा, सपा, कांग्रेस को घसीटने से भी भारतीय
जनता पार्टी के लिए स्थितियां बेहतर होंगी। कहना कठिन है पर इतना तय है कि तीसरे
पायदान पर भाजपा के आने से बसपा के साथ सरकार बनाने की राह आसान हो सकती है।
राजनैतिक रंगमंच पर कांग्रेस, सपा, रालोद गठबंधन की सरकार को पहले विकल्प के रूप
में माना जा रहा है। दूसरे विकल्प के रूप में भाजपा, बसपा गठबंधन की सरकार। एक नया
रास्ता भी राजनैतिक दलों को डरा रहा है जिसमें कांग्रेस की सरकार को बसपा का बाहर
से समर्थन।
उत्तर प्रदेश की चुनावी अंकगणित में कभी त्रिभुज के तीन कोण बनते हैं तो कभी वोट
कटवा दलों के कारण पंचकोणीय मुकाबला बनता नजर आ रहा है। सियासी पार्टियां, एक राग,
एक आग, एक अनुराग लिये वोटरों के आगे पिया कहां, हिया कहां, वोट बिन चैन कहां कहते
घूम रहे हैं। सुधबुध खो देने वाली नई-नई घोषणाओं के बीच ज्यों-ज्यों वोट के दिन
नजदीक आ रहे हैं, त्यों-त्यों वोटर रूपी मरीज सियासी डाक्टरों की धड़कन बढ़ा रहे हैं।
पार उतारूं मैं सबको मुझको न कोई पार उतारे वाली हालत में फंसे वोटर नाटकीय ढंग से
चुप्पी साधे हुए हैं।
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